नहीं होता ठेका पत्रकार, प्रेस मालिकों को मजीठिया वेतनमान देना कानूनन मजबूरी है

मजीठिया वेतन बोर्ड लागू होने के बाद पत्रकारों के बीच एक ही चर्चा है कि प्रेस मालिक ठेका पत्रकार रख लेंगे, किसी को इसका लाभ नहीं मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं है। कानून की परिभाषा में ठेका पत्रकार होते ही नहीं और जो कर्मचारियों से कुछ भी लिखा कर उन्हें अपना गुलाम बनाने की बात करते हैं, वे प्रेस मालिक कर्मचारियों को उल्लू बनाने की कोशिश करते है। चूंकि प्रेस एक उद्योग है इस कारण इंण्डस्ट्रियल एम्प्लायमेंट (स्टैडिंग आर्डर्स) एक्ट 1946 के उपबंध यहां भी लागू होते हैं। इस एक्ट की धारा 38 के तहत कर्मचारियों से नियोक्ता की कोई अनलीगल शर्त स्वतः समाप्त हो जाती है।

कानून में इस बात का भी प्रावधान है कि भले ही आपसे बंदूक अड़ाकर या भय दिखाकर कोई कुछ भी करा ले, लिखा ले, उसकी कोई कानूनी मान्यता नहीं है। श्रमजीवी पत्रकार तथा अन्य समाचार पत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) और विविध उपबंध अधिनियम 1955 में या कानून में कहीं भी 'ठेका पत्रकार' शब्द का उल्लेख नहीं है, हां मजीठिया वेतन बोर्ड में अंशकालीक संवाददाता का जरूर उल्लेख है लेकिन उन्हें भी 30 से 40 प्रतिशत मजीठिया वेतनमान देना पड़ेगा।  
 
क्या होता है ठेका :  ठेका श्रमिक की परिभाषा अलग है। प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से कर्मचारी सप्लाई करने या ठेका श्रमिक रखने के लिए संविदा श्रमिक (विनियमन तथा उन्मूलन) अधिनियम 1970 की धारा 13 के तहत पहले एक ठेकेदार को पंजीयन कराना पड़ता है जो लेबर आफिस में होता है और इसकी लीगल फीस होती है यहां कम से कम 20 श्रमिकों के सप्लाई के नाम पर ठेका मिलता है। तभी ठेके श्रमिक से काम कराए जा सकते है यदि इस नियम का पालन कर पत्रकार की भर्ती की जाती है तो भी उसे ठेकेदार के माध्यम से मजीठिया वेतनमान देना पड़ेगा। हालांकि पत्रकार का कार्य एक मौसमी कार्य नहीं होता इसलिए ठेका पत्रकार नहीं रखे जा सकते। संविदा श्रमिक (विनियमन तथा उन्मूलन) अधिनियम 1970 की धारा 10 के तहत ऐसे कार्यों के लिए ठेका श्रमिक रखने को प्रतिबंधित किया गया है जो नियमित कार्य की श्रेणी में आते है। मतलब पत्रकारिता का पेशा ठेका श्रमिक रखकर नहीं कराए जा सकते। कंपनी या नियोक्ता कर्मचारी से कुछ भी लिखा ले और वह ठेका श्रमिक हो गया। यह गुमराह करने का तरीका है और लेबर कोर्ट में इस तरह की कोई दलील नहीं सुनी जाती।
 
मजीठिया वेतन देना कानूनन मजबूरी : प्रेस मालिकों को मजीठिया वेतनमान देना कानूनन मजबूरी है। वश पत्रकारों व पत्रकार संगठन को जागरूक होने की जरूरत है उनकी जिम्मेदारी बनती है कि यदि कही इस बोर्ड के आदेश का पालन नहीं हो रहा है तो वे लेबर कोर्ट में चुनौती दे या पत्रकार अपने संस्था के खिलाफ शिकायत करें चाहे वह गुमनाम ही शिकायत क्यों ना हो। पत्रकार अधिनियम 1955 के तहत इस कानून का पालन कराना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि प्रेस मालिक वेतन नहीं देते तो मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936 के तहत भारी भरकम जुर्माना होता है जो कुल वेतन का 10 प्रतिशत हो सकता है। पत्रकारों के वेतन भुगतान में भी मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936 की धारा 6 के तहत क्लेम किया जाता है। अधिनियम के अनुसार कर्मचारियों को वेतन माह की 7 तारीख तक मिल जाना चाहिए। इसी की धारा 7 के तहत यदि पीएफ की कटौती नहीं की जाती तो कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीण उपबंध 1955 के तहत भू-राजस्व के बकाया की भांति वसूली की जाती है तथा धारा 14 के अनुसार हर्जाना वसूल में कंपनी अपना अंशदान नहीं देती तो भारतीय दंड संहित की धारा 409 के तहत दंडनीय अपराध दर्ज होता है। रही बोनस की बात तो बोनस भुगतान अधिनियम 1965 की धारा 10 के अनुसार कुल वेतन का 8.33 प्रतिशत भुगतान करना चाहिए। जो एक माह के वेतन के बराबर होता है। धारा 31 के तहत 20 प्रतिशत का बोनस दिया जाता है। प्रेस के लिए कंपनी के मुनाफे के अनुसार कर्मचारियों को बोनस मिलना चाहिए नहीं तो उक्त अधिनियम लागू होते है।
 
पत्रकारों की छंटनी : यदि संस्थान को घाटा हो रहा है या किसी कारण से छंटनी करना चाहती है तो पहले इसकी विधिवत सूचना देकर छंटनी की प्रक्रिया शुरू की जाती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी को भी निकाल दे जो पहले आया है वह पहले जाएगा जो लास्ट में आया है वह अंतिम में जाएगा। और हर साल के 15 दिन के हिसाब से छंटनी मुआवजा देना पड़ता है जैसे यदि पत्रकार दो साल का किया तो 30 दिन का अतिरिक्त वेतन छंटनी मुआवजा के रूप में देना होता है। इसमें ग्रेच्यूटी की बात शामिल नहीं है वह अलग से देना पड़ता है। लेकिन यदि किसी पत्रकार को निकालना है तो पहले उसके खिलाफ आरोप और विभागीय जांच होती है यदि उसमें वह दोषी पाया जाता है तो 3 माह का वक्त देकर नमस्ते किया जाता है। लेकिन यदि कर्मचारी कार्यवाही से संतुष्ट नहीं तो लेबर कोर्ट से स्टे ले सकता है या चुनौती दे सकता है। यदि किसी कर्मचारी की सेवा एक वर्ष में 240 दिन से अधिक हो गई तो वह नियमित कर्मचारी मान लिया जाता है और उसका काम संतोषजनक माना जाता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 25 (एफ) में इसका उल्लेख है लेकिन इसका पालन ना कर कर्मचारी को निकालने पर निकालने की अवधि का वेतन और पुनः नौकरी पाने का कानून अधिकारी होता है।
 
कैसे बनता है परिवाद पत्र : कोर्ट में वेतन की चुनौती देने के लिए एक साधारण आरोप पत्र के समान परिवाद पत्र बनता है जिसे लेबर कोर्ट में कोई भी श्रमिक दायर कर सकता है इसके लिए मामूली कोर्ट फीस और टिकट लगता है उसके बाद आप कंपनी से कानूनी लड़ाई लड़ सकते है। बषर्ते कानून व धारा का ज्ञान हो और आप सामने वाले को अपने तर्को से मात दे सके तो फिर वकील की क्या जरूरत। इस बातों के बीच एक जरूरी बात छूटी रही है संस्थान को कर्मचारियों को वेतन कार्ड, अवकाश कार्ड देना कानून जिम्मेदारी है और इसका पालन ना करने पर जुर्माना होती है। श्रमाधिकारी की यह जिम्मेदारी होती है कि वह प्रेस में इस कानून का पालन कराए। और कर्मचारी यदि मुकदमा हारता है तो उसका सबसे बड़ कारण उसके पास कोई सबूत नहीं होता कि वह प्रेस का कर्मचारी है।

इस बेहद जानकारी भरे लेख के लेखक हैं वरिष्ठ पत्रकार महेश्वरी प्रसाद मिश्र.

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