नईदुनिया बनाम नईदुनिया

एक संस्थान था जिसका ​नाम नईदुनिया था। वहां काम करने वाले उसे जन्नत मानते थे और उसके बाहर तो मानो उनके लिए कुछ था ही नहीं। हालांकि दूसरे संस्थानों की तरह वहां भी सेटिंग, अपनों को उपकृत करना और कामचोरों का अस्तित्व था। रोमांटिक किस्म के किस्से कहानियां भी थीं वहां। काम चलाउ अफेयर से परा-वैवाहिक संबंध तक यहां पाए जाते थे। वक्त ने करवट बदली और नईदुनिया में सबकुछ बदल गया। कई लोगों ने आनन फानन में अपनी निष्ठाएं बदल डालीं। कई मक्कारों ने किसी न किसी ऐसी गाय की पूछ पकड ली जो श्रवण रूपी वैतरणी पार करा दे। किसी ने व्यास को सांटा तो किसी ने मिश्र को मक्कखन लगाया। कुछ तो सीधे श्रवण तक पहुंच गए।

आज भी यहां के संपादकीय विभाग में कई ऐसे लोग हैं जो आफिस आते हैं, चाय नाश्ता करते हैं गपशप करते हैं। कानाफूसी करते हैं और घर चले जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी सीट पर बैठे हुए काम दिखाने के लिए घर से किताबें ले आते हैं और आठ घंटे का समय काट कर चले जाते हैं। किसी के पास काम नहीं है तो किसी को काम की वजह से सांस लेने की फुरसत नहीं है। अधिकांश पुराने लोग यही कहते हुए पाए जाते हैं कि पहले तो ऐसा नहीं होता था वैसा नहीं होता था। तो कुछ ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों के काम में पैर फंसाकर यह दिखाते हैं कि वो बहुत ज्यादा काम करते है।

कई मामलों में यह कहा जा सकता है कि नईदुनिया बिकने के पहले के चार पांच सालों में काफी इतना कचरा भर लिया था। उसकी छंटनी अब मुश्किल पड़ रही है। यही हालात अब भी हैं। नए लोगों को लाने के नाम पर श्रवण ने चावल और कंकर दोनों ही भर लिए हैं। जो कहीं नहीं चले उनको नईदुनिया ले आया गया। खासकर भास्कर और पत्रिका से लाए गए लोग। माहौल ऐसा हो चुका है कि गधे और घोड़े साथ में दौड़ रहे हैं। यही वजह है कि पुराने लोग तो अब भी अपनी रोटियां सेक रहे हैं लेकिन कई नए लोग वापस जा चुके हें और कई और जाने की तैयारी में बैठे हैं। (कानाफूसी)

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