दैनिक भास्‍कर प्रबंधन से परेशान क्‍यों हैं पत्रकार?

दैनिक भास्‍कर से प्रतिभाओं के पलायन का सिलसिला लगातार जारी है। पंजाब के स्‍टेट एडिटर रहे कमलेश सिंह के बाद एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर (पंजाब) अभिजित मिश्रा ने भी प्रबंधन को इस्‍तीफे की पेशकर कर दी है। याद रहे इससे पहले इक्‍नोमिक्‍स टाइम्‍स से दैनिक भास्‍कर में बतौर एडिटर मैगजीन आए रोहित सरण भी कुछ ही देर दैनिक भास्‍कर में रह पाए। वह दैनिक भास्‍कर की अंदरूनी  राजनीति से इतनी जल्‍दी तंग आ गए कि भास्‍कर को छोड़ना ही अच्‍छा समझा।

उनके बारे में चर्चा यह थी कि प्रबंधन ने उन्‍हें मैगजींस की जिम्‍मेदारी सौंपी थी, लेकिन कुछ ही देर बाद भास्‍कर ग्रुप के चेयरमैन का ईलाज कर रहे डॉक्‍टर भरत अग्रवाल को उनके ऊपर यह कहकर बिठा दिया गया कि मैगजीन वह देखेंगे। प्रबंधन की ऐसी ओछी नीतियां संवेदनशील पत्रकारों को रास नहीं आती और वह यहां से किनारा करना ही अच्‍छा समझते हैं। दैनिक भास्‍कर के बारे में पहले से ही यह कहा जाता रहा है कि वहां अच्‍छे पत्रकार के लिए काम का माहौल नहीं है। जो चापलूसी कर लेता है, वह आगे ही आगे जाता रहता है और जो सिर्फ अपने काम  पर भरोसा करता है, उसे संस्‍थान पूछता भी नहीं है।

कई बड़े नाम भास्‍कर के इस रवैये से तंग आकर लगातार भास्‍कर छोड़ते रहे हैं। जो नहीं जा पाते वह अपने जीवन के कीमती साल कंपनी को देने के बाद भी किसी कोने में पड़े रहते हैं। हद तो तब होती है, जब प्रबंधन को ग्रुप में काम कर रहे तजुर्बेकार लोग दिखाई नहीं देते और वह बाहर से मोटी तनखाहों पर कम तजुर्बेकार लोगों को लाकर अच्‍छे लोगों के ऊपर बिठा देता है। फिर वह वहीं से सबकुछ सीखकर वहां पहले से काम कर रहे लोगों को काम के बारे में समझाने लगता है। ऐसी हास्‍यास्‍पद स्थिति शायद ही किसी और मीडिया हाउस में हो।

गौर हो कि दैनिक भास्‍कर लुधियाना में हाल ही में नए संपादक शमशेर चंदेल ने बतौर संपादक जॉइन किया है। बताया जा रहा है कि उनका पत्रकारिता के क्षेत्र में केवल 16 साल का तजुर्बा है, वो भी अंग्रेजी मीडिया में। जबकि कंपनी में उनके ज्‍यादा तजुर्बा रखने वाले कई लोग अपनी अनदेखी के कारण दुखी हैं। सूत्रों के अनुसार उन्‍हें अच्‍छी तरह हिन्‍दी भी नहीं आती। याद रहे, इससे पहले यशवंत व्‍यास, फिर रोहित सरण, राजीव सिंह, हरिश्‍चंद्र सिंह, कमलेश सिंह, सुधीर मिश्रा, अभिजीत मिश्रा जैसे बड़े दिग्‍गज पत्रकार भी प्रबंधन की ऐसी नीतियों के कारण ही भास्‍कर छोड़ चुके हैं। चर्चा है कि दैनिक भास्‍कर में काम कर रहे और कई संवेदनशील और अच्‍छे पत्रकार प्रबंधन की ऐसी नीतियों को देखकर इस्‍तीफा देने की तैयारी में हैं। उन्‍हें यह चिंता सताने लगी है कि अगर प्रबंधन इतने बड़े पद पर बैठे लोगों के बारे में इतना असंवेदनशील है, तो उनके बारे में भला क्‍या सोचेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *