Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

नपुंसक हो चुके हैं आईएएस-आईपीएस एसोसिएशन

: कौन जिम्मेदार है डीडी मिश्रा की इस हालत का : कैदियों से भी बुरा व्‍यवहार हुआ डीआईजी के साथ : आम तौर से भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप अक्सर विपक्षी पार्टियों द्वारा सरकार पर लगाये जाते हैं. पर जब इसी तरह के आरोप सरकार का ही कोई उच्च पदस्थ अधिकारी लगाये और यह कहे कि ‘यूपी शासन में सब कुछ अवैध है और इससे बड़े घोटाले संभव नहीं हैं’ तो मामला निश्चत रूप से गंभीर हो जाता है. गंभीर इसीलिए क्योंकि यह बात उस व्यक्ति द्वारा कही जा रही है जिसने खुद किसी न किसी फ़ाइल पर कोई आदेश दिए होंगे अथवा कोई न कोई नोटशीट इस सम्बन्ध में लिखा होगा. यानी कि यह बात हवा-हवाई न होकर अंदरूनी जानकारी मानी जानी चाहिए.

: कौन जिम्मेदार है डीडी मिश्रा की इस हालत का : कैदियों से भी बुरा व्‍यवहार हुआ डीआईजी के साथ : आम तौर से भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप अक्सर विपक्षी पार्टियों द्वारा सरकार पर लगाये जाते हैं. पर जब इसी तरह के आरोप सरकार का ही कोई उच्च पदस्थ अधिकारी लगाये और यह कहे कि ‘यूपी शासन में सब कुछ अवैध है और इससे बड़े घोटाले संभव नहीं हैं’ तो मामला निश्चत रूप से गंभीर हो जाता है. गंभीर इसीलिए क्योंकि यह बात उस व्यक्ति द्वारा कही जा रही है जिसने खुद किसी न किसी फ़ाइल पर कोई आदेश दिए होंगे अथवा कोई न कोई नोटशीट इस सम्बन्ध में लिखा होगा. यानी कि यह बात हवा-हवाई न होकर अंदरूनी जानकारी मानी जानी चाहिए.

मैं डी डी मिश्रा, उत्तर प्रदेश के फायर विभाग के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी के द्वारा कही गई बातों को इसी रूप में लेती हूँ. मैं इसे इस कारण से भी विशेष गंभीर मानती हूँ कि डी डी मिश्रा ने भ्रष्टाचार के आरोप किसी अन्य पर नहीं स्वयं अपने विभाग के मुखिया, गृह विभाग उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव कुंवर फ़तेह बहादुर और फायर विभाग के एडीजी हरिश्चंद्र सिंह पर लगाया. आगे क्या हुआ यह हम सब जानते हैं. इस प्रकार से वही व्यक्ति जो कुछ घंटों पहले तक एक जिम्मेदार अधिकारी माना जा रहा था अचानक से मानसिक रूप से बीमार घोषित कर दिया गया. जिस तरह से किसी अपराधी को भी लादकर नहीं ले जाया जाता है, उससे बदतर ढंग से एक बुजुर्ग व्यक्ति और शासन के एक जिम्मेदार अधिकारी को बदसलूकी के साथ दफ्तर से निकाल कर जबरन अस्पताल पहुंचा दिया गया, वह भी सीधे मनोरोग विभाग में.

यह तो जैसे हम लोग फिल्मों में देखा करते हैं कि कोई बड़ा विलेन किसी विद्रोही हीरो को आनन-फानन में पागल घोषित करवा देता है और फिर दुनिया भर के आपराधिक किस्म के डाक्टर मिल कर उसके दिमाग पर बिजली के झटके पर झटका देना शुरू कर देते हैं और तब तक झटके देते रहते हैं, जब तक कि हीरो वास्तव में पागल न हो जाए. कुछ उसी प्रकार से डी डी मिश्रा भी खींचे-ताने ढंग से जबरन पकड़ कर अस्पताल पहुंचा दिए गए. इसके बाद वे दुनिया और मीडिया की नजर से पूरी तरह से ओझल कर दिए गए. मैं नहीं कह रही कि डी डी मिश्रा को भी बिजली के झटके दिए ही गए होंगे, पर यह तो मुझे लगता है कि उन्हें कुछ न कुछ ऐसी दवाइयां दी गई होंगी जिनसे वे कुछ भी बोलने और कहने की स्थिति में न रह सकें. मैं इस बात पर ज्यादा यकीन इसी से कर रही हूँ क्योंकि जब मैं अपने पति के साथ उनको देखने अस्पताल गई थी तो मुझे वे कुछ अजीब ढंग से लगभग बेहोशी की अवस्था में दिखे थे. स्वाभाविक है कि ऐसे अवसरों पर, जब कोई व्यक्ति सच बोलने लगे, तो उससे परेशान और प्रभावित होने वाले लोग सबसे पहले ऐसे सच बोलने वाले का मुंह बंद करना चाहते हैं. डी डी मिश्रा के मामले में भी शायद कुछ ऎसी ही सोच रही हो.

यहाँ एक अजीब बात मैं यह भी बताना चाहूंगी कि संभवतः उनसे मिलने गए एक मात्र आईपीएस अधिकारी मेरे पति अमिताभ ठाकुर हों. यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश के आईपीएस एसोशियेशन ने भी जिस प्रकार से इस मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया वह अत्यंत ही कष्टप्रद और चिंताजनक रहा. मैं जानना चाहती हूँ कि इस प्रकार के एसोशियेशन की आवश्यकता ही क्या रह जाय जब ऐसे गंभीर मामलों में भी वह सोई रहे या अपने-आप को किनारे कर ले. क्या केवल इसीलिए क्योंकि आरोप किसी बहुत प्रभावशाली व्यक्ति पर लग रहे हों. यदि एक पल को यह मान भी लिया जाए कि डी डी मिश्रा की मानसिक दशा वास्तव में खराब थी और वे उलूल-जूलूल बोल रहे थे, कम से कम तब भी तो इंसानियत के तौर पर इस एसोशियेशन के रहनुमाओं को जा कर कुशल-क्षेम तो पूछना ही चाहिए था. मैंने तो अखबार में यही पढ़ा कि इन लोगों ने इस पूरे मामले को व्यक्तिगत मामला बता कर खुद को किनारे कर लिया.

मैंने कुछ यही स्थिति गुजरात में भी तब देखी थी जब वहां के आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट पर एक सिपाही द्वारा एफआईआर दर्ज कराने के बाद वहां की पुलिस ने उन्हें बेइज्जत करते हुए घर से गिरफ्तार किया था और वहां के सारे आईपीएस अधिकारी चुप्पी मारे बैठे रहे थे. मैंने जब उनकी पत्नी श्वेता भट्ट से बात की थी तो वे वास्तव में इन साथी अधिकारियों के व्यवहार से बहुत ही आहत थीं. मैंने स्वयं इस सम्बन्ध में जब मेरठ में संजीव भट्ट की गिरफ्तारी के खिलाफ धरना दिया था तो वहां मौजूद एक सिपाही के शब्द मैं नहीं भूल पाती. उन्होंने कहा था कि यहाँ रोज धरने होते हैं पर इतने बड़े अत्याचार के खिलाफ किसी ने एक आवाज तक नहीं उठाई.

इससे भी बुरा हाल आईएएस हरमिंदर राज सिंह के साथ हुआ. जब उन्होंने गोली मार कर आत्महत्या कर ली तो उत्तर प्रदेश के सबसे ताकतवार कहे जाने वाले आईएएस अफसरों के एसोशियेशन ने चूँ तक नहीं किया था. मैं याद करती हूँ कि जब हरमिंदर राज की याद में शोक सभा हुई थी तो बहुत ही डरते-डरते कुछ अफसर पहुँच पाए थे और उनमें भी जब किसी ने उनकी मौत के सम्बन्ध में जांच करने की बात कही थी तो बाकी सब किनारे लग गए थे. सोचने वाली बात है जो एक साधारण बुद्धि का आदमी भी समझ सकता है कि एक हंसमुख और मिलनसार आदमी, जो कुछ समय पहले ही एक शादी की पार्टी से लौटा हो, अचानक अपने-आप को गोली क्यों मार लेगा. लेकिन यह बात पूरे प्रदेश का शासनतंत्र संचालित करने वाले आईएएस अधिकारियों को क्यों समझ में नहीं आई यह एक विचारणीय प्रश्न है.  

मैं तो इन तमाम घटनाओं कों देखने के बाद यह मानने लगी हूँ कि इन आईएएस और आईपीएस अधिकारियों से बेहतर स्थिति तो अन्य विभागों के कर्मचारियों की है. कम से कम इंजीनियर मनोज गुप्ता की हत्या के बाद प्रदेश भर के इंजीनियरों में कुछ आक्रोश तो दिखा, उन्होंने मिल कर अपनी बात तो रखी. इसी प्रकार से डॉ. सचान की हत्या के बाद भी मुझे प्रदेश के डाक्टर इस घटना को लेकर सक्रिय नजर आये. इनकी तुलना यदि मैं उस अवकाश प्राप्त आईपीएस अधिकारी से करूँ जो समाचार पत्रों के अनुसार डी डी मिश्रा के बहुत नजदीकी मित्र हैं, लेकिन जब मैं अस्पताल गई थी तो वे मुझे मिश्रा की स्थिति के लिए उनकी पत्नी की परेशानियों को जिम्मेदार कारण बता रहे थे. सोचने वाली बात यह है कि पूरी जिन्दगी काट चुके और रिटायर होने में मात्र दो साल रह गए अफसर के लिए क्या पत्नी की ही परेशानी बच गई है जो उसे उद्वेलित कर दे. शादी के दस-पांच साल में तो यह बात समझ में आती है, पर इतने सालों बाद? यह बात भी वह व्यक्ति कह रहा था जो कथित तौर पर सेवा में उनके अत्यंत नजदीकी मित्र थे. जहाँ तक मैं समझ पा रही हूँ इन दो महत्वपूर्ण सेवाओं की दुर्दशा के लिए यही मानसिकता जिम्मेदार है. कैरियर के प्रति लगाव अच्छी बात है पर यदि वही एकमात्र साध्य रह जाय तो वे सारी विसंगतियाँ आनी ही हैं जो डी डी मिश्रा, संजीव भट्ट या हरमिंदर राज के मामलों में आई.

नूतन ठाकुर

कन्‍वीनर

नेशनल आर टीआई फोरम

लखनऊ

# 9415534525

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...