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धुर विरोधियों ने भी मेरी निष्ठा, नैतिकता, चरित्र पर अंगुली नहीं उठाई : राजनाथ ‘सूर्य’

प्रिय यशवंत, आपके दो संवाददाताओं ने मेरा विस्तार से साक्षात्कार लिया था, जिसे मैंने प्रकाशित होने के बाद अभी तक देखा नहीं। आपने उसके बाद मुझे फोनकर इतना बताया कि दयानंद पाण्डेय ने उस पर कुछ टिप्पणी की है। उसके बाद आपने दयानंद पांडेय के बारे में मुझसे पूछा था, तब मैंने बताया कि उन पर अनुशासनहीनता के आरोप थे। मेरे द्वारा उन्हें निलंबित कर देने के बाद प्रबंधकों ने कानपुर संस्करण के स्थानीय संपादक की जांच रिपोर्ट के आधार पर उन्हें स्वतंत्र भारत से निकाल दिया था। जिन लोगों ने आपका वेब पोर्टल देखा है उन्होंने मुझे बताया कि दयानंद पांडेय ने मेरे बारे में कुछ अनर्गल आरोप लगाये हैं।

प्रिय यशवंत, आपके दो संवाददाताओं ने मेरा विस्तार से साक्षात्कार लिया था, जिसे मैंने प्रकाशित होने के बाद अभी तक देखा नहीं। आपने उसके बाद मुझे फोनकर इतना बताया कि दयानंद पाण्डेय ने उस पर कुछ टिप्पणी की है। उसके बाद आपने दयानंद पांडेय के बारे में मुझसे पूछा था, तब मैंने बताया कि उन पर अनुशासनहीनता के आरोप थे। मेरे द्वारा उन्हें निलंबित कर देने के बाद प्रबंधकों ने कानपुर संस्करण के स्थानीय संपादक की जांच रिपोर्ट के आधार पर उन्हें स्वतंत्र भारत से निकाल दिया था। जिन लोगों ने आपका वेब पोर्टल देखा है उन्होंने मुझे बताया कि दयानंद पांडेय ने मेरे बारे में कुछ अनर्गल आरोप लगाये हैं।

अच्छा होता कि निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए आप मुझे जानकारी देकर और पूरी प्रतिक्रिया जानकर उसे प्रकाशित करते। भड़ास देखने वाले कुछ मित्रों ने जो जानकारी दी,  उससे मुझे कष्ट इसलिए हुआ क्योंकि पिछले 50 सालों से अधिक इस क्षेत्र में रहने और कुछ दिनों तक राजनीतिक कार्य करने के बावजूद मेरे धुर विरोधियों ने भी मेरी निष्ठा, नैतिकता और चरित्र पर कभी अंगुली नहीं उठाई। मैं दयानंद के कथनों का जवाब तो नहीं देना चाहता था परंतु कुछ तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक इसलिए समझता हूं क्योंकि वर्तमान और भावी पत्रकारों की मेरे प्रति जो आस्था है उसको आघात न लगे। मेरे कुछ बिंदु हैं, जिसे मैं बता रहा हूं…

1- मैंने स्वतंत्र भारत से उसी दिन त्यागपत्र दे दिया था जिस दिन प्रबंधन ने स्व. घनश्याम पंकज को मेरे ऊपर प्रधान संपादक नियुक्त किया था। तब जयपुरिया नहीं, थापर पत्र के मालिक बन गए थे। दस पृष्ठों में लिखा गया वह त्यागपत्र आज भी मेरे बहुत से सहयोगियों के पास दस्तावेज के रूप में रखा हुआ है।

2- मैंने मकान के लिए रजिस्ट्रेशन उस समय कराया था जब दैनिक आज का लखनऊ ब्यूरो प्रमुख था। उस समय मेरे सहयोगी अजय कुमार और राजेन्द्र द्विवेदी ने कहा कि अगर आपके पास पैसे नहीं हैं तो हम सड़क पर खड़े होकर चंदा इकट्ठा कर लेंगे। पत्रकारपुरम में मकान का आवंटन अनुदानित दर पर हुआ था। यदि मैं एकमुश्त राशि जमा कर देता तो 80 हजार रुपए में उसका रजिस्ट्रेशन हो जाता। मैं एक लाख 40 हजार रुपए जमा करके उसका पूरा रजिस्ट्रेशन तब कराया जब दैनिक आज से त्याग पत्र देने के बाद मुझे ग्रेच्युटी आदि के रूप में लगभग दो लाख रुपए मिले थे।

3- मैं यह नहीं जानता कि मेरे सहपाठी वीर बहादुर सिंह ने मेरी सिफारिश की थी या नहीं लेकिन मुझे जयपुरिया ने बुलाकर उस समय संपादक का दायित्व संभालने के लिए कहा जब मैं आज अखबार से त्यागपत्र देने के बाद सहायक संपादक के रूप में दैनिक जागरण में कार्यरत था। मुझे लखनऊ में 1964 से कई बार आवासीय योजना में प्लाट आवंटित हुए थे लेकिन धनाभाव के कारण मैं उन्हें नहीं ले सका। मैं नवल किशोर रोड पर लखनऊ विकास प्राधिकरण के दो कमरे के फ्लैट में 25 वर्ष रहा हूं। प्राधिकरण ने अपने सभी आवासीय फ्लैट बेच देने की घोषणा की थी और जितने दिनों से आवंटी रहता था, उसका डिप्रेसिएशन काटकर आवंटी को देने की योजना घोषित की थी। मैं जब राज्यसभा सदस्य था, उस समय कुल एक लाख 10 हजार रुपए का मूल्य चुकाकर मैंने उसे खरीदा था और वो आज भी मेरे पास है।

4- दैनिक जागरण के लखनऊ संपादक स्व. विनोद शुक्ला उस समय से मेरे घनिष्ठ मित्रों में रहे जब मैं और वह दोनों दैनिक आज में थे। हमारी यह मित्रता बराबर बनी रही। मैं आज तक किसी भी वर्ष लखनऊ महोत्सव के कार्यक्रम में कभी नहीं गया।

5- जब तक मैं हजरतगंज में रहता था कभी बोटिनिकल गार्डेन और कभी कैंटोमेंट से दिलकुशा गार्डेन, लामार्टिनियर और कालीदास मार्ग की दूरी जो लगभग 10 किमी थी, तय करता था। उस दौरान मेरा यह रिकार्ड रहा है कि मैं प्रतिदिन कम से कम एक ऐसी खबर राजनीतिक या प्रशासनिक अवश्य देता था जो किसी अन्य पत्र में नहीं रहती थी। इसके कारण ही मुझे खोजी पत्रकार के रूप में मान्यता मिली थी और इस प्रकार का समाचार प्रातःकाल टहलने के समय प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक लोगों की भेंट-मुलाकात से मिलती थी। मेरा नाम कभी भी किसी भी प्रकार से सरकार से उपकृत होने के रूप में कभी उल्लिखित नहीं हुआ है जबकि सरकार की मेहरबानी से नगद रुपया लेने और मकानों का आवंटन पाने वालों की सूची कई बार प्रकाशित की गयी है।

6- शायद ही ऐसा कोई मुख्यमंत्री हुआ हो जिससे विचारों में मतभिन्नता के बावजूद मेरी नजदीकी न रही हो। कई मुख्यमंत्री मुझसे मिलने मेरे आवास पर भी आते थे। यदि मैं उपकृत होना चाहता तो बहुत कुछ प्राप्त कर सकता था लेकिन वह सब मैं स्वाभिमान खोकर ही प्राप्त करता। मैं आठ वर्ष की आयु से ही आरएसएस का स्वयंसेवक हूं। जहां से मुझे निष्ठापूर्ण कर्तव्यपालन और स्वाभिमान से सिर ऊंचा कर रहने की प्रेरणा प्राप्त हुई है। मैं इन्हीं दोनों के सहारे आगे बढ़ सका हूं और उस पर कायम हूं।

कृपया मेरे संबंध में कोई बात प्रकाशित करने से पूर्व निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए उसकी पूरी छानबीन कर लें, श्रेयस्कर होगा। इससे आपकी विश्वसनीयता बढ़ेगी।

धन्यवाद।

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’

वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व सांसद


पूरे प्रकरण को जानने के लिए इन शीर्षकों पर एक-एक कर क्लिक कर सकते हैं….

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