नवनीत सहगल ने सपा को सेट कर लिया!

जी हां. कुछ ऐसी ही खबरें लखनऊ से है. बसपा राज में सबसे पावरफुल ब्यूरोक्रेट् माने जाने वाले नवनीत सहगल, जो मायावती के वित्त मैनेजर भी कहे जाते थे, ने नए निजाम में भी अपना राजकाज सेट कर लिया है. मायावती की सत्ता से विदाई के बाद कयास लगाया जा रहा था कि नवनीत सहगल और फतेह बहादुर, जो बेहद करीबी रहे हैं मायावती के, इन दोनों की पोल पट्टी खुलेगी, इनके कारनामों के जो किस्से सुनाई पड़ते थे, वे सब बाहर आएंगे और ये दोनों करप्शन में अंदर किए जाएंगे.

लेकिन ताजी सूचना है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है. समरथ को नहीं दोष गुसाईं की तर्ज पर नवनीत सहगल एंड कंपनी ने अपने तार सपा के शीर्ष तक भिड़ा लिए हैं. नवनीत सहगल का असर ये है कि कल तक उनके विरोधी कई वरिष्ठ सपाई आज उनकी पैरवी करते घूम रहे हैं. नवनीत सहगल कोई एक शख्स नहीं बल्कि एक भरा पूरा और विशाल नेटवर्क है और इसके लोग दिल्ली से लेकर देश विदेश के कई जगहों तक आपरेट करते हैं. इस नवनीत सहगल के ढेरों किस्से चर्चित हैं. ये कैसे मीडिया को कंट्रोल करता था, ये कैसे उद्यमियों को कंट्रोल करता था, ये कैसे नेताओं के दो नंबर के पैसे का प्रबंधन करता था, ये कैसे योजनाओं व नीतियों में से पैसे उगाह लेता था.. यह सब जानना हो तो लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकारों और बड़े नेताओं से आफ द रिकार्ड बात करिए.

सब जानते हैं इसके किस्से लेकिन कोई इसके खिलाफ खुलकर नहीं बोलता क्योंकि इसका जलवा ऐसा है कि जो बोलता है उसको ये सेट कर लेता है या सुलटा देता है. अखिलेश यादव कल सीएम बन रहे हैं. उनसे जनता बस एक ही उम्मीद लगाए है. वे करप्ट अफसरों को जेल भेजेंगे और उनकी जमीन व बंगले सीज कर वहां अस्पताल व स्कूल खुलवाएंगे. अगर अखिलेश ऐसा कर देते हैं तो उनकी सत्ता में पांच साल बाद दुबारा वापसी तय है, बिहार के नीतीश कुमार की तरह. लेकिन अगर ये नवनीत सहगल जैसे लोग अगर सपा के वरिष्ठों को सेट कर ले गए तो फिर करप्शन कतई नहीं दूर होगा. उल्टे सपा सरकार के दौर में गुंडाराज के साथ करप्शन राज भी शुरू हो जाएगा जो माया राज से ज्यादा पीड़ादायी साबित होगा यूपी की जनता के लिए. आइए अब आपको नवनीत सहगल का एक किस्सा बताते हैं.

उत्तर प्रदेश जल निगम और पॉवर कारपोरेशन के चेयरमैन रहे नवनीत सहगल के बारे में कहा जाता है कि उसने एनआरएचएम योजना के अलावा बांदा के मान्यवर कांशीराम विश्वविद्यालय, कचरे से बिजली बनाने की योजना और शिक्षा विभाग के 800 भवनों के निर्माणकार्यों में भी सत्ता में अपनी मजबूत पैठ के दम पर भ्रष्टाचार किया है. कुछ मामलों में जनप्रतिनिधों ने अपना विरोध भी दर्ज करवाया लेकिन सरकारी हीलाहाली के बाद ये भ्रष्टाचारी अपनी योजना में कामयाब हो गए. योजनाओं के बज़ट का 7 से 10 फीसदी हिस्सा कमीशन के तौर पर वसूला है. आईएएस अधिकारी नवनीत सहगल के बिचौलिए के तौर पर यूपी में दर्जनों प्रभावशाली लोग काम करते हैं.

बताते हैं कि मुख्यमंत्री मायावती के सबसे चहेते नौकरशाह नवनीत सहगल ने अपने ख़ास डीके सिंह और पीके भुकेश को भ्रष्टाचार मनमानी करने की पूरी छूट दे रखी थी. बसपा सरकार में प्रदेश के महानगरों से निकलने कचरे की बिजली बनाने की योजना में भी भ्रष्टाचार हुआ. नवनीत सहगल ने सत्ता में अपनी पकड़ के बल पर पूरे प्रदेश के दो महानगर छोड़कर इस योजना को ए टू जेड नामकी कंपनी को सौप दिया. सूत्रों की माने तो सहगल ने A टू Z कंपनी को यह योजना दिलवाने के लिए मोटी रकम खाई है. इतना ही नहीं देश के अन्य प्रदेशों में इस योजना की तुलना में उत्तर प्रदेश सरकार को इस कंपनी से करार करने में भरी राजस्व का नुकसान हुआ है. कानपुर के मेयर रविन्द्र पटनी ने यूपी सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए राज्यपाल और राष्टपति को पात्र भी लिखा था लेकिन नतीजा सिफर रहा.

देखा जाये तो उत्तर प्रदेश में डूडा और सुडा कि कई योजनाओं में नवनीत सहगल ने पीके भुकेश व डीके सिंह को आगे कर कई सौ करोड़ का भ्रष्टाचार किया है. बसपा सरकार में भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी दुकान नवनीत सहगल ने पीके भुकेश व डीके सिंह के नाम से चलाई है, जिसकी जाँच होने पर यूपी की दर्जनों छोटी बड़ी योजनाओं में हुए भ्रष्टाचार की हकीकत सामने आ जाएगी.

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता किरीट सोमैया ने बीते साल 26 सितम्बर को लोकायुक्त एन.के. मेहरोत्रा से मिलकर 3000 करोड़ रुपए के विद्युत घोटाले की जांच कराने की मांग की थी. लोकायुक्त ने किरीट सोमैया से करोड़ों रुपए के घोटाले की जांच के लिए निर्धारित प्रारूप के तहत आवेदन करने को कहा था. किरीट सोमैया ने बीते 3 अक्टूबर को निर्धारित प्रारूप पर इस घोटाले की शिकायत दर्ज कराई थी. इसके साथ ही घपले से जुड़े साक्ष्य भी उपलब्ध कराए. शिकायत में किरीट सोमैया ने ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय और पावर कारपोरेशन के सीएमडी नवनीत सहगल पर आरोप लगाए हैं कि पांच निजी पावर ट्रेडिंग कम्पनियों से महंगी दरों पर बिजली खरीद कर करोड़ों रुपए के राजस्व की क्षति पहुंचाई गई.

कुछ चुनिंदा कारोबारी घरानों को सरकारी जमीन सस्ती दरों पर उपलब्ध कराई गई. हजारों करोड़ की चीनी मिलों को औने-पौने दामों में बेंचकर 25000 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान पहुंचाया गया. टोरेंट पावर को आगरा विुत वितरण की फ्रेंचाइजी अनियमित तरीके से दी गई. पावर कारपोरेशन ने अडानी, ग्लोबल एनर्जी आदि कंपनियों से तीन से चार रुपए अधिक में समझौता किया. जबकि यह निजी कंपनियां 2100 मेगावॉट विुत का उत्पादन नहीं कर रही हैं. दूसरे राज्यों से खुदरा दरों पर खरीदकर यूपी को महंगे दामों में बिजली बेच रहे हैं.

माया के करीबी रहे नवनीत सहगल एंड कंपनी के बारे में बताया जाता है कि ये लोग हवा का रुख भांपने में बहुत तेज होते हैं. इन्हें मायावती के शासनकाल के आखिरी दिनों में अंदाजा हो गया था कि सपा की सरकार आने वाली है. इसी कारण इन्होंने सपा से तार जोड़ने शुरू कर दिए थे. और अब चुनाव रिजल्ट आने व सपा की सरकार बनने के दौरान इन्होंने बड़ा खेल कर दिया है. सबको एक लाइन से सेट कर दिया है. पहले कहा जा रहा था कि यूपी मे मुलायम सिंह के आने के बाद कई अधिकारियों पर गाज गिरनी तय है. मायावती के सबसे हनक वाले अधिकारी कुंवर फतेहबहादुर और नवनीत सहगल को जेल जाने का भय सता रहा है. सहगल को एनएचआरएम घोटाले में सीबीआई कभी भी उन्हें गिरफ्त में ले सकती है, ऐसी चर्चाएं थीं. पर ऐसा कुछ नहीं हो रहा है. कहा तो यह भी जा रहा था कि नवनीत सहगल पर मुलायम सिंह कई जांच बिठाने की तैयारी में है क्योंकि नवनीत सहगल उन अधिकारियों में से ही जिन्होंने सबसे पहले मुलायम को धोखा दिया था. पर राजनीति में सब कुछ संभव है. इन अफसरों ने अपने पैरोकारों के बल पर सबकी बोलती बंद कर दी है.

इस जोड़तोड़ को लेकर दैनिक जागरण, लखनऊ में तेजतर्रार पत्रकार नदीम की लिखी एक खबर भी प्रकाशित हुई है, जिसे आप पढ़ सकते हैं और इसके जरिए अंदाजा लगा सकते हैं कि मायावती के मनी बैग रहे अफसरों व लोगों को कितनी तेजी से सपा के लोग अपने में आत्मसात कर रहे हैं और ऐसे लोगों को सपा में आत्मसात कराने की होड़ सी मची हुई है. इस हाल में अंदाजा लगा सकते हैं कि यूपी में आगे के दिनों किस तरह का शासन देखने को मिलने जा रहा है. पढ़िए दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर…


दिल है कि मानता नहीं!

नदीम लखनऊ, 12 मार्च : सत्ता पाने की राजनीतिकों की रेस खत्म होते ही अच्छी पोस्टिंग पाने को नौकरशाहों की रेस शुरू हो गई है। जब-तब राजनीतिक दबाव का रोना रोने वाले नौकरशाह अच्छी पोस्टिंग हासिल करने के लिए राजनीतिकों के ही दरबार में शरणागत हैं। अक्सर संगोष्ठी या सेमिनारों में भले ही यह कहा जाता हो कि अगर ब्यूरोक्रेट राजनीतिकों की जी-हुजूरी कर पोस्टिंग लेंगे तो उनका हुक्म भी बजाना होगा, लेकिन कौन किसकी सुन रहा है? ब्यूरोक्रेसी तो बस सूंघने में लगी है कि कौन अखिलेश यादव का करीबी है और किसके जरिए पांच विक्रमादित्य मार्ग (अखिलेश यादव घर) तक पहुंचा जा सकता है? बस मुश्किल यह आ रही है अखिलेश अपने साथ उन अफसरों की टीम रखना चाहते हैं जिस पर किसी तरह की तोहमत न हो। इसलिए उन्होंने अफसरों की कुंडली बाचना शुरू कर दिया है। मायावती सरकार में बहुत ताकतवर समझे जाने वाले सचिव साहब का ही हाल देखिए। पिछली सरकार में उनके पास तमाम बड़े-बड़े विभाग तो थे ही, वह मुख्यमंत्री की आंख-कान भी समझे जाते थे। इस सरकार में भी वह अपना रुतबा बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने लखनऊ से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक के मालिक सपा नेता के जरिए अखिलेश यादव तक बात पहुंचाई है। वह यादव परिवार के एक करीबी रिश्तेदार की भी मदद ले रहे हैं और दिल्ली के एक बड़े इमाम से भी अपने नाम की सिफारिश करा दी है।

दिल्ली में तैनात यूपी काडर के एक अफसर मुख्य सचिव बनने को बेताब हैं। मायावती सरकार में वह मुख्य सचिव बनते-बनते रह गए थे। उस समय अपने साथ हुए बर्ताव की बुनियाद पर वह अपने को बसपा का दुश्मन साबित करने पर तुले हुए हैं। उन्होंने प्रोफेसर रामगोपाल यादव तक पहुंच बना ली है और वह उनके जरिये इस पर अपना ख्वाब हकीकत में तब्दील होते देखना चाहते हैं। एक प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी फिलवक्त तो दिल्ली में तैनात हैं, लेकिन उन्होंने अफसर बिरादरी में एलान कर दिया है कि वह ही प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री होंगे। वह तो चार मार्च को ही पांच विक्रमादित्य मार्ग पहुंचकर मुलायम सिंह यादव को सपा के सत्ता में आने की बधाई दे आए थे, जबकि वोटों की गिनती छह मार्च को होनी थी। पिछली मुलायम सरकार में भी वह खासी अहम भूमिका में थे। उस वक्त उन्हें अमर सिंह का यस मैन माना जाता था। पिछली सरकार में कहे गए हर काम को त्वरित गति से करने की अपनी काबिलियत के बल पर वह इस सरकार में सीएम के प्रमुख सचिव होना चाहते हैं। प्रमुख सचिव स्तर के ही एक और अधिकारी भी पंचम तल पर लौटने को बैचेन हैं। मुलायम सरकार में वह पंचम तल पर रह चुके हैं। मायावती सरकार में भी वह पंचम तल पर रहे, लेकिन फिलवक्त सचिवालय में हैं। पंचम तल पर तैनाती का जो दबदबा है, वह सचिवालय में तैनाती का कहां। उन्होंने इटावा के ही रहने वाले एक शख्स को पकड़ रखा है। इस शख्स के इटावा का होने की वजह से मुलायम परिवार से नजदीकी है। दिल्ली से अनिल कुमार गुप्ता की भी लखनऊ वापसी की चर्चा है। वह मुलायम सिंह यादव के बहुत भरोसे के अफसर माने जाते हैं। पंचम तल पर वह भी तैनाती पाने के इच्छुक हैं। आजम खां के प्रिय बताए जाने वाले विशेष सचिव स्तर के अधिकारी पंचम तल पर तैनाती पाने के इच्छुक हैं। आइपीएस में एके गुप्ता व रिजवान अहमद अखिलेश यादव से मुलाकात कर आए हैं। यह दोनों लोग डीजीपी बनने के ख्वाहिशमंद हैं।


पढ़ लिया आपने. खबरें और भी हैं जो छन छन कर आ रही हैं. आप सभी दिल्ली-लखनऊ के खोजी व तेजतर्रार पत्रकारों से अपील है कि वे नए शासनकाल पर गहराई से नजर रखें और खुद अपने ब्लाग व अखबार में न छाप पाएं तो एक गोपनीय मेल भड़ास तक इस भरोसे से पहुंचा दें कि उनका नाम सामने कतई नहीं आएगा, उनकी भेजी सूचनाओं पर हम लोग काम करेंगे.

हम लोग चाहते हैं 'नवीनत सहगल ने सपा को सेट कर लिया'' वाली चर्चा व खबर झूठी निकले. हम लोग चाहते हैं अखिलेश एक ऐसा शासन दें जो पूरे देश के लिए रोल माडल बने. हम लोग चाहते हैं कि नीतीश वाली स्टाइल में गुंडों को फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए तुरंत जेल मिले और भ्रष्टाचारियों के मकान जमीन कब्जा कर उनमें अस्पताल स्कूल खुलें. पर जनता और हमारी आपकी चाहत शासन में बैठे अफसरों तक नहीं पहुंचती. वे भ्रष्टतम लोग हैं और उनका काम ही है सभी को भ्रष्ट करते रहना. तो, जब तक अखिलेश व उनकी टीम इन भ्रष्ट अफसरों को अपने से दूर नहीं करेगी, उनको उनकी उचित जगह जेल नहीं भेजेगी, तब तक हम सभी को यह यकीन नहीं होगा कि अखिलेश की राज में सब ठीकठाक है.

यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

 

 
 

 

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