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सुख-दुख...

धन्य हैं मोदी जी आप… सुभाष चंद्रा जी आप भी…

Sanjaya Kumar Singh : आज ज़ी न्यूज पर मोदी की रैली लाइव देख-सुन रहा था और इस बारे में पहले लिख चुका हूं, “भाषण बहुत ही घटिया और स्तरहीन था। ऊबाऊ ऊपर से। दोहराव इतना ज्यादा कि क्या कहने।” ज़ी न्यूज पर मोदी की खास बातें हाईलाइट की जा रही थीं, एक समय मुझे लगा नवीन जिन्दल के चुनाव क्षेत्र की रैली मैं ज़ी न्यूज पर क्यों सुन रहा हूं।

Sanjaya Kumar Singh : आज ज़ी न्यूज पर मोदी की रैली लाइव देख-सुन रहा था और इस बारे में पहले लिख चुका हूं, “भाषण बहुत ही घटिया और स्तरहीन था। ऊबाऊ ऊपर से। दोहराव इतना ज्यादा कि क्या कहने।” ज़ी न्यूज पर मोदी की खास बातें हाईलाइट की जा रही थीं, एक समय मुझे लगा नवीन जिन्दल के चुनाव क्षेत्र की रैली मैं ज़ी न्यूज पर क्यों सुन रहा हूं।

फिर ध्यान आया कि लाइव में चैनल क्या कर सकता है – और मैंने चैनल नहीं बदला। अब पता चल रहा है कि मोदी के प्रेरणास्रोत वहीं थे मंच पर। धन्य हैं मोदी जी आप, सुभाष चंद्रा जी आप भी। एक अदद टिकट ले ही लेते। जिन्दल से लड़ाई में लेवल प्लेइंग फील्ड तभी होगा जब आप सांसद बन जाएंगे। टिकट लेना चाहें तो उन्हें कौन रोक सकता है। मीडिया और राजनीति का घालमेल अच्छा नहीं होता है, पर अपने यहां जमाने से चला आ रहा है। ऐसे में नैतिकता आदि की बात करना आजकल वैसे ही फिजूल है।

मेरी चिन्ता तो मालिकानों की इस सक्रियता के बीच नौकरी करने वालों की आजादी और नैतिकता को लेकर रहती है। हमलोग बात उसी पर ज्यादा करते हैं, मालिकान तमाम कारणों से बच जाते हैं या कहिए छोड़ दिए जाते हैं। पत्रकारों और मीडिया संस्थान चलाने वालों के लिए राज्य सभा का टिकट तो वैसे भी भारी या बड़ी रिश्वत है।

प्रभाष जोशी सत्ता विरोधी अखबार में थे, राम नाथ गोयनका सत्ता विरोधी थे ही। आज की स्थिति में वो भाजपा समर्थक ही माने जाते। पर उन दिनों जब वे अपनी पूरी आजादी का उपयोग करते, भाजपा के खिलाफ लिखते या बाकायदा मोर्चा खोलते तो यह अफवाह फैल जाती या फैला दी जाती थी कि प्रभाष जी राज्य सभा में जाना चाहते हैं। एक दफा तो यह हवा भी उड़ी थी कि भाजपा ने शीर्ष स्तर पर अपने मुख्यमंत्रियों से पूछा था कि प्रभाष जी का कोई काम नहीं होने से वो नाराज हैं क्या। यानी पत्रकार है तो इधर या उधर ही रहेगा।

प्रभाष जी अब नहीं रहे तो हम कह सकते हैं कि उन्हें जाना ही नहीं था या वे नहीं गए। वरना लार टपकाने वाले तो बहुत हैं। और हरिवंश जी अपने तमाम आदर्शों को लेकर भी राज्यसभा में गए ही। लोकसभा चुनाव लड़कर जीतने और जनादेश लेने के बारे में प्रभाष जी कहते ही थे कि हम रोज जनादेश लेते हैं तभी बिकते और पढ़े जाते हैं। इसलिए, लोकसभा में जाने को मैं बुरा नहीं मानता भले ही वहां पांच साल में एक ही बार जनादेश लेना होता है। टिकट तो झुकाव या पसंद बताता है, जो ठीक भी है।

उपरोक्त स्टेटस वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने अपने फेसबुक वॉल पर 2 अप्रैल को अपडेट किया. भड़ास तक अपनी बात [email protected] के जरिए पहुंचा सकते हैं.

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