नरेंद्र मोदी का सच समझना जरूरी है

अब अनेक भारतीय और भारतीय मूल के लेखक, कलाकार और बुद्धिजीवी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने को खतरनाक मान रहे हैं. यूआर अनंतमूर्ति सहित अनेक भारतीय लेखकों और बुद्धिजीवियों ने यह चेतावनी दी है कि मोदी का प्रधानमंत्री बनना भारत के भविष्य के लिए बुरा होगा. लगभग यही राय सलमान रुश्दी, होमी के भाभा, विवान सुंदरम आदि की भी है. बनारस में एक मई से अनेक संस्कृतिकर्मी, कवि-लेखक, बुद्धिजीवी इकट्ठे हो रहे हैं.

सिद्धार्थ वरदराजन, अनन्या वाजपेयी, मुकुल केसवन ने अभी प्रकाशित अपने लेखों में मोदी के भाषण और उनके सर्वाधिक करीबी अमित शाह के भाषणों से यह स्पष्ट किया है कि मोदी की जो छवि निर्मित की जा रही है, वह वास्तविक नहीं है, मोदी न विचारक-चिंतक हैं, न दार्शनिक, न कलाकार-बुद्धिजीवी, न अर्थशास्त्री, फिर भी उनकी ऐसी धूम क्यों है? उन्हें एक नये ‘भारत भाग्य विधाता’ के रूप में पेश किया जा रहा है. एक मोदी में कई मोदी समाहित हैं. वे एक साथ ‘हिंदू हृदय सम्राट’ और ‘विकास पुरुष’ हैं. चाय बेचनेवाले हैं, पिछड़ी जाति के हैं, विजनरी हैं, गुजरात मॉडल के निर्माता हैं, राष्ट्रभक्त हैं, ‘हवा-हवाई’ नेता ‘नहीं’ सुशासक हैं, स्वामी विवेकानंद और गौतम बुद्ध से अनुप्राणित-उत्प्रेरित हैं. ‘ऑल इन वन’ हैं. मोदी का इतना बड़ा कद कैसे हुआ?

मोदी का कद अचानक नहीं बढ़ा है. इसे बढ़ाया गया है. उसके पीछे अनके शक्तियां हैं. राजनाथ सिंह और संघ-परिवार ही नहीं, कॉरपोरेट, मीडिया, अमेरिका की कई संस्थाएं हैं. भारत को मोदीमय बनाया जा रहा है- मोदमय नहीं. एक प्रतीक या मिथक के रूप में मोदी को प्रस्तुत किये जाने के अपने निहितार्थ हैं. भाजपा के पहले कॉरपोरेटों ने मोदी को प्रधानमंत्री बनने/बनाने की बात कही थी. अंबानी और टाटा देशभक्ति के कारण मोदी को प्रधानमंत्री देखने के इच्छुक नहीं थे. अंबानी, मित्तल, टाटा, अडानी के साथ बड़े कॉरपोरेटों के हित आज अधिक मानी रखते हैं. राष्ट्र-राज्य कमजोर हो चुका है, जिसे कॉरपोरेट अपने अधीन रखना चाहता है. नीरा राडिया टेप-प्रकरण इसका एक प्रमाण है.

मोदी को वर्तमान विश्वव्यापी आवारा बेलगाम, मनचली, आक्रामक-आकर्षक, लुम्पेन-याराना, बाजार-कॉरपोरेट, वित्तीय ध्वंसक-विनाशक पूंजी से अलग कर देखना गलत होगा. पूंजी का यह उत्तर-आधुनिक रूप तकनीकी विकास और संचार-प्रौद्योगिकी से सीधा जुड़ा है. इसका आवेश, उत्तेजना और उन्माद से संबंध हैं. इसे हम आवेशी उत्तेजक और उन्मादी पूंजी भी कह सकते हैं. यह साहस से अधिक दुस्साहस को, नीति-नियम और कायदे-कानून से अधिक संपर्क -संबंध और भ्रष्टाचार को, विश्वास से अधिक अविश्वास को, कर्म से अधिक धर्म को, घर से अधिक बाजार को, मनुष्य से अधिक क्रेता को, उत्पादक से अधिक उपभोक्ता को, समाज से अधिक व्यक्ति को महत्व देती है. विज्ञापन इसका सबसे बड़ा हथियार है. हमारी मानस-निर्मिति में कला, साहित्य, संस्कृति की तुलना में इसकी कहीं अधिक प्रभावशाली-हस्तक्षेपकारी भूमिका है. मोदी इस पूंजी के सबसे बड़े नायक हैं.

पूंजी के वास्तविक रूप-चरित्र को समङो बिना ‘मोदी लहर’ को नहीं समझा जा सकता. यह पूंजी अभी गांवों में फैली नहीं हैं. गांवों में मोदी लहर नहीं है. शहर, शहरी मध्यवर्ग और युवाओं में मोदी की प्रमुखता, लोकप्रियता और स्वीकार्यता का राज क्या है? क्या है वह रहस्य, जिसने आडवाणी, सुषमा, जोशी, टंडन-सबको किनारे कर दिया. जसवंत सिंह ने जिस असली-नकली भाजपा की बात कही है, उसका इस पूंजी से संबंध है. मोदी की आक्रामकता इस पूंजी की आक्रामकता से जुड़ी है. क्या भारत के सभी नेताओं की तुलना में क्या एकमात्र राष्ट्रभक्त मोदी ही हैं?

 सोलहवें लोकसभा चुनाव में एक नेता का ऐसा विपुल प्रचार-प्रसार लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है. ‘इंदिरा इज इंडिया’ के बाद अब मोदी को ही भारत माना जा रहा है. मोदी एकमात्र उद्धारक, विघ्ननाशक और तारणहार हैं. भ्रष्टाचार-मुक्त और कांग्रेस-मुक्त भारत उनसे ही संभव है. एक व्यक्ति सब पर भारी है. मोदी एक ब्रांड हैं. ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’. अब तक भक्तिभाव से ‘हर-हर महादेव’ और ‘हर-हर गंगे’ कहा जाता था. इस प्रार्थना और जयकारे में दुख-क्लेशहर्ता कोई मनुष्य नहीं था. ‘कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ/ कखन हरब दुख मोर’ में एक आर्त पुकार थी. अब महादेव एवं गंगा नगरी वाराणसी में मोदी भाजपा प्रत्याशी हैं. भाजपा और संघ परिवार की पहचान उसके हिंदू धर्म से जुड़ी है. अब ‘हिंदुत्व’ के साथ ‘मोदीत्व’ भी है.

21वीं सदी के भारत में एक प्रमुख राजनीतिक दल ‘भारत विजय रैली’ कर रहा है. नया सिकंदर सामने खड़ा है. गायत्री मंत्र के साथ अब मोदी-मंत्र भी है. ‘दुर्गा सप्तशती’ के श्लोक में जहां मां दुर्गा हैं, वहां मोदी के सेवकों ने उन्हें बैठा दिया है- ‘या मोदी सर्वभूतेषु, राष्ट्ररूपेण संस्थिता:, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:.’

मोदी इंदिरा गांधी (आपातकाल वाली) का पुरुष संस्करण हैं- नवीन और बृहद. 1971 में जब इंदिरा गांधी भारी मतों से जीत कर आयी थीं, तब ‘गूंगी गुड़िया’ नहीं थीं. इंदिरा आक्रामक हुईं. मोदी शुरू से आक्रामक रहे हैं. मोदी जन के नहीं, धन और अभिजन के प्रतिनिधि होंगे. गुजरात नरसंहार (2002) की पूर्व छवि के बरक्स मोदी की अब एक नयी छवि निर्मित की गयी है- विकास-पुरुष और सुशासक की. क्या सचमुच मोदी का हृदय-परिवर्तन हो गया है? क्या अब वे विभाजक, सांप्रदायिक, सत्तावादी, अधिकारवादी और हिंसात्मक नहीं रहे? क्या संघ निर्मित छवि से पूर्व छवि का कोई संबंध नहीं है? क्या यह मान कर चला जाये कि सांप्रदायिक, सत्तावादी, अधिकारवादी और हिंसक होने के बाद हृदय परिवर्तित हो जाता है? इतिहास में सम्राट अशोक एक बड़ा उदाहरण है. मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी देह-भाषा और भाषा से की जा सकती है.

असम, बिहार से लेकर अन्य कई स्थलों में मोदी और उनके लेफ्टिनेंट, सर्वाधिक करीबी (जेटली-राजनाथ सिंह से भी अधिक) अमित शाह के कई भाषण ‘हिंदुत्व’ से भरे हैं. मोदी-शाह की जुगलबंदी आज की नहीं है. धर्म और विकास अब एक-दूसरे से जुड़े भी हैं. मोदी के दो चेहरे हैं- एक विकास का, दूसरा हिंदुत्व का. अनन्या वाजपेयी ने अपने एक लेख में डॉ डेविड ब्रॉमविच के प्रभावशाली लेख ‘यूफेमिज्म एंड अमेरिकन वायलेंस’ में व्यक्त ‘शब्दों की सच्चई’ और ‘हिंसा की असलियत’ के दावं पर लगने की ओर हमारा ध्यान दिलाया है. मोदी का सच समझना जरूरी है. आज और भी जरूरी है! देख कर और संभल कर चलना.

लेखक रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार हैं. उनका यह आलेख प्रभात खबर अखबार से साभार लिया गया है.

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