नभाटा ने इवेंट का विरोध किया और टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने तवज्‍जो दी

: टाइम्स समूह के प्रकाशनों की विपरीत राय का एक और उदाहरण : भड़ास पर “क्‍या टाइम्‍स समूह में सचमुच ऐसा ही होता है” पढ़कर धर्मयुग से प्रभात खबर, नवभारत टाइम्स, पटना, ब्रिटिश उच्चायोग, नई दिल्ली, नवभारत टाइम्स, जयपुर (स्थानीय संपादक) होते हुए दैनिक हिन्दुस्तान, पटना से रिटायर होकर रांची में रह रहे विजय भास्कर की पुस्तक की याद आई। “बिहार में पत्रकारिता का इतिहास” नामक उनकी पुस्तक प्रभात प्रकाशन से इसी साल आई है। इसमें बिहार के साथ-साथ झारखंड की पत्रकारिता के इतिहास का अच्छा वर्णन है।

नवभारत टाइम्स का जब पटना से प्रकाशन शुरू हुआ था जो विजय भास्कर प्रभात खबर छोड़कर नवभारत टाइम्स से जुड़ गए थे। और पुस्तक में पटना से नवभारत टाइम्स शुरू होने से बंद होने तक की घटनाओं का जिक्र है। कुछ अंश यहां पेश कर रहा हूं। सबसे पहले, “क्‍या टाइम्‍स समूह में सचमुच ऐसा ही होता है” से संबंधित है।    

पुस्तक के 19वें अध्याय “दिग्गजों का शंखनाद” में विजय जी ने लिखा है, “नवभारत टाइम्स पटना के पहले संपादक बने दीना नाथ मिश्र जो इससे पूर्व नवभारत टाइम्स, जयपुर में समाचार संपादक थे। टाइम्स ऑफ इंडिया, पटना के संपादक बने जनक सिंह। दीनानाथ मिश्र ने अपने अखबार में कई एक्टिविस्टों को भी जगह दी। फ्रेजर रोड के ऑफिस में टाइम्स के अन्य संस्थानों की तरह एक ही फ्लोर पर दोनों अखबारों संपादकीय के कार्यालय थे। वरिष्ठ कर्मियों में यहां अरुण रंजन, विजय भास्कर, सुकांत नागार्जुन और इंद्रजीत ने ज्वायन किया। श्रीचंद, मिथिलेश, नीलाभ मिश्र, इंदु भारती, किरण शाहीन, वेद वाजपेयी जैसी कई प्रतिभाओं ने अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया। मणिमाला, नवेन्दु, किरण आदि ऐसे रिपोर्टर थे जिन्होंने अपनी काबिलियत की छाप छोड़ी। ‘ऐक्टिविज्म’ का हाल ये था कि शायद पहली बार जब ‘मिस पटना’ का आयोजन हुआ तब नभाटा की किरण शाहीन और दूसरे नभाटाकर्मियों ने जमकर इसका प्रतिरोध किया और ये प्रतिरोध एक समय पर पूरे शहर का प्रतिरोध बन गया। दूसरी ओर, टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस इवेंट को तवज्जो दी और इसे अच्छी तरह कवर भी किया। दोनों अखबार अपनी एक स्वतंत्र और अलग पहचान बना रहे थे।”

नवभारत टाइम्स का प्रकाशन बिहार (पटना) से क्यों शुरू किया गया। इससे संबंधित दिलचस्प जानकारी पुस्तक के इसी अध्याय में है। विजय जी ने लिखा है, “1986 में पटना से नवभारत टाइम्स शुरू होने से पहले कई दिनों तक कार्यशाला चली थी। उस कार्यशाला में टाइम्स ऑफ इंडिया, नई दिल्ली के महाप्रबंधक बलजीत कपूर से जब यह पूछा गया कि आपने बिहार क्यों आना चाहा? तो उन्होंने एक छोटी सी घटना का जिक्र किया, 6-7 साल पहले की बात होगी। मैं दिल्ली से हावड़ा जाते हुए पटना जंक्शन पर उतरा और एएच व्हीलर के स्टॉल की ओर बढ़ गया (उस समय टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रकाशन रेलवे स्टॉलों पर बड़ी जरूरत हुआ करते थे। उनके प्रकाशन हर सेक्टर का प्रतिनिधित्व करते थे) मैं अपनी कुछ सेल्स की जानकारी के लिहाज से पत्रिकाओं का उलट पलट कर देख रहा था। एक आदमी जो थोड़े मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटा था, मेरी ओर बढ़ता दिखा तो मैं अपनी जगह से थोड़ा और खिसक गया क्योंकि मुझे लगा कि वह मुझसे कुछ पैसे मांगेगा। पर मेरी ओर देखे बिना वह आगे बढ़ा और अपनी धोती की गांठ से अठन्नी निकालकर उसने स्टॉल वाले को दिया और कहा कि एक दिनमान दीजिए। उन्होंने कहा कि यह मेरे लिए अवाक कर देने वाला क्षण था और तभी मैंने सोच लिया था जहां ऐसे लोग खरीद कर पत्रिकाएं पढ़ सकते हैं वहां किसी न किसी दिन तो हमें आना ही है।”

पुस्तक में अगर टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के बिहार आने और उसकी स्वतंत्र पत्रकारिता का जिक्र है तो 15वें अध्याय “धनबाद पत्रकार उत्पीड़न कांड” में नवभारत टाइम्स के कार्यालय संवाददाता अशोक वर्मा की पिटाई और उसके संबंधित घटना का पूरा विवरण विस्तार से दिया गया है और यह भी कि इस मामले में नवभारत टाइम्स के पटना संवाददाता उर्मिलेश और रविवार के पटना संवाददाता जयशंकर गुप्त धनबाद गए थे और उपायुक्त से मिलकर अशोक वर्मा को चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। यह अलग बात है कि प्रशासन ने इसपर ध्यान नहीं दिया और अशोक वर्मा को धनबाद छोड़ना पड़ा था। पत्रकारों के खिलाफ मनमानी करने वालों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई आदि। इसी क्रम में बिहार के उस समय के मुख्यमंत्री डॉक्टर जगन्नाथ मिश्र के मशहूर बिहार प्रेस बिल का भी जिक्र है।

कुल मिलाकर, बिहार में पत्रकारिता का इतिहास पिछले 20-25 वर्ष के इतिहास का भी बयान करता है जो दिलचस्प होने के साथ-साथ पत्रकारिता, प्रकाशन और पत्रकारों में हो रहे बदलावों का भी आकलन करता है। चूंकि लेखक इसी अवधि में पत्रकारिता में रहे हैं और बड़े पदों पर रहे हैं इसलिए जानकारियां सही और अधिकृत किस्म की हैं और जहां जरूरत पड़ी है, उन्होंने दूसरे जानकारों का भी सहयोग लिया है।

बिहार (और झारखंड) की पत्रकारिता की चर्चा प्रभात खबर की चर्चा के बगैर अधूरी होगी। लेखक प्रभात खबर की शुरुआती टीम में थे और सब कुछ को काफी करीब से देखा और वर्णन किया है। प्रभात खबर के संस्थापक, संपादक और स्वामियों में से एक एसएन विनोद से भड़ास4 मीडिया की बातचीत के एक अंश को भी पुस्तक में साभार उद्धृत किया गया है।

संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्व-उद्यमी हैं. वे लंबे समय तक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक जनसत्ता में वरिष्ठ पद पर रहे. उसके बाद उन्होंने अनुवाद की अपनी कंपनी प्रारंभ किया और लंबे समय से स्व-रोजगार के जरिए दिल्ली-एनसीआर में शान से रह रहे हैं. वे समय समय पर विभिन्न मुद्दों पर बेबाक लेखन अखबारों, वेब, ब्लाग आदि पर करते रहते हैं. उनसे संपर्क  anuvaadmail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. संजयजी  www.prachaarak.com नामक वेबसाइट का संचालन भी करते हैं.

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