नईदुनिया का पराभव (दो) : स्‍वनाम-धन्‍य पत्रकारों की योग्यता क्या है? उनकी कुल संपत्ति क्या है?

: अखबारों का अर्थशास्त्र समझें : पूरे मीडिया उद्योग की तनख्वाह में बेशुमार इजाफ़े को अगर देश की अर्थव्यवस्था से जोड़ कर देखें, तो उत्पादन लागत और आय के आधार पर आंकें, तो यह कृत्रिम अर्थप्रणाली है. यह किसी भी दिन भहरायेगी. ध्वस्त होगी. भारत की पेट्रोलियम कंपनियों को देख लीजिए. उनके यहां मैनपावर कॉस्ट से लेकर स्टेब्लिशमेंट कॉस्ट इतने अधिक हैं कि हम पाकिस्तान, बांग्लादेश से भी प्रति लीटर 30 रुपये अधिक पर पेट्रोल बेचते हैं. ओएनजीसी जैसी महारत्न कंपनियों में चपरासी की भी तनख्वाह 60 हजार से अधिक है.

नई दुनिया ’67 में, भारत का शायद पहला अखबार था, जिसने ऑफ़सेट प्रिंटिग पर अपनी छपाई शुरू की. तकनीक में भी यह औरों से आगे था. इन सबके पीछे एक पवित्र संकल्प और उद्देश्य था, क्योंकि उसके कर्ता-धर्ता लोगों में से एक राहुल बारपुते ‘क्षमता के अनुसार काम और आवश्यकता के अनुसार पारिश्रमिक’ सूत्र पर चलते थे. यह एक जीवन दर्शन या समाज दर्शन, जिसका वैचारिक प्रस्फ़ुटन था, नई दुनिया.

इसे भी पढ़िए माथुर जी के शब्दों में – ‘‘राहुल जी ने आठ साल से अपना वेतन डेढ़ सौ रुपये प्रतिमाह तय कर रखा था. और उनका कहना था कि इससे ज्यादा मैं लूंगा नहीं, क्योंकि यह मेरी जरूरत के लिए पर्याप्त है. स्वैच्छिक गरीबी को वे संपादकीय प्रामाणिकता के लिए जरूरी मानते थे. पांच सौ रुपये से ज्यादा पानेवाले को वे चोरों की श्रेणी में गिनते थे.’’ इस अर्थशास्त्र और सोच के तहत नई दुनिया आगे बढ़ा.

जब राजेंद्र माथुर से पूछा गया, आपको क्या तनख्वाह चाहिए, तो उनका उत्तर भी उन्हीं के शब्दों में -‘‘मैंने कहा कि पांच साल पहले जब मैं हास्टल में रहता था और फ़र्स्ट इयर में था, तब मुझे खर्च के लिए 75 रुपये महीना मिलते थे, और मेरी आवश्यताएं इन पांच सालों में ज्यों की त्यों है. इसलिए आप मुझे 75 रुपये दे दीजिएगा, और वे राजी हो गये.’’ बारपुते जी का जीवन कैसा था? वर्षों तक वे लीपे हुए दलान में जमीन पर सोते थे और चटाई के पत्तों पर खाते और खिलाते थे.

यह सब पत्रकारिता के सतयुग की बातें हैं. जब-जब पत्रकारिता में ऐसे चरित्र थे, तब ऐसे आविष्कार जिंदा रहे. मैं खुद गणेश मंत्री, नारायण दत्त जी जैसे लोगों की सोहबत में रहा हूं. गणेश मंत्री धर्मयुग के स्टार पत्रकार थे, तब चिंतक, लेखक व विचारक भी. ईमानदारी, सात्विकता और साधन-साध्य की शुचिता के प्रतिमान. पिता, जनता पार्टी शासन में राजस्थान में राजस्व मंत्री रहे. अत्यंत सम्मानित व प्रतिष्ठित. पर गणेश मंत्री कभी उनकी गाड़ी पर नहीं चढ़े, क्योंकि वह सरकारी होती थी.

नारायण दत्त जी नवनीत के संपादक रहे. हिंदी के सर्वश्रेष्ठ वैचारिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक-आध्यात्मिक पत्रकार. इंदिरा जी के लंबे समय तक प्रेस सलाहकार रहे, अद्वितीय और अनोखे गांधीवादी विद्वान. एचवाई शारदा प्रसाद के छोटे भाई. श्री दत्त आज भी मौजूद हैं, बेंगलुरु में रहते हैं. अकेले. कई भाषाओं के जानकार. सच्चे गांधीवादी. इन दोनों के घर, सत्ता के ताकतवर केंद्र रहे, दोनों अपने-अपने क्षेत्र में अपने कार्यकाल में, देश के चोटी के पत्रकार-संपादक रहे, पर इन दोनों का जीवन, नितांत गांधीवादी, सामान्य और सरल रहा.

अपने जीवन के दो मेंटर (पथ प्रदर्शक) इन दोनों को पाता हूं. नजदीक से इन्हें देखा कि कैसे ये सभी 24 कैरेट का सोना रहे. ताउम्र. आज इस पत्रकारिता में पैसे की हवस है. रातोंरात धनकुबेर बनने की भूख है. जायज-नाजायज कोई प्रतिमान नहीं रह गया. न आदर्श, न मूल्य. इस धारा का जोर इन दिनों ज्यादा सशक्त और प्रबल है. हर शहर से लेकर दिल्ली तक देख लीजिए, जो स्वनाम-धन्य पत्रकार खुद को समाज का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति मानने लगे हैं, उनकी योग्यता क्या है? आमद क्या है? उनकी कुल संपत्ति क्या है? ठाठ-बाट कैसे हैं? क्या समाज में कोई मूल्य रह गया है या नहीं? क्या कोई उसूल बचा है? जब लड़ाई, सिद्धांत और सिद्धांतविहीनता के बीच हो, साधु और गैर साधु के बीच हो, नीति और अनीति के बीच हो, तो अनीति-षडयंत्र को ही कामयाबी मिलेगी. आज के संसार में. यही हो रहा है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 750 रुपये, ट्रेनी के रूप में प्रतिमाह हमें मिलता था. 1977-78 के दौर में. तब कई लोगों ने इससे अधिक की नौकरी छोड़ कर पत्रकारिता को चुना और पत्रकारिता को ही कैरियर अपनाया. रिजर्व बैंक व अन्य संस्थाओं की नौकरी (अधिक तनख्वाह) छोड़ कर हमने भी यही पेशा चुना. आज खुद मैं लाखों पाता हूं, जो कभी सोचा नहीं था. वह भी क्षेत्रीय अखबार में (इससे कई गुना अधिक के ऑफ़र मिले, यह अलग बात है कि यहीं रहा), पर अपने काम से जोड़ कर देखता हूं, तो तब (धर्मयुग, रविवार या प्रभात खबर के आरंभिक दिनों में) जितना परिश्रम कर पाता था. पूरा डट कर. जुट कर. डूब कर. उतना ही आज भी करता हूं. पर तनख्वाह कई गुना अधिक. राहुल बारपुते और राजेंद्र माथुर के प्रतिमान से खुद को सोचता हूं, तो अपराध बोध होता है. कई बार खुद से पूछा, क्यों गलत मानते हुए इतनी तनख्वाह लेता हूं. कारण, सुरक्षा का सवाल है. पहले समाज में ‘सेफ्टीनेट’ (सुरक्षाजाल) था. संयुक्त परिवार, उदार परिवार, एक दूसरे की देखभाल करनेवाला. आज एकल परिवार (न्यूक्लीयर परिवार) हैं, स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च और इस पेशे में नौकरी की असुरक्षा, शाश्वत चुनौतियां हैं.

इसलिए भविष्य में स्वाभिमान रहे, हाथ न पसारना पड़े, इसलिए आज यह तनख्वाह और उसमें से लगातार बचत जरूरी है. फ़िर भी, जब पूरे भारतीय समाज के बारे में सोचता हूं, तो लगता है, यह चोरी है. पहले संयुक्त परिवार और खेतिहर परिवेश का भरोसा था कि कोई निर्णय लेने के बाद, सड़क पर नहीं रहना होगा. समाज, गांव और परिवार पीछे है. आज ये संस्थाएं टूट गयी हैं. आज भविष्य के प्रति डर है. ऐसा समाज हमने बना लिया है. इसलिए अधिक तनख्वाह का सवाल हमें बहुत कुरेदता नहीं.

पूरे मीडिया उद्योग की तनख्वाह में बेशुमार इजाफ़े को अगर देश की अर्थव्यवस्था से जोड़ कर देखें, तो उत्पादन लागत और आय के आधार पर आंकें, तो यह कृत्रिम अर्थप्रणाली है. यह किसी भी दिन भहरायेगी. ध्वस्त होगी. भारत की पेट्रोलियम कंपनियों को देख लीजिए. उनके यहां मैनपावर कॉस्ट से लेकर स्टेब्लिशमेंट कॉस्ट इतने अधिक हैं कि हम पाकिस्तान, बांग्लादेश से भी प्रति लीटर 30 रुपये अधिक पर पेट्रोल बेचते हैं. ओएनजीसी जैसी महारत्न कंपनियों में चपरासी की भी तनख्वाह 60 हजार से अधिक है. यह आपको मालूम होगा कि भारत की पेट्रोलियम कंपनियां दो लाख करोड़ के घाटे में चल रही हैं. आमद चवन्नी और खर्च अठन्नी का मामला है.

यही स्थिति आज नई दुनिया और छोटे अखबारों के साथ है. अगर नई दुनिया को बाजार में रहना है, तो उसे अपने पत्रकारों को भी हिंदी के बड़े अखबारों के पत्रकारों के समकक्ष वेतन देना होगा. पर नई दुनिया की आमदनी तो बड़े अखबारों जैसी है नहीं. न उसके पास विदेशी पूंजी (एफ़डीआइ) है. न शेयर बाजार का पैसा है. न इक्विटी है. उधर हिंदी के कुछेक बड़े अखबारों को देख लीजिए. उनकी बैलेंस-शीट देख लीजिए. किसी के पास पांच सौ से छह सौ करोड़ जमा है. किसी के पास चार सौ से पांच सौ करोड़ जमा है. बड़े अखबार भी मैनपावर कॉस्ट इतना बढ़ा चुके हैं कि इन्हें भी प्राफ़िट मैक्सिमाइजेशन के लिए पेड न्यूज का सहारा लेना पड़ता है.

उपभोक्ता बाजार के फ़ैलाव में सशक्त मंच के रूप में ये बड़े अखबार काम करते हैं. बाजार को फ़ैलाना-बढ़ाना इनका पहला ध्येय है, क्योंकि बाजार बढ़ेगा, तो आमद बढ़ेगी. पाठकों के बौद्धिक संसार और समाज को बेहतर बनाने से इनका क्या संबंध रह गया है? यह बदले अर्थयुग (उदारीकरण) का प्रभाव है.

हिंदी इलाकों में यह कुछ गंभीर समस्याएं हैं. हम हीन मानस के झगड़ालू लोग हैं. उसमें भी यदि राजेंद्र माथुर के शब्दों में कहें, ‘‘क्योंकि बलिया और पुणे में एक फ़र्क है, जो गंगा-यमुना के बीच रहनेवाले उत्तर भारतीयों को कभी समझ में नहीं आयेगा.’’ वैसे तो हिंदुस्तान में ही समस्या है, पर हिंदी इलाकों में खासतौर से. इस बीमारी का लक्षण भी माथुर साहब के शब्दों में ही- ‘‘समाज के नाते अथवा संस्था के नाते हम हिंदुस्तानी आकृष्ट होना जानते ही नहीं. हिंदीभाषियों में यह खासियत दूसरों से कुछ ज्यादा ही है. नौ कनौजिए यहां नौ सौ चूल्हे जलाते हैं. सारे संस्कार ही हिंदी में हीनता, विपन्नता और ईष्र्या में हैं.’’

राजेंद्र माथुर ने हिंदी इलाके के इस मानस पर कब टिप्पणी की थी, तब से आज के 25 वर्षों बाद, यह और अधिक विकृत हुई है. पर उससे क्या? नई दुनिया का अपना रोल रहा. देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार उसने अपने प्रयास से हिंदी समाज को संवारा. उसकी बौद्धिक क्षमता बढ़ायी. अपने समय-दौर में देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप श्रेष्ठ रोल प्ले (भूमिका अदा की) किया. अब वह नई दुनिया, नयी परिस्थितियों में अपना पुराना चोला उतार रहा है. राजेंद्र जी, राहुल जी नई दुनिया के अतीत बन रहे हैं. भविष्य के साथ उनके रिश्ते क्षीण होते जायेंगे. यही काल है.

पुरानी कहावत है, ‘समय होत बलवान !’ वही अर्जुन, वही गांडीव, पर भील उनकी औरत को हर ले गये. ऐसा तो होना ही है. दर्शन में कहें, तो यह काल की गति है. इस असार-संसार में ना तो हम अपने परिवेश या अस्तित्व के स्थायी होने का ठेका ले सकते हैं और न उसके भविष्य का, क्योंकि दोनों ही चीजें समय के साथ खिसक जाती हैं. तानपुरे ढीले पड़ जाते हैं, या महफ़िलें बदल जाती हैं. सफ़ेद पर्दे मैले हो जाते हैं. परेशानियां अपनी पहचान के लिए अलग पृष्ठभूमि खोजती हैं.

नई दुनिया के साथ उत्पन्न स्थिति को समझने के लिए नई दुनिया के अर्थशास्त्र को समझना जरूरी है. एक औसत बीस पेज का अखबार रोज निकालने के लिए सिर्फ़ स्याही और प्लेट पर खर्च लगभग चार रुपये है. अन्य आविरहेड खर्च जोड़ दें, तो एक प्रति की कीमत लगभग सात रुपये होगी. यह खर्च तब, जब अखबार मामूली या औसत न्यूजप्रिंट पर निकलता है. यह एक अखबार निकालने का खर्चा है.

अब आमद का पक्ष समझ लीजिए. फ़र्ज कीजिए आपका अखबार, एक सप्ताह में तीन दिन दो रुपये, और चार दिन तीन रुपये में बिकता है. तब आमद गणित समझिए. अखबार बिकता है, दो या तीन रुपये में. सप्ताह की कुल कीमत जोड़ दें, तो औसत कीमत 2.5 रुपये होगी रोज. इस 2.5 रुपये में हॉकर और एजेंटों का कमीशन है, लगभग 1.40 रुपये. आपके पास बचा (2.5-1.40) 1.10 रुपये प्रति कॉपी. एक अखबार की उत्पादन लागत यानी एक अखबार निकालने में खर्च हुए सात रुपये. इस तरह, हर एक कापी में खर्च हुए (7-1.10) 5.90 रुपये.

इस तरह, एक दिन में एक कापी पर घाटा हुआ लगभग 6 रुपये. अगर किसी अखबार की दस लाख प्रतियां रोज बिकती हैं, तो एक दिन में लॉस (घाटा) हुआ लगभग 60 लाख रुपये. महीने में यह घाटा हुआ (60 गुणा 30) 1.8 करोड़ रुपये. साल में यह घाटा हुआ (18 गुणा 12) 21.6 करोड़. अब इस 21.6 करोड़ का लॉस फ़ाइनेंसिंग सिर्फ़ और सिर्फ़ विज्ञापन से होना है.

एक स्वाभाविक सवाल उठता है कि जब उत्पादन लागत सात रुपये है, तो दो रुपये में क्यों बेचते हैं. घाटा उठा कर. बड़े अखबार, जो पूंजी संपन्न हैं, वे कीमत घटा देते हैं, ताकि कमजोर को मार सकें या जो जमे-जमाये अखबार हैं, उनके बीच बाजार बनाने के लिए आपको कीमत कम करनी पड़ती है, ताकि पाठक अखबार खरीद-देख सकें. अंतत: प्रसार होगा (सरकुलेशन बढ़ेगा), तभी विज्ञापन भी मिलेंगे. इसलिए अखबार प्रसार बढ़ाने के लिए कीमत कम करने को विवश हैं.

अगर अंबानी समूह से 200 करोड़ का लोन नई दुनिया ने लिया भी होगा, तो उसका हश्र यही हुआ होगा. इसके ऊपर दफ्तर में बढ़ती बेशुमार तनख्वाह, जिसका कोई वास्ता प्रोडक्टीविटी (उत्पादकता) से नहीं है. उत्पादकता और तनख्वाह के बीच कोई अनुपात नहीं है. एक मामूली अखबार में कुल आमद (रिवेन्यू) कितने फ़ीसदी है? हिंदी के जो तीन बड़े अखबार है, उनमें 12 फ़ीसदी, 11 फ़ीसदी और 14 फ़ीसदी हैं. क्योंकि इनके अनेक संस्करण हैं, तो कुछ खर्चे कामन निकल जाते हैं. छोटे अखबार जिनके पास अनेक राज्यों के संस्करण नहीं हैं. न शेयर बाजार का पैसा है, न एफ़डीआइ है, न इक्विटी है, उनका वेज बिल (स्टाफ़ कास्ट, यानी तनख्वाह वगैरह पर खर्च) वर्ष 2009-10 में कुल आमद का 15 फ़ीसदी था.

इसी तरह वर्ष 2010-11 में, हिंदी के तीन बड़े अखबारों का स्टाफ़ कास्ट टोटल रेवेन्यू का 14 फ़ीसदी, 14 फ़ीसदी और 12 फ़ीसदी था. पर जो छोटे अखबार इनसे कंपीट करना चाहते हैं, उनका स्टाफ़ कास्ट 20 फ़ीसदी. इसी तरह वर्ष 2011-12 में हिंदी के तीन बड़े अखबारों का स्टाफ़ कास्ट (परसेंटेज आफ़ टोटल रेवेन्यू) था, 12 फ़ीसदी, 16 फ़ीसदी और 12 फ़ीसदी. पर अन्य छोटे अखबरों का लगभग 19-20 फ़ीसदी. यानी नई दुनिया जैसे मंझोले या छोटे अखबार का स्टाफ़ कास्ट भी बड़े अखबारों के मुकाबले अधिक और आमद भी कम, तो अर्थशास्त्र के किस नियम के तहत ऐसे संस्थान चल सकेंगे?

(जारी)

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. वे बिहार और झारखंड में नंबर वन हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है.

 

 
 

 

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