नईदुनिया का पराभव (अंतिम) : सफल होने के लिए चाहिए साक्षी जैसी पूंजी व सरकारी समर्थन

नई दुनिया के बहाने दो किस्तों में आपने पढ़ा, छोटे व मझोले क्षेत्रीय अखबारों की चुनौतियां. इन चुनौतियों में बढ़ती कर्ज की कीमत (यानी सूद) मारक है. फ़िर सबसे घातक है, न्यूज प्रिंट की लगातार बढ़ती कीमतें. कागज की मिलों का बंद होना, डॉलर के मुकाबले रुपये का कमजोर होना. एक छोटे अखबार में कुल टर्न ओवर का 70 फ़ीसदी सिर्फ़ न्यूज प्रिंट पर खर्च होता है. विज्ञापन बाजार भी अनेक संस्करण वाले अखबारों के पक्ष में है. इस तरह क्षेत्रीय पत्रकारिता के सामने कई मारक चुनौतियां हैं. भविष्य में कोई अखबार ताकतवर बनना चाहता है, तो उसे कैसा सपोर्ट चाहिए, पढ़िए अंतिम किस्त में.

अब यह कतई आवश्यक नहीं है कि आप सर्वश्रेष्ठ अखबार निकाल रहे हैं. बेस्ट (सर्वश्रेष्ठ) टीवी चैनल हैं, तो आप अपनी गुणवत्ता के आधार पर कायम रह पायेंगे. आपका प्रतिस्पर्धी अगर आपसे कम कीमत पर अखबार निकालता है, जिसमें अच्छी साज-सज्जा है, कंटेंट भी ठीकठाक है, वह पाठकों को पुरस्कार देता है, लाटरी ड्रा जैसे कार्यक्रम कराता है, उसके मल्टीस्टेट संस्करण हैं, तो वह बाजार में टिकेगा. गणित इस तरह बन गया है कि कुछेक घराने अंगरेजी से लेकर अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशन और साथ ही साथ कई हिंदी राज्यों से प्रकाशन कर रहे हैं. इंटरनेट, रेडियो, टीवी या लोकल चैनलों पर भी उपस्थित हैं.

एक ही घराना. इस तरह के घरानों की ताकत के पीछे एक बाजार है. देहाती कहावत है, कहां राजा भोज कहां गंगू तेली. माफ़ कीजिएगा, यह जाति पर कोई टिप्पणी नहीं है. गंगू तेली कितना भी अच्छा इंसान हो. सच का पुंज हो. नैतिकता का अवतार हो. अनुशासित हो. मर्यादित हो. देश, समाज और दुनिया के बारे में सोचता हो. इसके विपरीत राजा भोज, हर अवगुण की खान हो. पर हम इतिहास के जिस मोड़ पर जी रहे हैं, उसमें राजा भोज ही कारगर, सम्मानित और आदर्श है. इसलिए बाजार की ताकत व इन आर्थिक नियमों का खेल समझना जरूरी है. क्या यह शुद्ध रूप से पूंजी की लड़ाई है? नई दुनिया ने अगर दो सौ करोड़ की पूंजी लगायी, तो वह पूंजी इस बाजार की कठिन लड़ाई से है.

इस बाजार में यह 200 करोड़ कोई बड़ी पूंजी नहीं है. दफ्तर के अंदर अक्षमता, चापलूसी, अयोग्यता वगैरह बाद में आते हैं. इसलिए बड़े अखबारों के सामने अच्छा प्रोडक्ट लेकर, अच्छी मार्केटिंग कर, प्रोफ़ेशनल बन कर भी आप बेहतरीन ब्रांड को आसानी से बचा नहीं सकते. यह छोटे अखबारों की सफ़ाई-धुलाई का दौर है. बड़े अखबारों के संचालक मानते हैं कि यह मार्केट कांसोलिडेशन का दौर है. कुछ ही दिनों की बात है. इसके बाद कुछेक ही बड़े अखबार बचेंगे.

क्योंकि यहां बेमेल मुकाबला है. शुद्ध पत्रकारिता और बाजार बल से पोषित पत्रकारिता के बीच असामान्य मुकाबले की स्थिति है. अर्थशास्त्र में इकोनॉमिक स्टेज ऑफ़ ग्रोथ (आर्थिक विकास के अलग-अलग दौर) पढ़ाया जाता है. उसी तरह मीडिया में भी आर्थिक विकास का दौर आया. उस आर्थिक दौर में, जिन लोगों ने अपना फ़ैलाव तेजी से कर लिया. जो बाहरी-भीतरी या शेयर बाजार से पूंजी जुटा कर पसर गये. बढ़ गये. बाजार पर कब्जा जमा लिया. वे सिकंदर हैं. एक ही अखबार घराना 50-50 जगहों से फ़ैल कर अखबार निकालने लगा.

वह दौर ही पत्रकारिता में आनेवाले भविष्य की नींव तैयार कर गया. 1990-2000 के बीच जो अखबार पसर गये. फ़ैल गये और ताकतवर हो गये. अब वे बड़े घराने बन कर उभर चुके हैं. बैठने और जमने की दृष्टि से, व्यवसाय की दृष्टि से, वह हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग रहा. कम निवेश में तब वे नयी जगह चले गये. आज किसी बाजार में निवेश कर मुकाबला करना, पहले से ज्यादा खर्चीला और कठिन हो गया है. नया संस्करण खोलना और अखबार जमाना लगातार ‘कास्ट इंटेंसिव’ (अधिक खर्चीला) हो गया है. पैसे वाले प्रतिस्पर्धी हैं. ब्रेक इवन पीरियड (खर्च और आय बराबर होने की स्थिति) का समय अब पांच वर्ष माना जाने लगा है.

पहले वह तीन वर्ष माना जाता था. विशेषज्ञों का यह भी अनुमान है कि हिंदी प्रिंट मीडिया का विज्ञापन बाजार अब धीरे-धीरे ठहराव (स्टेगनेंट) की स्थिति में होगा या घटेगा. क्योंकि मीडिया में कई नये माध्यम आ गये हैं. इंटरनेट, रेडियो, रोज बढ़ते टीवी चैनल्स वगैरह. अब बाजार हासिल करना कठिन हो गया है. 90 के दशक में एम.जे. अकबर ने एशियन एज निकाला. अपने ढंग का अनूठा और नया अखबार. कठिन प्रतिस्पर्धा में. भारी मुसीबतों से उस अखबार को भी गुजरना पड़ा. कई जगहों पर अनेक प्रकाशक, इंवेस्टर, निवेशक बदल गये. कुछेक वर्षो में ही. एक दौर आया, जब उन्होंने इसे डेक्कन क्रानिकल को बेच दिया. तब शेयर बाजार की स्थिति अच्छी थी. देश की आर्थिक स्थिति के भी अच्छे दिन थे.

उन्हें इस अखबार की अच्छी कीमत मिली. याद है, उन्होंने इस सौदे पर अपनी टिप्पणी दी थी- इस दिन के लिए मैं बहुत दिनों से प्रतीक्षा कर रहा था. अपने हुनर, कौशल और योग्यता से उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अखबार को सींचा, जमाया और बेच डाला. एक व्यक्ति के जीवन में आर्थिक स्थायित्व की दृष्टि से यह अत्यंत ईमानदार प्रयास था. शायद यह पहली बार हुआ कि किसी योग्य पत्रकार ने अपनी योग्यता के आधार पर कंपनी बना कर, उसकी कीमत पायी.

ऐसा क्यों हुआ? इसके गणित पर गौर करना जरूरी है. पहले मामूली लोग भी कुछ पैसे उधार लेकर प्रेस लगा लेते थे. अखबार शुरू कर देते थे. तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकाल लेते थे. वे दिन जज्बात के दिन थे. विचारों के दिन थे. साधन और साध्य में एका के दिन थे. साधन और साध्य में संतुलन के दिन थे. अखबार के बाजार या व्यवसाय में एक सीमा के बाद, गलत मापदंड (अनफ़ेयर प्रैक्टिस) स्वीकार्य नहीं था. इसलिए तब बहुत अखबार चलते थे. लगातार निकलते थे. धीरे-धीरे अखबार में या मीडिया में प्रवेश कीमत (इंट्री कास्ट), यानी निवेश वगैरह इतना बढ़ गया कि अब कोई सामान्य निवेशक 50-100 करोड़ लेकर भी अखबार शुरू नहीं कर सकता.

सामान्य भाषा में इसे इस रूप में समझिए, जैसे पुराने दिनों की तरह आज बिना पैसा के कोई चुनाव नहीं लड़ सकता. दल चलाने के लिए अरबों चाहिए. एक चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम 5-10 करोड़ हो, तो आप चुनाव लड़ने का सपना देख सकते हैं. लोकतंत्र में कहने के लिए चुनाव लड़ने का अवसर सबको उपलब्ध है. पर सच्चाई यह है कि अब धनवान ही चुनाव लड़ सकते हैं. यह लोकतंत्र का फ़ैलाव है या सिमटना, इसकी व्याख्या और बहस बौद्धिक लोग करें.

उसी तरह या इसी पैटर्न पर आज मीडिया में या प्रिंट मीडिया में सामान्य पूंजी वाले या औसत 50-100 करोड़ के निवेशकों के लिए अघोषित प्रतिबंध लग गया है. चुनाव खर्च की तरह यहां भी इंट्री कास्ट इतना बढ़ गया है कि आप 500-1000 करोड़ के बिना अखबार क्षेत्र में उतर ही नहीं सकते. पहले माना जाता था कि ब्रेक इवेन न्यूनतम 3-4 वर्षो में हो जायेगा. पर अब इंडस्ट्री (अखबार) का निष्कर्ष है कि न्यूनतम 5-6 वर्ष ब्रेक इवेन के लिए चाहिए. इस प्रकरण को समझने के लिए वर्ष 2008 (28 मार्च) में आंध्र प्रदेश से शुरू हुए अखबार साक्षी का उदाहरण सबसे अच्छा है. साक्षी तेलुगु का अखबार है. यह वहां के सबसे स्थापित अखबार इनाडु को चुनौती देने के लिए निकाला गया.

इनाडु के संस्थापक रामोजी राव की जीवन यात्रा और इनाडु की सफ़लता की कहानी बेमिसाल है. भारतीय क्षेत्रीय पत्रकारिता में हुई क्रांति का यह प्रतीक है. भारतीय क्षेत्रीय पत्रकारिता में बदलाव पर जो सबसे गंभीर और चर्चित पुस्तक लिखी गयी, प्रो. राबिन जेफ्री द्वारा, उसमें इस अखबार का विशेष अध्ययन है. जिले-जिले तक का संस्करण इस अखबार ने निकाला. आंध्र के अतियुवा, महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री वाई. राजशेखर रेड्डी इससे परेशान थे. उन्होंने अपने बेटे जगन रेड्डी को आगे किया. बड़ी कंपनी बनायी और बेटे जगन रेड्डी की रहनुमाई में साक्षी निकाला.

यह एक साथ 23 जगहों से निकला. आंध्र के 19 जिलों से. साथ में चार बड़े महानगरों से भी. दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु से. 24 पन्नों का अखबार. सभी रंगीन पेज. साथ में 12 पन्नों का फ़ैमिली एडिशन था. यानी कुल 36 पेज का अखबार रोज. विदेशी न्यूजप्रिंट पर. सभी कलर पेज. सूचना यह मिली की दो वर्षों तक वह घाटे पर चला. हालांकि अखबार का व्यवसाय समझने वाले इसे बहुत कम आकेंगे.

शुरू के दिनों से ही इस अखबार को पिता मुख्यमंत्री ने कॉमर्सियल दर से विज्ञापन देना शुरू किया. कुछ राज्य डीएवीपी द्वारा स्वीकृत सरकारी दर पर अखबारों को विज्ञापन देते हैं. बिहार और झारखंड, उत्तर प्रदेश वगैरह. कुछ राज्य सरकारें, अखबारों को कॉमर्सियल दर पर सरकारी विज्ञापन देती हैं. आंध्र भी ऐसा करता है. आमतौर से एक अखबार के निकलने के बाद, राज्य सरकार द्वारा विज्ञापन मिलने की प्रक्रिया में वर्षों लग जाते हैं. जैसे नया निवेशक होगा, तो छह माह लगातार प्रकाशन के बाद उसे केंद्र सरकार के सूचना मंत्रालय में आवेदन देना होगा.

वहां से रेट स्वीकृत होकर मिलेगा. तब राज्य सरकार मान्यता देगी. इसमें वर्षों लग जाते हैं. पर इस साक्षी अखबार को शुरू से ही विज्ञापन मिलने लगा. अब अनुमान लगाइए कि 23 संस्करण निकालने के लिए कुल निवेश कितना हुआ होगा? खबर तो आयी 400 करोड़ की. पर वाई. राजशेखर रेड्डी सरकार समर्थित इस अभियान में पहले से ही पुत्र जगन रेड्डी के पास हर जगह प्राइम लोकेशन पर अपनी जमीन थी. हर जिले में. लगभग मुफ्त. इस जमीन की कीमत और अन्य चीजें निवेश के तौर पर जोड़ दें, तो न्यूनतम निवेश 1000 करोड़ से अधिक का रहा होगा. 19 संस्करण शुरू करने में. शुरू करने के बाद कई वर्षों तक इसका भारी वर्किंग लॉस (कार्यकारी घाटा) अलग. चूंकि यह कंपनी एक मुख्यमंत्री और उनके बेटे की थी, तो इसमें आधुनिक कारपोरेट वर्ल्ड के गणित लगाये गये.

डेलाइट जैसी मशहूर कंपनी से इसका मूल्यांकन कराया गया. 2010 में. 4500 करोड़. पिता मुख्यमंत्री थे, इसलिए बड़ी कंपनियों को कहा गया कि इस वैल्यूएशन पर आप इसके शेयर लें और इसमें निवेश करें. विदेशों से भी निवेश आया. राजशेखर रेड्डी के न रहने पर, जगन रेड्डी के बागी होने पर, कांग्रेस ने जगन रेड्डी के खिलाफ़ सीबीआई जांच बैठा दी. इस सीबीआई जांच से जो तथ्य सामने आये हैं. उसके तहत कई बड़े आईएएस अधिकारी जेल में हैं. जेल जाते हुए, उनके रोने की तस्वीरें छपी हैं. वाई. राजशेखर रेड्डी के मुख्यमंत्रित्व काल में हुए स्तब्ध करने वाले घोटाले सामने आये हैं.

बड़ी-बड़ी कंपनियों को आंध्र में काम मिलता था. साथ ही मौखिक निर्देश भी कि साक्षी में कितना विज्ञापन देना है. कोई डील करोड़ों से कम की नहीं होती थी. अखबार लांच के समय, एक साथ 12000 सर्वेयर बाजार में उतारने का काम साक्षी के प्रोमोटरों ने किया. उनका पहला लक्ष्य था कि इनाडु अगर प्रतिदिन दस लाख बिकता है, तो पहले दिन से ही साक्षी के 11 लाख ग्राहक बना लेना. वह भी लगभग मुफ्त अखबार देकर. तीन माह तक मुफ्त अखबार बंटवा कर. 30-40 पेज का अखबार तीन महीने तक मुफ्त बंटा.

सैंपलिंग के तौर पर. 11 लाख लोगों के बीच. पूरे राज्य में कोई होर्डिंग नहीं बची, जहां प्रचार का विज्ञापन नहीं लगा हो. साथ में साक्षी टीवी चैनल भी खोला गया. अब इन सब चीजों में हुए निवेश को जोड़ दीजिए, तो आप स्तब्ध हो जायेंगे. यह न्यूनतम 1000-1500 करोड़ के बीच रहा होगा. इसके बाद 4-5 वर्षो तक घाटा उठाने का सामर्थ्‍य अलग, यानी इतनी राशि वर्किंग लॉस के लिए अलग से चाहिए. तब आप, आज के अखबार बाजार में टिकने का सपना देख सकते हैं. अब, आप सोचें कि साक्षी के मुकाबले कोई प्रतिस्पर्धी अगर तेलुगु में अखबार निकालना चाहे, तो उसे आज 3000 करोड़ की न्यूनतम राशि चाहिए.

फ़िर पीछे से सरकार का वह समर्थन, जो एक अंधभक्त पिता अपने पुत्र को देता है. ईमानदार पिता का सहयोग नहीं. देश के एक मशहूर अखबार घराने ने एग्रेसिव मार्केटिंग और इस तरह के खर्चीले मॉडल से अपनी जगह बनायी है. पूरे देश में. उसने मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान की सफ़लता के बाद तेलुगु में भी जाने का कार्यक्रम तय किया था. हैदराबाद में जगह ले ली गयी. मशीनें चली गयी थीं. इसी बीच साक्षी का उदय या धमाका हुआ. अब इस धमाके के मुकाबले बड़ा धमाका करने का सामर्थ्‍य चाहिए था. तेलुगु पत्रकारिता में आने के लिए. पर उसे लौटना पड़ा. यही हाल है हिंदी के मझोले या छोटे अखबारों का. बड़े अखबारों के मुकाबले वे सामर्थ्‍य, पूंजी, पहुंच और प्रभाव में असहाय हैं.


इससे पहले के भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें नईदुनिया का पराभव (एक) : सिर्फ़ चापलूसों की फ़ौज डुबा सकती है?

नईदुनिया का पराभव (दो) : स्‍वनाम-धन्‍य पत्रकारों की योग्यता क्या है? उनकी कुल संपत्ति क्या है?


अब जगन रेड्डी के खिलाफ़ चल रही सीबीआई जांच में एक से एक विस्मयकारी और हिला देने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं. कैसे साक्षी के लिए तरह-तरह के गोरखधंधे हुए? साक्षी अखबार का प्रकाशन एक घटना है. यह समझने और समझाने के लिए कि आज के दौर में ऐसी ही पृष्ठभूमि के नये अखबार घरानों का उदय हो सकता है, जिनके पीछे व्यवस्था की पूरी ताकत हो, यानी राजनीति, उद्योग, प्रशासन और नौकरशाही की मिलीभगत से पनपी नाजायज ताकत. ऐसी ताकतों से समर्थित अखबार घराने ही इस दौर के मुकाबले में ठहर और टिक सकते हैं. 13 मार्च की खबर है. उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश में छह मंत्रियों और आठ आईएएस अफ़सरों के बारे में नोटिस जारी किया है. आरोप है कि राजशेखर रेड्डी के कार्यकाल में हुए स्तब्धकारी घोटालों की सीबीआई जांच में इन सबके नाम हैं.

इनके खिलाफ़ पर्याप्त साक्ष्य हैं. इन सबने पूर्व मुख्यमंत्री को धन एकत्र करने के लिए भरपूर सहयोग दिया. पर इनके खिलाफ़ सीबीआई जांच आगे नहीं बढ़ रही है. न कार्रवाई हो रही है. पेंच यह है कि कई आईएएस, आईपीएस इस मामले में जेल गये हैं. अगर इन छह मंत्रियों और आठ आईएएस अफ़सरों पर कार्रवाई हो गयी, तो कांग्रेस की आंध्र की सरकार ही चली जाएगी. उधर सीबीआई जांच में इन सबके खिलाफ़ पुख्ता सबूत हैं. इसके तहत इन लोगों ने मुख्यमंत्री वाई. राजशेखर रेड्डी के कार्यकाल में उनके बेटे जगन मोहन रेड्डी को अवैधानिक तरीके से, आय कराने में हरसंभव मदद की.

आठ मार्च को इस मामले में चल रही जांच में यह भी खबर आयी कि सीबीआई को लगातार जगन रेड्डी के खिलाफ़ पर्याप्त सबूत मिल रहे हैं. इसके तहत विशेष अदालत के सामने यह सूचना भी दी गयी कि सीबीआई द्वारा वाई. राजशेखर रेड्डी के जमाने में 20 हजार एकड़ जमीनों का आबंटन अगल-अलग लोगों और कंपनियों के बीच किया गया. इसके बदले जगमोहन रेड्डी को 850 करोड़ की राशि मिली. यह एक तरह का कमीशन था. जिन लोगों के खातों से यह पैसा जगन मोहन रेड्डी की कंपनियों तक पहुंचा, वे हिरासत में हैं और उनके खिलाफ़ ठोस और पुख्ता प्रमाण मिल गये हैं. इस तरह, एक सरकार समर्थित अखबार घराना, इतने बड़े पैमाने पर निवेश कर सका और मैदान में उतरा. इस तरह से एकत्र बड़ी पूंजी के बल पुराने, पहले से जमे-स्थापित व बड़े अखबारों को चुनौती दे सका. अब साक्षी आंध्र में एक स्थापित अखबार है.

कल्पना करिए, ब्लैक मनी की ताकत से निकले इस अखबार की भूमिका क्या होगी? क्या यह सच के लिए लड़ेगा? देश की बात करेगा? समाज-राज्य के मूल सवालों से इसका सरोकार होगा? गरीबी की बात करेगा. इसे नैतिकता से सरोकार होगा? या जगन मोहन रेड्डी जिस तरह की राजनीतिक ताकतों का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन्हीं को मजबूत करेंगे? इस तरह समझ लीजिए कि आजकल के अखबार मूल्यों की बात क्यों नहीं करते? सात्विकता, ईमानदारी या सच की ताकतों के साथ क्यों खड़े नहीं होते? क्योंकि इनका उदय स्‍त्रोत ही गलत है. अब मार्केट में स्पर्धा कितनी कठिन है. जानना हो, तो साक्षी (तेलुगु) के उदय के तथ्य जानने चाहिए. कई जगहों से प्रकाशित, प्रतिस्पर्धी अखबार इनाडु के मुकाबले साक्षी ने अनेक नयी-नयी चीजें कीं. बड़ी पूंजी के बल. फ़िर भी उसके आरंभिक दिनों में बड़े घाटे रहे.

इस अखबार में इतना बड़ा निवेश भी इसलिए संभव हो पाया क्योंकि इसके पीछे थे, आंध्र के मुख्यमंत्री वाई. राजशेखर रेड्डी. अत्यंत प्रभावशाली, सामर्थ्‍यवान और संपन्न. अगर आप आज की कारपोरेट पॉलिटिक्स में दखल रखते हैं, तो आपके लिए बड़ी पूंजी या पैसा बड़ा सवाल नहीं है. आपका प्रभाव अलग ढंग से काम करता है. आप बड़े घराने हैं या प्रभावकारी हैं, तो बाजार में कोई भी अखबार सर्कुलेशन में आगे रहे, पाठक संख्या की दृष्टि से आगे रहे, मजबूत रहे. पर आप उस परसेप्शन (अवधारणा) को प्रभावित कर लेते हैं, जिससे बाजार किसी अखबार के प्रभाव या असर को मापता है. अंतत: यह मैनेज्ड असर या प्रभाव ही विज्ञापन लाने का कारक बनता है.

आपकी ईमानदार स्थिति नहीं. गौर करिए, सिर्फ़ अच्छा अखबार निकाल लेना आज अपर्याप्त और अधूरा है. हर स्टेज पर मैनेज करने की कला अगर आपमें नहीं है, तो अखाड़े की कुश्ती हारना तय है. आंध्र की कपटी राजनीतिक ताकतों को परास्त करने के लिए अगर सच की ताकत, ईमानदारी की ताकत, न्याय की ताकत, सात्विकता की ताकत आगे बढ़ना चाहे, तो उसके समर्थन में कौन खड़ा होगा? आजादी की लड़ाई में मान्यता थी कि यदि तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो. गांधी ने अखबार निकाला. महर्षि अरविंद ने निकाला. कांग्रेस ने नेहरू के नेतृत्व में नेशनल हेरल्ड की नींव डाली. अब अगर आज सात्विक ताकतों को सिर्फ़ सच बातों के लिए कोई अखबार निकालना हो, तो वे साक्षी जैसे अखबार को परास्त करने के लिए कहां से और कितनी पूंजी लायेंगे? साक्षी सिर्फ़ एक संकेत है, एक अकेली घटना नहीं. यह हड़िया का एक चावल है, जो बताता है कि पूरे चावल या भात की क्या स्थिति है? लेकिन अब वह अखबार चल निकला है.

पाठकों को कम कीमत पर 36 पेज का बढ़िया अखबार मिल रहा है. इनाडु ने क्षेत्रीय पत्रकारिता में जिला संस्करण निकाल कर सबको चौंकाया था, तो साक्षी ने हर विधानसभा क्षेत्र पर संस्करण निकाल कर इनाडु को सांसत में डाला. अब कोई तीसरा प्रतिस्पर्धी इसका मुकाबला करना चाहता है, तो आंध्र के सभी पंचायत स्तर पर संस्करण निकालने होंगे. यानी वो कई हजार की संख्या में होंगे. अब इस उपभोक्तावादी समाज का दर्शन जान लीजिए. इसे सच्चा अखबार चाहिए. सही अखबार चाहिए. सत्य हरिश्चंद्र जैसे पत्रकार चाहिए. पर यह सब लगभग मुफ्त में चाहिए. ऊपर से पढ़ाने का गिफ्ट भी चाहिए.

अब साक्षी, जिसके 12-14 लाख पाठक हैं, क्या वे साधन और साध्य की शुचिता पर सोचते हैं? जगन रेड्डी के खिलाफ़ सीबीआई

जांच से इस अखबार के बारे में असंख्य स्तब्धकारी जानकारियां सामने आयीं. साक्षी के किसी एक पाठक ने या समाज ने एक भी अखबार छोड़ा? हिंदी में भी यही स्थिति है.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. वे बिहार और झारखंड में नंबर वन हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है.

 

 
 

 

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