निर्माता-निर्देशक गजेंद्र सिंह ने गिरफ्तारी विवाद प्रकरण पर अपना पक्ष रखा

: कब तक यूँ ही जुल्‍म सहती रहेगी हमारी रचनात्‍मकता, जरा सोचिए : दादागिरी और अब मीडियागिरी मुंबई के सिर चढकर बोलने लगी है। मीडिया अपने हितों के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। बात सिर्फ भड़ास के संपादक की नहीं है बल्कि और न जाने कितने लोगों की है जो बिना किसी गलती के पुलिसिया जुर्म का शिकार बनते हैं। पिछले दिनों मीडिया वालों की सुर्खियों में भारतीय टेलीवीजन का एक बडा नाम रहा। और इस नाम को मीडिया ने नहीं दिया बल्कि उसने इसे अपनी मेहनत और प्रतिभा से कमाया। आजमगढ से एक सपना लेकर मुंबई आने वाले एक युवा ने मुंबई में सफलता का परचम लहराया और इसमें उसने यश के अलावा कोई बदनामी का दाग अपने दामन पर नहीं लगने दिया।

लेकिन अचानक हुई एक घटना से सारेगामापा के निर्माता गजेंद्र सिंह को कानूनी दंश झेलना पडा। गजेंद्र सिंह के बारे में भड़ास ने पूरी तथ्‍यपरक रिपोर्टिंग की और पाठकों तक यह जानकारी पहुंचाई कि किस तरह मीडिया ने इस मामले में एकतरफा रुख दिखाया। न तो किसी चैनल ने उनका पक्ष जाना और न ही किसी अखबार ने उस शख्स तक पहुंचने की कोशिश की जो इस साजिश का मोहरा बना।

ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ क्‍योंकि यह मामला एक बड़े मीडिया संस्‍थान का था। लेकिन हम भड़ासी हैं और जहां लोग डरना शुरू करते हैं उसके आगे भड़ास जीना शुरू करता है। हम कल भी एक सच्‍चे, मेहनती, कर्मठी और इमानदार शख्स के साथ थे और आज भी हैं और कल भी रहेंगे। बहरहाल अब इस मामले में गजेंद्र सिंह के ऑफिस की तरफ से स्‍पष्‍टीकरण आ गया है जिसे हम हूबहू प्रकाशित कर रहे हैं। लेकिन सवाल उठता है कि कब तक मीडिया अपनी शक्तियों का दुरुपयोग भोले-भाले लोगों के खिलाफ करता रहेगा। लेकिन यह सवाल हमेशा आज के समय में गजेंद्र जैसे ढेर सारे उन लोगों को चुभता  रहेगा जो सिर्फ अपने काम में रमे हुए हैं और सही तरीके से आगे बढ रहे हैं। लेकिन हमारा कानूनी खुरपेंच उन्‍हें अपने आगोश में लेकर आने वाले समय के लिए उन्‍हें भयभीत कर देता है।

क्‍या ऐसी घटनाएं ऐसे रचनात्‍मक लोगों के लिए धब्‍बा नहीं है? क्‍या हमें ऐसे घटनाओं के बाद चुप होकर बैठ जाना चाहिए? जरा सोचिए! क्‍योंकि जब कल आप डोरवेल बजने पर अपना दरवाजा खोलेंगे तो हो सकता है कि आपके मेहमान आपको स्‍वागत करने का मौका देने के बजाए आपकी ''आवभगत'' में जुट जाएं। नीचे है गजेंद्र सिंह की तरफ से जारी बयान….


I was unaware about this case against me as a MD of Saaibaba Telefilms Pvt Ltd as all the summons and notices were served at our old address where we do not have a presence any more. This case was originally registered in the year 2007 against one of our ex employees who was working with Saaibaba Telefilms and was later transferred to the MD of Saaibaba Telefilms Pvt Ltd. The services of the employee in question had already been terminated in XXX/2009 . As soon as I was made aware of this, the Complainant was contacted and the case was settled immediately and amicably the very next day. This was an oversight which could have been avoided.

I have great respect for the Indian Judicial system and I have been co operating with the relevant authorities in the past few days as per the guide lines of our country's legal system. I was instructed to appear in from of the Kanpur court which I have done and settled this dispute with the complainant who in turn have withdrawn the case and have legally freed Saaibaba Telefilms Pvt Ltd and myself from any court proceedings and dues.

I wish to re iterate that Saaibaba Telefilms will always honor the commitments that they make. This legal matter reached such a magnitude due to the various procedural issues which have been sorted from our side. We endeavor to be fair and committed to our fellow members in the media/ entertainment business and will strive to achieve our goals in the most ethical manner."


 

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