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निर्दलीयों के लिए अब आसान नहीं है यूपी विधान सभा की राह

लखनऊ: अपनी शख्सियत के दम पर कभी 74 निर्दलीय उम्मीदवारों ने चुनावी बाजी मारकर उत्तर प्रदेश विधानसभा में रिकॉर्ड कायम किया था, लेकिन मौजूदा विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों की बढ़ती पैठ के चलते बदली परिस्थितियों में निर्दलीय सूरमाओं के लिए जीत दर्ज करना आसान नहीं रह गया है. अपने दम पर मैदान जीतना आसान न होता देख इस चुनाव में निर्दलीय सूरमाओं में से कुछ बड़े राजनीतिक दलों में शामिल होने या उनका समर्थन पाने में सफल रहे तो कुछ ने किसी छोटे राजनीतिक दल का दामन थाम लिया.

लखनऊ: अपनी शख्सियत के दम पर कभी 74 निर्दलीय उम्मीदवारों ने चुनावी बाजी मारकर उत्तर प्रदेश विधानसभा में रिकॉर्ड कायम किया था, लेकिन मौजूदा विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों की बढ़ती पैठ के चलते बदली परिस्थितियों में निर्दलीय सूरमाओं के लिए जीत दर्ज करना आसान नहीं रह गया है. अपने दम पर मैदान जीतना आसान न होता देख इस चुनाव में निर्दलीय सूरमाओं में से कुछ बड़े राजनीतिक दलों में शामिल होने या उनका समर्थन पाने में सफल रहे तो कुछ ने किसी छोटे राजनीतिक दल का दामन थाम लिया.

वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में कुल 2582 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे थे जिनमें से केवल नौ सूरमाओं रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, अखिलेश सिंह, इमरान मसूद, अजय राय, राम प्रकाश यादव, विनोद कुमार, अशोक यादव, यशपाल सिंह रावत और मुख्तार अंसारी ने जीत दर्ज की थी. इस विधानसभा चुनाव में सिर्फ अपनी शख्सियत और लोकप्रियता के भरोसे चुनाव जीतना आसान न होता देख विधायक अजय राय और विधायक इमरान मसूद ने इस बार कांग्रेस से टिकट का जुगाड़ कर लिया तो विधायक अशोक यादव ने जनता दल (युनाइटेड) का दामन थाम लिया.

विधायक अखिलेश सिंह नवगठित पीस पार्टी और मुख्तार अंसारी नवगठित कौमी एकता दल से चुनाव मैदान में हैं. वहीं, राजा भैया और विनोद कुमार चुनाव मैदान में तो निर्दलीय उम्मीदवार हैं लेकिन उन्हें सपा का समर्थन प्राप्त है. एक समय था जब निर्दलीय उम्मीदवार अपनी लोकप्रियता और शख्सियत की बदौलत बड़ी राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवारों को हराकर बड़ी तादाद में विधानसभा पहुंचते थे. मौजूदा विधानसभा चुनाव में ऐसे ही 1780 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों की कामयाबी के लिहाज से 1957,1962, 1967, 1985 और 1989 के चुनाव काफी अहम रहे. इन चुनावों में क्रमश: 74, 31, 37, 30 और 40 निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की थी. जानकारों का कहना है कि 1989 के बाद राजनीतिक दलों के प्रति जनता की प्रतिबद्धता बढ़ी, जिस कारण निर्दलीयों के लिए विधानसभा पहुंचना मुश्किल होने लगा. (एजेंसी)

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