नईदुनिया में स्टाफ को सरेआम अपशब्द बोल रहे हैं श्रवण गर्ग!

नईदुनिया को हिंदी अख़बारों की दुनिया में एक सुसंस्कृत, सभ्य और सामाजिक अखबार माना जाता था. इस अखबार ने खबरों की विश्वसनीयता का ऐसा शिखर खड़ा किया था, जिसे कई बरसों तक कोई हिला तक नहीं सका था. आज हालात ये हैं कि यहाँ प्रधान संपादक श्रवण गर्ग स्टाफ को सरेआम अपशब्द बोल रहे हैं. कुछ दिन पहले एक सीनियर गश खाकर गिर पड़ा. नईदुनिया में इन दिनों वही माहौल बनता जा रहा है, जिससे बचकर नईदुनिया कि नीव कड़ी की गई थी.

इस अखबार के बनने और बर्बाद होने की अजीब दास्ताँ है. इसकी शुरुवात हुई थी २००६ से. २००६ के बाद ऐसा दौर आया कि धीरे-धीरे सबकुछ ध्वस्त हो गया. विनय छजलानी के हाथ में नईदुनिया की बागडोर आते ही चमचागिरी, भाटराग और खबरों के नाम पर ऐसा प्रयोग चला कि नईदुनिया की विश्वसनीयता की धज्जियाँ उड़ गई. ये दौर भी २००६ से २००९ तक कुछ हदतक संभला कर रहा, जब तक इसकी कमान ग्रुप एडीटर उमेश त्रिवेदी के हाथ में रही. अखबार की समझ वाले इस संपादक ने नईदुनिया की साख को काफी हदतक संभालकर रखा. २००९ में जब विनय छजलानी ने नईदुनिया के इंदौर संस्करण का स्थानीय संपादक जयदीप कर्णिक को बनाया तो इस अखबार का बंटाधार हो गया. नईदुनिया को घाटे की तरफ लुढकाने में उनके सलाहकारों ने भी अच्छी भूमिका निभाई. इनमें आलोक मेहता भी एक हैं जिन्होंने दिल्ली संस्करण के बहाने नईदुनिया को जबरदस्त घाटे मे डुबो दिया. रिलायंस से कर्जा भी विनय छजलानी ने इसी दौर में लिया. २०११ के मध्य में नईदुनिया को बेचने की चर्चाओं ने जोर पकड़ा और २०१२ के मार्च में नईदुनिया का मालिकी हक जागरण प्रकाशन का हो गया.

आज नईदुनिया को उसकी ऊंचाई तक पहुँचाने वाले अभय छजलानी गुमनामी में हैं और अपने खेल शौक के बहाने 'अभय प्रशाल' में टेबल टेनिस के नए खिलाड़ियों को तैयार होते देख रहे हैं. महेंद्र सेठिया ने एक बड़ा सा स्कूल खोल लिया है. बाकी समय वे ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ मध्य प्रदेश क्रिकेट की राजनीति करते हैं. विनय छजलानी इन दिनों आयकर के छापों में उलझे हैं. जयदीप कर्णिक अपने मूल काम वेबदुनिया से फिर जुड़ गए. ये वो कहानी है जिसका क्लाइमेक्स अभी बाकी है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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