नारकोटिक्‍स विभाग की तानाशाही पर पत्रकार लामबंद

नीमच। नारकोटिक्स के उप मुख्यालय में पदस्थ अधिकारियों द्वारा गत दिनों अफीम जब्ती की मामले की गई कार्रवाई को लेकर छपी खबर से बौखलाकर समाचार पत्र कार्यालय पर की गई कार्रवाई के विरोध में 4 जुलाई को पत्रकार लामबंद हो गए। सभी पत्रकारों ने गलत कार्रवाई का विरोध करते हुए प्रधानमंत्री के नाम एडीशनल एसपी तथा एसडीएम को ज्ञापन सौंपे। नारकोटिक्स उपायुक्त के निर्देश एक समाचार पत्र के कार्यालय पर जाकर सम्पादक तथा कर्मचारियों को डराने-धमकाने तथा सफेद पाउडर रखकर एनडीपीएस एक्ट में फंसाने के षडयंत्र से आक्रोशित पत्रकारों ने प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर मांग की कि अधिकारियों ने जिस प्रकार से अखबार के दफ्तर पर पहुंचकर तानाशाही ढंग कर्मचारियों को धमकाया।

इस बारे में पत्रकार सबसे पहले गांधीवाटिका में इकटठे हुए, जिसमें समाचार पत्र के कार्यकारी सम्पादक ने पूरे घटनाक्रम से पत्रकारों को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि नारकोटिक्स कार्यालय के कंट्रोल रूम से उन्हें लगातार फोन करके सूत्र की जानकारी मांगी जा रही थी। जिस पर उन्होंने कहा कि डीएनसी से बात करके पूरी स्थिति अवगत करा दी जाएगी। इसके बाद भी दो शासकीय ड्रेस तथा एक सिविल ड्रेस में अधिकारी प्रेस कार्यालय पहुंचकर धमकाने के साथ ही सूत्र न बताने पर पूरे विभाग को एनडीपीएस एक्ट में फंसाने की धमकी देते रहे। इसके बाद कार्यालय बंद करके जब घर जाने लगे तो ऑफिस बॉय ने बताया कि उन्होंने कार्यालय में एक पैकेट छोड़ दिया है। जिस पर कार्यालय को यथास्थिति में रखकर पुलिस को सूचना दी।

पुलिस ने मौके पर पहुंचकर पैकेट बरामद कर उसकी जांच की तो वह नमक पाया गया, जबकि प्रेस पर नमक का कोई काम नहीं है। उनकी बात सुनने के बाद सभी मीडियाकर्मियों ने तय किया कि नारकोटिक्स तथा अफीम फैक्ट्री की कोई भी सकारात्मक खबर को समाचार पत्र में स्थान नहीं दिया जाएगा, लेकिन यदि खबर तथ्यपरक और नकारात्मक होगी तो भी छापी जाएगी। इतना ही नहीं प्रेस कार्यालय पर पहुंचने वाले अधिकारियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कराने तथा की गई कार्रवाई के बारे में जानने के लिए 15 दिन फिर गांधीवाटिका में एकत्रित होने का निर्णय लिया गया। नारकोटिक्स विभाग का रवैया लंबे समय से तानाशाहपूर्ण रहा है।

कंट्रोल रूम के सामने परिचय देने के बाद घंटों खड़े रखना, किसी अधिकारी से बात करने या कराने में टालमटोल करना, हर मीडियाकर्मी को संदेह की नजर से देखना और उसी अनुरूप बर्ताव करना, छोटी सी खबर या अफीम जब्ती के मामले में मीडियाकर्मियों को बुलाकर अधूरी जानकारी देना, अपने किए कार्यों को बढ़चढ़कर बताना और मीडिया द्वारा मांगे जाने वाली जानकारी उपलब्ध नहीं कराना, किसी एक अखबार वाले को बुद्धिजीवी बताकर अन्य मीडियाकर्मी की निंदा करना तथा उसी अखबार वाले को सारी जानकारी देना विभाग की आदत में शुमार हो गया है। यही स्थिति अफीम एवं क्षारोद कारखाने के अधिकारियों की भी है। जहां सीआईएसएफ के जवानों से लेकर स्थानीय प्रबंधक एक ही भाषा में बात कर दुर्व्यवहार के आदि हो गए हैं। इन सभी बातों से पत्रकारों को खासी नाराजगी है और इसीलिए सभी ने ज्ञापन तथा खबरों के बहिष्कार का निर्णय लिया है।

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