दैनिक ट्रिब्यून के नए संपादक संतोष तिवारी के बारे में कुछ बातें

चार एडीशन वाले देश के सर्वाधिक पुराने अखबार दैनिक ट्रिब्‍यून में अब रिपोर्टिंग की तूती बजेगी। हालांकि नये सम्‍पादक संतोष तिवारी अपना कामधाम पहली जनवरी-13 से सम्‍भालेंगे, लेकिन उन्‍होंने अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। ट्रस्‍ट–स्‍वामित्‍व से निकलने वाले देश के प्रमुख तीन अखबारों में ट्रिब्‍यून का नाम दैनिक हिन्‍दू के बाद है। खालिस पत्रकारिता के झंडाबरदार इस अखबार ने हमेशा आंचलिकता, भाषा और आम आदमी के प्रति अपने सरोकारों के साथ ही खबरों का समर्थन किया, पाठकों को जबरिया सनसनीखेज खबरें पहुंचाने के बजाय।

पत्रकारिता में “एसपी सिंह स्‍कूल ऑफ थॉट” से निकले संतोष तिवारी को मूलत: रिपोर्टर ही माना जाता है। बेसिकली न्‍यूज-वर्कर माने जाते हैं संतोष तिवारी, जिनकी धार सन नवम्‍बर-77 में तब से सान पर चढ़ने लगी,  जब कलकत्‍ता वाली आनंद बाजार पत्रिका की “रविवार” मैग्‍जीन में उन्होंने कानपुर से बतौर स्ट्रिंगर काम शुरू किया। इसी स्‍कूल ऑफ थॉट में बाद में उदयन शर्मा जैसे शख्‍स ने इस धारदार वाली पत्रकारिता की गद्दी सम्‍भाली थी। कानपुर के एकसाथ दो मोहल्‍लों के रहने वाले संतोष ने अपनी शुरूआत में ही कानपुर की स्‍वदेशी कॉटन मिल कांड से लेकर बेहमई कांड जैसे मुद्दों पर जमकर काम किया। जल्‍दी ही संतोष का नाम चमक गया।

अंग्रेजी के “ संडे ” में भी दर्जनों खबरें छपीं। अगला दायित्‍व मिला टाइम्‍स ग्रुप के साप्‍ताहिक “ दिनमान ” में। तैनाती दिल्‍ली में हुई तो आसमान और बड़ा मिल गया। न्‍यू बैंक इंडिया और गोल्‍डेन जुबली करप्‍शन जैसे मामलों के खुलासों से संतोष की धाक जम गयी। 87 में संतोष दैनिक हिन्‍दुस्‍तान से जुड़े। उन्‍हें चंडीगढ और हरियाणा स्‍टेट प्रमुख बनाया गया। पहचान की पताका जल्‍दी ही पिथौरागढ़ से आगरा को मिला कर बनायी गयी नयी टेरिटेरी के प्रमुखी उनके हाथों में आयी। पद था सीनियर करेंस्‍पोंडेंट।

सन 93 में उन्‍हें फिर दिल्‍ली रवानगी मिली। यह पद था डेल्‍ही डिप्‍टी चीफ। उनके सीनियर थे रमाकांत गोस्‍वामी जो आजकल दिल्‍ली सरकार में उद्योग मंत्री हैं। चार साल बाद यानी 16 अगस्‍त-98 को संतोष डेल्‍ही चीफ बनाये गये।उस समय हिन्‍दुस्‍तान को पेशेवर रंग देने में जुटे संपादक आलोक मेहता ने इस जिममेदारी के लिए संतोष को चुना।लेकिन वे खूब जानते थे कि यह एक बड़ी चुनौती थी। एक नये तरीके की। खुद के लिए भी। वजह आफिस में ठस-पने का बोलबाला था। दफ्तर के हर कोनों पर यही हालत।

मसलन, पूरे ब्‍यूरो में कांग्रेसी मानसिकता,  पुरानी सोच के भारी पत्‍थर-रोड़े, प्रोफेशनलिज्‍म पहुंचाने वाली सारी खिड़कियां नदारत और तुर्रा यह कि यूनियन के मोटे-मजबूत जंगले या गहरी-खतरनाक खाईंयां। बदलावों की शुरूआत होते ही बदलाव उबलने लगा। संतोष बताते हैं कि एक वक्‍त ऐसा भी आया जब उन्‍हें सिक्‍यूरिटी गार्ड लेकर चीफ रिपोर्टरी करनी पड़ी।। बकौल संतोष:- यह मेरा टर्निंग प्‍वाइंट था। संतोष तिवारी ने आखिरकार डेढ़ साल में ही पूरे रिपोर्टिंग में कम्‍प्‍यूटराइजेशन करा ही दिया।

इसी बीच अजय उपाध्‍याय ने “ हिन्‍दुस्‍तान ” सम्‍भाला। बेहतर रणनीति बनने लगीं। दिल्‍ली संस्‍करण को चार हिस्‍सों में बांटा गया। दिल्‍ली में पूरब,  पश्चिम,  दक्षिण और उत्‍तर के अलावा नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव और सोनीपत। अब तक संतोष डेढ़ सौ लोगों की टीम का मुखिया बन चुके थे। नाम मिला था सिटी एडीटर। यह रणनीति इतनी सफल रही और विकेंद्रित समाचार तंत्र के बूते हिन्‍दुस्‍तान का प्रसार उछल गया। नतीजा, नयी समूह-सम्‍पादक मृणाल पांडेय ने संतोष तिवारी के सफल प्रयोग और क्रियेटीविटी को पहचानते हुए उन्‍हें फीचर की ओवरहॉलिंग की जिम्‍मेदारी सौपी। वे एसोसियेट एडीटर और चीफ फीचर बने। कुछ नया तूफानी करने की अपनी शैली के तहत संतोष ने रिमिक्‍स शुरू किया। साथ में फेस्‍ट भी लागू किया। जल्दी ही उन्‍हें हिन्‍दुस्‍तान समूह में आउट स्‍टैंडिंग परफारमेंस और कंट्रीब्‍यूशन के लिए “ एचटी स्‍टार अवार्ड “ मिल गया।

20 साल तक हिन्‍दुस्‍तान में झंडा गाड़ने के बाद एक दिन अचानक इंडिया टीवी के रजत शर्मा का आफर मिला। सामने की दीवार पर कैलेंडर था मई-07 का। तब तक यह चैनल तीसरे से पहले स्‍थान पर आने की जद्दोजहद में था, टीम वर्क ने गुल खिलाया और अगले दस महीने में ही उसे पहला स्‍थान मिल गया। लेकिन संतोष ने जल्‍दी ही टीवी को अलविदा कह दिया। क्‍यों, संतोष बताते हैं:- मुझे लगा कि टीवी मेरी दुनिया नहीं है। यहां केवल रफ्तार है। यहां रफ्तार पहले हैं, विचार बाद में। केवल भागादौड़ी में आप कैसे खुद को विचारवान बनाये रख सकते हैं। संतोष बताते हैं:- रफ्तार विचार पर दबाव बनाता है। दोष किसी पर कैसे थोपा जाए। हर शैली की अपनी शर्तें होती हैं। देखिये,  बदलते वक्‍त में मीडिया अब एक जबर्दस्‍त ताकत बनती जा रही है। लेकिन हमें यह तो देखना ही पड़ेगा कि हम किस मीडिया को अपनाएं और किस पर विश्‍वास व आस्‍था रखें। लगा कि मुझे हमारी धरती बुला रही है, जहां मैं खेला, पला और सीखा। आखिर वही तो मेरा निजी परिवार था। यानी प्रिंट। जहां हम कहते नहीं, छाप कर प्रमाणित भी करते हैं।

कहने की जरूरत नहीं कि संतोष का अगला पड़ाव बना दैनिक जागरण। यहां डिप्‍टी एडीटर का काम मिला। सातों दिन चुनौतियां। दैनिक जागरण के फीचर सेक्शन पर पकड़ बनाने के साथ ही कदम मजबूत होते गए और दक्षता ने उपजा मैनेजमेंट का विश्वास, जिसके चलते दायरा पदनाम की जिम्मेदारियों तक सिमटा न रहा। शीघ्र ही जागरण समूह खासकर सखी की संपादक प्रगति गुप्ता की पहल पर एक न्यू यूथ प्रोडक्ट लांच हुआ डेल्ही डिजायर। इसकी प्रोफेशनल लीडरशिप संतोष तिवारी के ही नाम रही। यहां वे तराशे किसी चमकदार रिपोर्टर जैसे तो नहीं रहे, लेकिन बकौल संतोष:- दूसरे हीरों को तराशने का काम, मैं समझता हूं कि, शायद इससे भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण होता है। संतोष बताते हैं कि दैनिक जागरण से विछोह ठीक वैसी तरह है जैसे बेटी विदा हो रही हो।

संतोष अब दैनिक ट्रिब्‍यून में संपादक बन गये हैं। यह पहला चयन है इस अखबार में। ट्रस्‍ट से संचालित देश के तीन बड़े अखबारों में हिन्‍दू सर्वश्रेष्‍ठ माना जाता है। हिन्‍दी में ट्रिब्‍यून श्रेष्‍ठ है। जालंधर, भटिंडा, चंडीगढ़ और नई दिल्‍ली संस्‍करणों से छपने वाले ट्रिब्‍यून का 131 बरसों का इतिहास है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति एसएस सोढ़ी की अध्‍यक्षता वाले इस ट्रस्‍ट में, जम्‍मू-कश्‍मीर के राज्‍यपाल एनएन वोहरा, पूर्व आईएएस अधिकारी आरएस तलवार और पश्चिमी कमांड के सेनाध्‍यक्ष रहे पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एसएस मेहता के अलावा मीडिया की कद्दावर हस्‍ती नरेश मोहन सदस्‍य हैं।

2 फरवरी-1881 को लाहौर से शुरू ट्रिब्‍यून अब शिमला और अम्‍बाला और चंडीगढ के बाद दिल्‍ली में वट-वृक्ष बन चुका है। निजी स्‍वामित्‍व से बरी और पत्रकारिता के शीर्ष मापदंडों पर अडिग ट्रिब्‍यून का मतलब है जनता की आवाज। ऐसी आवाज जो आंचलिक भाषा, संस्‍कार और लोगों के सरोकारों के साथ खबरें परोसता है, सनसनीखेज खबरों और राजनीतिक-आर्थिक मक्‍खन से दूर। अपने नये दायित्‍व पर संतोष प्रसन्‍नता है। वे कहते हैं कि पहले तो मैं इस अखबार और उसके सहयोगियों को समझूंगा। आखिरकार वे बाहरी नहीं,  हमारे ही अपने हैं। मुझे तो जोश है, क्‍योंकि मैं वहां जा रहा हूं। लेकिन हो सकता है कि कुछ लोगों को कोई आशंका हो,  तो इसे दूर करने की कोशिश पहली होगी। ज्‍यादा काम तो चंडीगढ़ में होगा, लेकिन मैं खास ध्‍यान रिपोर्टिंग का रखूंगा। रोविंग रिपोर्टर की तरह, हा हा हा।

अब अंत में बात उनके परिवार पर। सहज, सरल संतोष तिवारी की बेटी साक्षी दिल्‍ली के बिग एफ-एम 92.7 में म्‍यूजिक मैनेजर व रेडियो जौकी है और बेटा अमन मुंबई में म्‍यूजिक प्रोडक्‍शन में। पत्‍नी आशा का नाम बेहतरीन लैंड-स्‍केपिंग डिजाइनरों में है। उन्‍होंने कंस्‍टीट्यूशन क्‍लब, हाईकोर्ट मल्‍टीलेबल पार्किंग और मेट्रो के कई स्‍टेशनों की भी बेहतरीन लैंड-स्‍केपिंग की हैं।

कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

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