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दैनिक जागरण, वाराणसी के निदेशक बीरेंद्र कुमार और संपादक राघवेंद्र चड्ढा की कहानी

: एक ब्याज का धंधा कराता है तो दूसरा दवाओं की फर्जी सप्लाई का : बनारस आजकल गर्म है. दैनिक जागरण के संपादक राघवेंद्र चड्ढा और इसी अखबार के मालिक बीरेंद्र कुमार सुर्खियों में है. एनएचआरएम घोटाले में राघवेंद्र के भाई मानवेंद्र फंसे हैं. मानवेंद्र की गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है. सीबीआई की टीम बनारस में डेरा डाले है. सीबीआई को प्रभावित करने की भी कोशिशें हो रही है. खूब आव भगत हो रही है. कभी बनारस क्लब में सीबीआई को रुकवाया जाता है तो कभी दागी स्वास्थ्य महकमे के गेस्ट हाउस में. दागी सप्लायर और दागी डाक्टर सीबीआई टीम के आगे-पीछे दांत निपोर रहे हैं. सीबीआई के प्रदेश भर के परिचित अफसरों से संपर्क साधा जा रहा है.

: एक ब्याज का धंधा कराता है तो दूसरा दवाओं की फर्जी सप्लाई का : बनारस आजकल गर्म है. दैनिक जागरण के संपादक राघवेंद्र चड्ढा और इसी अखबार के मालिक बीरेंद्र कुमार सुर्खियों में है. एनएचआरएम घोटाले में राघवेंद्र के भाई मानवेंद्र फंसे हैं. मानवेंद्र की गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है. सीबीआई की टीम बनारस में डेरा डाले है. सीबीआई को प्रभावित करने की भी कोशिशें हो रही है. खूब आव भगत हो रही है. कभी बनारस क्लब में सीबीआई को रुकवाया जाता है तो कभी दागी स्वास्थ्य महकमे के गेस्ट हाउस में. दागी सप्लायर और दागी डाक्टर सीबीआई टीम के आगे-पीछे दांत निपोर रहे हैं. सीबीआई के प्रदेश भर के परिचित अफसरों से संपर्क साधा जा रहा है.

नए-पुराने लिंक निकालकर बनारस में आई सीबीआई टीम से बख्श देने के अनुरोध किए कराए जा रहे हैं. सीबीआई की टीम ने अपनी तरफ से कोई सिगनल नहीं दिया है. लोग कयास लगाए जा रहे हैं. क्या फिर से मैनेज हो जाएगा या पाप का घड़ा फूटेगा? यह सच है कि लंबे समय से हो रहे पाप का घड़ा फूटने को आकुल-व्याकुल है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों में दस दस लाख रुपये में सीएमओ के पद पर अपने आदमी की पोस्टिंग कराकर दवाओं व उपकरणों की कागजों पर सप्लाई के घपले के जरिए अरबों कमाने के खेल का भांडा फूट रहा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफों के बारे में कहा जाता है कि वे इसी रैकेट के प्रभारी के रूप में काम करते हैं. आखिर दैनिक जागरण में यह सब कुछ संभव कैसे हो पाता है?  

सूत्र बताते हैं कि जिस एडिशन का डायरेक्टर ही फर्जी काम में लगा हो तो वह अपने अधीनों से कैसे नैतिकता व सरोकार की उम्मीद कर सकता है. दूसरे, उसे अपने गलत काम को संरक्षित करने व आगे बढ़ाने वाले भी चाहिए. इसके लिए सूटेबल ब्वाय उसे मिल गया सो दोनों ने एक दूजे को एक दूसरे की जरूरत में तब्दील कर लिया. दैनिक जागरण, वाराणसी के निदेशक बीरेंद्र कुमार ब्याज का धंधा करते कराते हैं. उनकी पत्नी और वे बनारस के मार्केट में करोड़ों-अरबों रुपये ब्याज पर उठाए हैं. इसकी वसूली के काम को दैनिक जागरण के कर्मचारी रिकवरी एजेंट के रूप में करते हैं. कई बार ब्याज पर गया पैसा फंस जाता है तो जागरण के कर्मी पुलिस आदि का सहारा लेकर जबरन पैसा मार्केट से निकालते हैं. जब मालिक के ढेर सारे स्याह सफेद से संपादक परिचित हो जाता है और उसे आगे बढ़ाने, छुपाने, संवारने में मदद करता है तो फिर वह खुद भी कई तरह के खेल-तमाशे शुरू कर देता है.

बनारस में भी यही हो रहा है. राघवेंद्र चड्ढा दैनिक जागरण के संपादक हैं. युवा हैं. पीआर बहुत तगड़ा है. अफसरों-मंत्रियों-बाहुबलियों से बेहद करीबी रिश्ता है. ये सब आपस में एक दूसरे के खूब काम आते हैं. पिछले दिनों राघवेंद्र को बनारस में अपने नए बने होटल के उदघाटन समारोह में इन्हीं अफसरों मंत्रियों धन्नासेठों बाहुबलियों की अगवानी करते हुए देखा गया. आखिर कैसे कह सकते हैं राघवेंद्र कि उस होटल से उनका रिश्ता नहीं है, और एक बाइक के जरिए पत्रकारिता शुरू करने वाले राघवेंद्र आज करोड़ों के होटल के मालिक हैं, तो सवाल तो खड़ा ही होगा कि पैसा कहां से आया.

राघवेंद्र ने सारे काम अपने भाई या अपनी पत्नी के नाम से कराए. उन्होंने खुद को सामने नहीं रखा. लेकिन जहां सामने आने की स्थितियां आईं, वहां वे सामने दिखे भी. होटल के उदघाटन समारोह से लेकर भाई के यहां पड़े छापे के साइड इफेक्ट को न्यूनतम कराने तक में राघवेंद्र सक्रिय दिखे. लेकिन जो लोग राघवेंद्र को बेहद करीब से नहीं जानते, अब उनके पास भी कहानियां पहुंच रही हैं. कि, इन लोगों का मोडस आपरेंडी क्या है. कैसे आपरेट करते हैं और कैसे कमाते हैं ये लोग.

पुलिस प्रशासन में वरिष्ठ पद पर आसीन कुछ अफसर बताते हैं कि चड्ढा बंधुओं को बचना मुश्किल है. मानवेंद्र और राघवेंद्र की काल डिटेल्स निकलवा कर सीबीआई पड़ताल कर रही है. पिछले दो तीन साल के काल डिटेल्स से यह राजफाश हो जाएगा कि राघवेंद्र की कितनी भूमिका है. दूसरे, मानवेंद्र को गिरफ्तार कर जब सीबीआई इंट्रोगेट करेगी तो वो कैसे नहीं बताएंगे कि आखिर उनके भाई ने किस किस तरह से सारे काम किए कराए. सीबीआई टीम को यह आता है कि वह किसी व्यक्ति से सारे राज उगलवा सके. कई सीएमओ और कई स्वास्थ्य अधिकारियों से अलग अलग पूछताछ के बाद जब मानवेंद्र से आमना सामना कराया जाएगा तो झूठ सच का पता चल जाएगा.

कहा जा रहा है कि बनारस में मीडिया इस समय दो फाड़ है. एक सेक्शन खुलकर राघवेंद्र मानवेंद्र के खिलाफ छाप रहा है. दूसरा ग्रुप सीबीआई जितना संकेत दे, उतने को ही प्रकाशित कर अपना कर्तव्य निभा ले रहा है. लेकिन जानना सभी चाहते हैं कि आखिर इस समय जो पिक्चर चल रही है उसका द इंड क्या होगा. लेकिन बड़ा सवाल तो दैनिक जागरण ग्रुप का है. एनएचआरएम घोटाले के छींटे इस जागरण समूह पर भी पड़ने लगे हैं.

सूत्र बताते हैं कि निदेशक बीरेंद्र कुमार भी कई चीजों से नहीं बचने वाले. जैसे ये कि क्या दवा सप्लाई के कारोबार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनका भी कोई जुड़ाव रहा है. क्या उन्हें भी इस खेल से उपजने वाले पैसे का एक हिस्सा मिलता रहा है. क्या उन्होंने अपने संरक्षण में यह सब कुछ होने दिया. इसे कैसे मान लिया जाए कि हर जिले का ब्यूरो चीफ कागजों पर दवा उकरण आदि के सप्लाई के गेम से जुड़ा हो और निदेशक को खबर तक न हो. मतलब साफ है. ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने के होड़ में लगे बीरेंद्र कुमार ने जान-बूझकर दैनिक जागरण के नाम पर भ्रष्टाचार का एक ऐसा तगड़ा

दैनिक जागरण, वाराणसी के संपादक राघवेंद्र चड्ढा

दैनिक जागरण, वाराणसी के संपादक राघवेंद्र चड्ढा

ताना बना बुना जिसमें सारे खंभे शामिल हुए. बाहुबली, अफसर, जनप्रतिनिधि, पत्रकार आदि के मजबूती फेवीकोली गठजोड़ से खेले जाने वाले इस खेल को जो भी तोड़ने की कोशिश करता, निपटा दिया जाता.

बताते हैं कि यादवेश कुमार, धर्मेंद्र सिंह आदि इसी के भेंट चढ़े. एक दफा शिकायत हुई थी तो दैनिक जागरण, कानपुर के डायरेक्टर संदीप गुप्ता ने जांच टीम भेजी थी. तब भी निदेशक बीरेंद्र कुमार व जांच टीम के सामने राघवेंद्र ने यही कहा कि मेरा भाई अलग काम करता है और उस काम से मेरा कोई लेना देना नहीं. लेकिन बनारस के सभी पत्रकार जानते हैं कि राघवेंद्र और मानवेंद्र कितने अलग अलग हैं. कागजों पर, फाइलों में, आफिसयली चीजें दुरुस्त व ठीकठाक रहें, इसके लिए राघवेंद्र ने शुरू से ही एहतियात बरतना जारी रखा. आज उसी का नतीजा है कि सीधे तौर पर भले राघवेंद्र न फंस रहे हों, लेकिन सीबीआई के तगड़े इनवेस्टीगेशन में उन तक फंदा पहुंचता दिख रहा है.

राघवेंद्र तो जागरण के इंप्लाई हैं. कल उनको घोटाले में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष फंसते देख जागरण प्रबंधन हटाकर अपना दामन बचाने की कोशिश करेगा लेकिन क्या जागरण प्रबंधन अपने मालिकों के खिलाफ भी कार्रवाई करेगा जो खुद गलत कामों को संरक्षण देकर अकूत संपत्ति कमाते हैं. भला कोई मालिक अपने खिलाफ भी कभी कार्रवाई करता है? बीरेंद्र कुमार बने रहेंगे. उनका काम धंधा वैसे ही चलता रहेगा. राघवेंद्र फंसेंगे तो उनकी जगह कोई नया आएगा और नए तरीके के कारोबार को फैलाएगा और उससे मिलने वाले फायदे का हिस्सा बीरेंद्र कुमार तक पहुंचाएगा.

कौन बोलेगा अखबार के मालिकों के खिलाफ? पूर्वांचल के नंबर वन अखबार दैनिक जागरण से भला पंगा कौन लेगा? इनके इशारे पर अफसर, बाहुबली, नेता, मंत्री सब सक्रिय हो जाते हैं. जिसको राजनीति करनी है वह जागरण से पंगा नहीं लेगा. जिसको पूर्वांचल में अफसरी करनी है वह जागरण से पंगा नहीं लेगा. जिसको पूर्वांचल में दबदबा बनाए रखना है वह जागरण से पंगा नहीं लेगा. तो क्या मान लिया जाए कि यह सब चलता रहेगा? दैनिक जागरण, वाराणसी के मालिकान और पत्रकार यूं ही अखबार की आड़े में काले धंधों के जरिए काली कमाई करते रहेंगे?

शायद नहीं. थोड़ा वक्त लगेगा. कुछ ही वर्षों में मीडिया का भी घनघोर कारपोरेटीकरण होने वाला है. कारपोरेट घरानो की निगाह मीडिया की तरफ इसलिए है क्योंकि उन्हें भी मीडिया के बहाने शासन-प्रशासन मैनेज करने के साथ-साथ माल कमाने का नया कारोबार करने का मन कर रहा है. और, कारपोरेट घरानों के लिए मीडिया नया क्षेत्र है जहां पदार्पण की तैयारी है.  शुरुआत हो चुकी है. रिलायंस आ चुका है मीडिया में. टाटा बाटा भी आएंगे. जमकर पैसे लगाएंगे.

वैसे तो मीडिया का कारपोरेटीकरण बुरा है पत्रकारिता के लिए लेकिन हर बुराई अपने साथ कुछ अच्छाई भी लेकर आती है. वो अच्छाई ये है कि कारपोरेट घरानों में आपसी जंग तेज होगी. मीडिया का विकेंद्रीकरण होगा. एक दूसरे के खिलाफ खबरें सूचनाएं लीक की जाएंगी. मतलब, इस प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी. तब जागरण जैसे घरानों का एकाधिकार खत्म होगा. न्यू मीडिया में और ज्यादा लोग आगे आएंगे और इन कारपोरेट हाथियों पर बरछा-भाला मारकर उनकी बेलगाम चाल को नियंत्रित करेंगे. कुछ सच्चे पत्रकार अपने छोटे व नए फारमैट वाले अखबारों पत्रिकाओं मोबाइल एलर्ट ब्लाग आदि से ढेर सारी छुपी बातें चीजें जन जन तक पहुंचाएंगे. यह सब कुछ होते हवाते एक दिन ऐसा लगने लगेगा कि  सूचना देने पाने के माध्यमों पर कुछ एक घरानों का कब्जा टूट चुका है, मीडिया किसी की बपौती नहीं रही. शायद तब अखबार के नाम पर गुंडई में कमी आए, शायद तब स्थिति कुछ सुधरे.

अगर आपको भी इस प्रकरण में कोई नई कहानी, डिटेल आदि पता हो तो भड़ास से शेयर करें, भड़ास तक पहुंचाएं, [email protected] पर मेल करके, यकीन मानिए, हर बात प्रकाशित होगी.

लेकिन फिलहाल तो पूरा पूर्वांचल गरम है. एनएचआरएम घोटाले में दैनिक जागरण की संलिप्तता की कहानियां मीडिया, ब्यूरोक्रेसी से होते हुए पालिटिशयन्स आदि तक भी पहुंच रही है. जितने मुंह उतनी बातें. कल तक जो लोग उनके भक्त हुआ करते थे, आज वो भी दस नई बुराइयां गिना बता रहे हैं. अब निशाने पर राघवेंद्र चड्ढा के साथ-साथ, बीरेंद्र कुमार भी आ चुके हैं. सूत्रों के मुताबिक सीबीआई की टीम को रोज नए तथ्य पता चल रहे हैं. अब टीम  इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि पूर्वांचल में एनएचआरएम घोटाले, दवा उपकरण सप्लाई घोटाले में दैनिक जागरण नामक अखबार की कुल कितनी वृहद भूमिका है. कहने वाले कहते हैं कि दैनिक जागरण के ब्रांड नेम के बल पर बड़ा संगठित घोटाला किया गया है. इसके लपेटे में संपादक राघवेंद्र चड्ढा के साथ निदेशक बीरेंद्र कुमार भी देर-सबेर आएंगे. 

रोग, बीमारी, मौत से जूझते पूर्वांचल की गरीबी का भले खात्मा न हो, लेकिन इस गरीबी के खात्मे के लिए आने वाले बजट, दवाओं आदि का खात्मा करके जरूर कुछ अमीर लोग और ज्यादा अमीर बन गए और बनते जा रहे हैं, इस सीबीआई जांच से यह कहानी भी निकल कर सामने आ रही है. देखते हैं कितने नए तथ्य और अभी सामने आते हैं.

यहां बता दूं, साफ कर दूं, राघवेंद्र चड्ढा मेरे परिचित हैं. बनारस आने जाने के क्रम में कई बार उनसे मुलाकात बात हुई है. पूर्वांचल में किसी पीड़ित गरीब की मदद करने कराने के मामले में कभी मैंने कुछ राघवेंद्र से कहा तो उन्होंने प्राथमिकता के साथ उसे किया कराया. उनकी इस सक्रियता का मैं कायल भी हूं. लेकिन राघवेंद्र के बारे में मुझे वाकई अंदाजा नहीं था कि संपादक होने के साथ साथ राघवेंद्र दूसरे काले धंधों से भी इतने गहरे जुड़े हुए होंगे. एक नए बने दोस्त से दोस्ती टूटने का खतरा पूरा पूरा है. सच्चाई का साथ देने का भड़ास का वादा रहा है और रहेगा. राघवेंद्र को लेकर छोटे मोटे मामले कभी कभार आए तो उस पर मैंने ध्यान नहीं दिया. पर अब जो चीजें भड़ास को पता चल रही हैं, भड़ास तक आ रही हैं, उस पर चुप्पी साधना संभव नहीं है, क्योंकि समय कहेगा अपराध, जो तटस्थ है.

बनारस में बहुत सारे लोगों को बहुत कुछ पता है, लेकिन वे छोटे मोटे स्वार्थों की वजह से चुप्पी साधे हैं. कोई अखबार में छपने से प्रतिबंधित हो जाने के डर से चुप है तो कोई 'हमसे क्या लेना-देना' के नाते चुप है. कोई 'पंगा नहीं लेने का' दर्शन की वजह से चुप है तो कोई 'बच गए तो हर हर गंगे' की उम्मीद में चुप है. खरा बोलने और जेके जउन उखाड़े के ह उखाड़ ला के अंदाज में दबंगई दिखाने के लिए चर्चित बनारस की पत्रकारिता में इन किंतु परंतु लेकिनों के बावजूद कुछ लोग ऐसे जरूर होंगे जो दैनिक जागरण, वाराणसी की पूरी व सच्ची कहानी सामने लाएंगे, कई किश्तों में. भड़ास उनका इंतजार कर रहा है. उम्मीद है, बनारस अब भी वीरों से खाली नहीं.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट.

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