पत्रकारिता में स्नातक करने के बाद पहली अगस्त वर्ष 2005 को दैनिक जागरण में कार्यरत उप-संपादक अजहर अंसारी को स्थानीय समाचार संपादक सदगुरूशरण अवस्थी ने कार्य से संतुष्ट न होने का बहाना बनाकर कार्यालय से हिसाब चुकता करवा दिया। समाचार संपादक, चीफ रिपोर्टर और सिटी डेस्क इंचार्ज की अनुशंसा पर मार्च 2008 में इन्हें संवादसूत्र से प्रशिक्षु रिपोर्टर के पद पर नियुक्ति दी गयी थी।
तीन वर्ष तक प्रशिक्षु और प्रोबेशन की शर्त पूरी करने के बाद मार्च 2011 में वह स्वतः पूर्णकालिक सब-एडिटर हो चुके हैं। इलाहाबाद के संपादकीय प्रभारी ने इन्हें पूर्णकालिक सब एडिटर होने की सूचना को छुपाये रखा। बनारस हेड आफिस से स्थायी नियुक्ति का पत्र आने के बाद सदगदुरू ने अजहर अंसारी को यह पद न दिलाने की चाल चली। महाप्रबंधक इलाहाबाद इकाई को मिलाकर एक रिपोर्ट तैयार करायी जिसके आधार पर निदेशक वीरेंद्र गुप्त ने अजहर का हिसाब चुकाने का फरमान जारी कर दिया। इस बारे में अजहर का कहना है- ''मुझे दिये गये पीले रंग के कागज पर यह लिखा हुआ था कि आप का प्रोबोशन पीरियड 30 अक्टूबर को खत्म हो रहा है। आपके काम से संतुष्ट न होने कारण कंपनी ने आपका कार्यकाल न बढ़ाने का निर्णय लिया है। आप अपना आर्थिक हिसाब चुकता कर लें।''
उल्लेखनीय है कि सदगुरू के समाचार संपादक बनने के बाद छवि किशोर मिश्र और अमलेंदु त्रिपाठी जैसे समर्पित रिपोर्टर जागरण छोड़ चुके हैं। जब से इनकी नियुक्त इलाहाबाद यूनिट में हुई है रिपोर्टर और डेस्क के लोग इनकी कार्यशैली से काफी परेशान हैं। दिन में 12 से 14 घंटा तक काम करके उनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ चुका है। संपादकीय प्रभारी सुबह से शाम तक रिपोर्टरों से अभद्र भाषा में बातकर उनका मनोबल तोड़ते रहते हैं। एक बार की बात है। संपादकीय सहयोगी राजकुमार श्रीवास्तव को बेटा हुआ तो उसे रात में ही काम पर बुला लिया गया। अजहर अंसारी और अमलेंदु त्रिपाठी की शादी के वक्त भी यही हाल इन दोनों का किया गया। संपादकीय प्रभारी खुलेआम कहते हैं कि मैं संजय गुप्त जी का भेजा हुआ आदमी हूं, मेरा कोई कुछ उखाड़ नहीं सकता।
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