दो युवा आईपीएस अफसरों की असमय मौत के मायने

नरेन्द्र कुमार और राहुल शर्मा. इन दोनों में एक समानता थी कि दोनों आईपीएस अफसर थे. इनमें दूसरी समानता थी कि दोनों युवा थे. नरेंद्र की उम्र लगभग तीस साल थी तो राहुल की पैंतीस. नरेन्द्र 2009 बैच के अधिकारी थे तो राहुल 2002 बैच के. एक और समानता थी कि दोनों एक समय के अविभाजित मध्य प्रदेश के दो हिस्सों में तैनात थे. कुछ ऐसा दुर्भाग्य है कि अब इन दोनों में एक और समानता हो गयी है. दोनों ही अब दिवंगत हो गए हैं. एक दुर्योग यह भी है कि दोनों इसी मार्च महीने में दिवंगत हुए.

यह भी एक दुखद समानता रही कि दोनों की मृत्यु ना सिर्फ अकाल मृत्यु थी बल्कि वह खून से सनी हुई मौत थी. अब दोनों ने एक-एक रोता-बिलखता परिवार अपने पीछे छोड़ दिया है. साथ ही दोनों ने अपने पीछे रहस्य का ताना-बाना भी रख छोड़ा है जो हमेशा के लिए एक तिलिस्म बना लोगों के दिलो-दिमाग को उद्वेलित करता रहेगा.

नरेंद्र के मामले में पिता केशव देव, जो स्वयं उत्तर प्रदेश पुलिस में अधिकारी रह चुके हैं और उनकी पत्नी मधुरानी, जो छत्तीसगढ़ में ही एक आईएएस अधिकारी हैं, ने खुलेआम कहा है कि नरेन्द्र की ट्रैक्टर से मौत महज एक हादसा नहीं है, उसके पीछे कोई गहरा षडयंत्र है जिसमे कई सारे बहुत ही ताकतवर लोग शामिल हैं. उन्होंने इस हत्या की गुत्थी सुझाने के लिए सीबीआई से पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है. अभी तक राहुल की मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सका है.

स्व. नरेंद्र

स्व. राहुल

यह तो ज्ञात हो गया है कि राहुल शर्मा नामक इस जांबाज़ पुलिस अधिकारी ने पुलिस अफसर मेस के बाथरूम में खुद को अपने रिवोल्वर से मार डाला है पर यह राज तो अभी राज ही है कि आखिर क्यों? ऐसी कौन सी बात हो गयी थी या ऐसा क्या हो गया था कि एक नौजवान, उत्साहित और डाइनेमिक पुलिस अफसर को अचानक से खुद को गोली मारने की जरूरत आन पड़ी. हो सकता है निकट भविष्य में कुछ राज खुले. यह भी हो सकता है कि आने वाले समय में इस मामले में भी उसी तरह से पेचीदगियां बढ़ जाएँ जिस प्रकार से नरेंद्र कुमार की हत्या के मामले में हुआ है.

संभव है राहुल शर्मा के परिवार के लोग कुछ नए तथ्य, कुछ जाने-अनजाने कारण सामने लाएं. अभी तक जो बात प्रथम-द्रष्टया दुनिया के सामने आई है वह यह कि यह आत्महत्या या तो पारिवारिक कारणों के तनाव से हुआ है अथवा राजकीय कायों से. मध्य प्रदेश के गृह सचिव के एन असवाल यह कहते हुए सुने गए हैं कि राजकीय कार्यों में आधिकारिक तनाव की बात दिखती नहीं है क्योंकि राहुल एक खुश-मिजाज पुलिस अफसर थे और उन्हें कभी भी अपनी नौकरी से कोई भी शिकायत होते नहीं देखा और सुना गया था. मैं समझता हूँ कि अभी ऐसी बात निष्कर्षतः कह देना शायद बहुत अधिक जल्दीबाजी का सबब होगा. हम ऐसी ही एक घटना उत्तर प्रदेश में देख चुके हैं जब करीब दो साल पहले एक बहुत ही खुश-मिजाज माने जाने वाले आईएएस अफसर हरमिंदर राज सिंह ने अचानक खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी.

प्रश्न तब भी यही था-आखिर क्यों, और प्रश्न आज भी एक बार फिर यही है- आखिर क्यों? हरमिंदर राज सिंह के मामले में कई सारी बातें मीडिया में आयीं और कुछ मीडिया में तो नहीं आयीं पर उनकी चर्चा बहुत हुई. यह बात कही गयी कि कहीं किसी काफी ऊपर के स्तर पर हरमिंदर राज पर कुछ ऐसे दवाब डाले गए थे जिसके कारण वह अत्यधिक तनाव में चले गए थे. यह बात भी चर्चा में आई थी कि शायद उन्हें कुछ ऐसी धमकियां भी दी गयी जिनके ताप और शाप को वे बर्दाश्त नहीं कर पाए और बेचारे टूट गए. लेकिन उस मामले में भी उस समय सरकार में तैनात कई अहम अधिकारियों ने पोस्ट मोर्टम रिपोर्ट आने के पहले ही अपने निष्कर्ष जारी करने शुरू कर दिये थे और इस बार राहुल शर्मा के मामले में भी मीडिया में मैंने पढ़ा कि गृह सचिव महोदय का यह निष्कर्ष है कि राहुल की आत्महत्या उनके पेशेगत तनाव से नहीं हो सकता.

मैं यह पूछता हूँ कि इतनी जल्दी यह निष्कर्ष कैसे निकाला जा सकता है? अभी पोस्टमार्टम नहीं हुआ, अभी पूरी बात सामने नहीं आई और रिजल्ट पहले से कैसे डिक्लेर हो गया? कुछ ऐसा ही हरमिंदर राज के मसले में हुआ और कुछ उसी तरह की स्थिति आईपीएस नरेंद्र के मामले में भी देखने को मिला, जब एक तरफ तो उनकी बीवी और पिता चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि उनकी मृत्यु महज एक हादसा नहीं, एक सुनियोजित साजिश है, वहीँ मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार कई उच्चपदस्थ अधिकारी स्वतः ही इससे इतर रिजल्ट निकाल ले रहे हैं.

वैसे एक बात जो इन दोनों अधिकारियों में समान है वह यह कि दोनों को भविष्य में अपने कामों और अपनी जांबाजी के लिए याद किया जाएगा. नरेन्द्र ने मुरैना के दुर्गम ईलाकों में जिस निर्भीकता के साथ अपने शौर्य और पराक्रम का परिचय दिया, वह काबिल-ए-तारीफ़ है. इसी तरह से राहुल ने भी छतीसगढ़ के दांतेवाडा इलाके में अपना पराक्रम दिखाया था, यद्यपि वे इस दौरान थोड़े विवादित भी हो गए थे क्योंकि कई सारे जनपक्षधर संगठन उन्हें अतिवादी सिद्धांत और प्रक्रिया अपनाए जाने का दोषी भी मानने लगे थे. अब राहुल शर्मा और नरेन्द्र कुमार हमारे मध्य नहीं रहे पर यह सत्य है कि अलग-अलग स्थानों पर, अलग-अलग प्रकार से उनकी आकस्मिक और असमय मृत्यु ने अपने आप में कई सारे सवालों को जन्म दे दिया है, जिन्हें मेरे जैसे हर आदमी को एक आईपीएस अधिकारी के रूप में तथा इस देश के एक नागरिक के रूप में रूबरू होना ही पड़ेगा.

लेखक अमिताभ ठाकुर उत्तर प्रदेश के आईपीएस अधिकारी हैं. वर्तमान में लखनऊ में तैनात हैं.

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