दैनिक जागरण, मेरठ फिर दंगाछाप पत्रकारिता पर उतर आया है

Wasim Akram Tyagi : दैनिक जागरण, मेरठ फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट आया है… लगभग आधे सप्ताह तक इसकी दंगाछाप पत्रकारिता पर विराम लग गया था। लेकिन पिछले दो तीन दिन से फिर उसी तर्ज पर पत्रकारिता हो रही है जैसी पत्रकारिता मुजफ्फरनगर दंगे से पहले करके वहां के लोगों के दिलों में नफरत भरी थी। धीरे धीरे अप्रत्यक्ष रूप से बहुसंख्यक समुदाय को एक विशेष समुदाय के खिलाफ भड़काया था। वही काम जागरण ने फिर से शुरू कर दिया है। जिन पर दंगों के आरोप हैं, और जिन को गिरफ्तारी के लिये पुलिस दबिश देना चाहती है, मगर उनका विरोध महिलाएं कर रही हैं जिनका आरोप है कि पुलिस फर्जी गिरफ्तारी करना चाहती है। उनका कहना है कि जिन लोगों पर आरोप हैं, वे निर्दोष हैं।

ये वैसी ही दलील है जैसी गुजरात के मुखिया देते हैं कि अगर वे दोषी हैं तो उन्हें फांसी पर चढ़ा देना। उनके इस कहने से उन पर मुकदमा तक भी दर्ज नही हो पाया। कुछ ऐसा ही उन महिलाओं के द्वारा किया जा रहा है जिनकी तस्वीरें जागरण जैसा सांप्रदायिकता की स्याही से लिखा जाने वाला और संघ छाप प्रेस में छपने वाला अखबार प्रकाशित कर रहा है। जिस गांव कुटबा की विरोध करती हो मुख्यमंत्री और आम खां का पुतला फूंकती महिलाओं की तस्वीर इसने आज प्रकाशित की हैं, उस गांव कत्ल नहीं बल्कि कत्ल ए आम हुआ था। अगर उस गांव के लोग सभी निर्दोष हैं तो फिर कत्ल ऐ आम करने वाले कौन लोग कहां के थे ? वहां से एक विशेष समुदाय का नामो निशां मिटा देने वाले लोग कहां के थे? अगर वे इस गांव के नहीं थे तो फिर किस गांव के थे? और अगर वे बाहर से आये थे तो उन्हें गांव में आने किसने दिया? ये जरूरी नहीं है कि सभी लोग दोषी हों मगर ये भी जरूरी नही है कि सबके सब निर्दोष ही हों।

जागरण जिस तरीके से खबरों को तोड़ मरोड़कर बड़ी बड़ी तस्वीरों के साथ प्रकाशित कर रहा है उसे देख कर लोगों के जहन में सिर्फ यही छवी उभरती है कि प्रशासन बहुसंख्यक समुदाय को प्रताड़ित कर रहा है। जबकि सच्चाई इसके बरअक्स है, ऐसे सैकड़ों लोग हैं जिनकी प्राथमिकी तक भी दर्ज नहीं की गई है, ऐसे लोगों में बीएसएफ के जवान साजिद भी शामिल हैं जिनका कहना है कि "न हमारी एफआईआर दर्ज हो रही है और न ही प्रशासन कोई मदद कर रहा है. मैंने एफआईआर दर्ज करवाने के लिए शिकायत दी है लेकिन अभी तक मुझे रिसीविंग नहीं दी गई है. जिन लड़कों ने मेरा घर जलाया है वे गाँव में फुटबाल खेल रहे हैं." लेकिन जागरण को ये लोग नजर नहीं आये उसकी नजर में कातिल तो निर्दोष हैं, जागरण फिर से वही जमीन तैयार कर रहा है जिस जमीन पर मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ के गांवों में खून की होली खेली गई थी।

विरोध करने वाली महिलाओं को वीरांगना जैसे शब्दों से संबोधित किया जा रहा है। अगर यही महिलाएं आदिवासी होती तो इन्हें सबसे पहले नक्सली यही अखबार बताता। अगर ये कश्मीरी होती तो इनके साथ बलात्कार किया जाता, तब इनके साथ इसे कोई हमदर्दी नहीं होती। जिन मासूमों का इस दंगे मे बलात्कार हुआ है उनकी खबर जागरण आज मिली है जबकि यह खबर विभिन्न वेबपोर्टल पर सप्ताह भर से चल रही है उर्दू अखबार अजीजुलहिंद इस खबर को चार दिन पहले प्रकाशित कर चुका है, लेकिन उनके साथ जागरण ग्रुप को कोई हमदर्दी नहीं है, इसे तो सिर्फ उन महिलाओं के साथ हमदर्दी है जो हाथों में तबल, लाठी, डंडे, बर्छी, भाले लेकर खुले आम कह रही हैं कि अगर पुलिस गांव में घुसी तो वे उसका बुरा हस्त्र कर देंगी। शायद दुष्यंत ने ये शेर इस संघछाप अखबार के लिये ही लिखा था।

अब तो दरवाजे से अपने नाम की तख्ती उतार,
शब्द नंगे हो गये शोहरत भी गाली हो गई।

लेखक वसीम अकरम त्यागी युवा पत्रकार हैं.

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