नीतीश क्या बनेंगे, किंग या किंगमेकर?

एनडीए और बीजेपी से नाता तोड़ने के बाद से नीतीश कुमार ने बहुत कुछ कहा है। तमाम पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में उनके लंबे-लंबे इंटरव्यू प्रकाशित-प्रसारित हुए हैं, मगर उन्होंने इसका कोई संकेत नहीं दिया है कि आख़िर वे अब करना क्या चाहते हैं, उनका लक्ष्य क्या है? उन्होंने अपने सारे पत्ते सीने से लगाकर रखे हैं और सबको कयास लगाने के लिए खुला छोड़ दिया है।

वैसे भी नीतीश कुमार घुन्ना किस्म के नेता माने जाते हैं। उनके आलोचक तो यहाँ तक कहते हैं कि उनके मुँह में नहीं, पेट में दाँत हैं। इसका मतलब यही है कि वे किसी को हवा नहीं लगने देते कि उनकी अगली चाल क्या होगी। इसलिए ये स्वाभाविक ही है कि नीतीश की भावी रणनीति को लेकर किसी के पास सीधा जवाब नहीं है।

दरअसल, नीतीश की अगली चाल को समझने के लिए उनको और उनकी राजनीति को समझना बहुत ज़रूरी है। इसमें संदेह नहीं है कि वे एक महत्वाकांक्षी नेता हैं और बड़े दाँव खेलने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इसीलिए ये तय है कि ना नुकुर करने के बावज़ूद वे चुपचाप प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को मज़बूत कर रहे होंगे। ये उनकी भावी राजनीति की पटकथा का हिस्सा है। आम चुनाव के ठीक पहले मोदी को मुद्दा बनाकर एनडीए से रिश्ता तोड़ने के पीछे इसके अलावा और कोई कारण नहीं हो सकता कि अब वे राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाना चाहते हैं। दो चुनाव जीतकर और लालू यादव को ध्वस्त करने के बाद प्रदेश की राजनीति में उन्हें जो हासिल करना था वे कर चुके हैं। प्रदेश सरकार अगले ढाई साल के लिए सुरक्षित है इसलिए उनके पास खोने के लिए भी कुछ नहीं है। ऐसे में साफ़ है कि राष्ट्रीय राजनीति ही उनका एजेंडा हो सकती है और वहाँ भी वे छोटे खिलाड़ी के रूप में तो नहीं ही खेलना चाहेंगे, वर्ना बीजेपी ने क्या बिगाड़ा था।

वैसे भी बिना किसी बड़े लक्ष्य के बीजेपी से सत्रह साल पुराना रिश्ता तोड़ने के पीछे कोई मामूली वजह नहीं हो सकती। अगर राज्य के मुस्लिम मतदाता ही उनकी चिंता का विषय थे तो इसकी फ़िक्र उन्हें पहले भी होनी चाहिए थी। आखिर वे संघ परिवार से हर स्तर पर लंबे समय से जुड़े हुए थे। इसलिए ये मानकर चलना चाहिए कि वे किंगमेकर नहीं किंग की भूमिका के लिए तैयारी कर रहे हैं। लेकिन वे मोदी की तरह हड़बड़िया नहीं हैं कि मान न मान मैं तेरा मेहमान वाली शैली में हर जगह खुद को प्रस्तुत करने लगें। वे फूँक-फूँक कर आगे बढ़ेंगे और जब तक उन्हें भरोसा नहीं हो जाएगा कि उनके लिए सिंहासन तैयार है तब तक अपना माथा तिलक के लिए आगे नहीं बढ़ाएंगे।

वास्तव में जल्दबाज़ी नीतीश के स्वभाव में नहीं है। कोई भी फ़ैसला लेने से पहले वे लंबा वक्त लेते हैं और लंबी तैयारी करते हैं। लालू यादव को सत्ता से हटाने के लिए उन्होंने अरसे तक तैयारी और गोलबंदी की थी। मोदी से भी उनकी रार कोई दो-चार साल की नहीं है। पिछले करीब दस साल से वे मोदी से दूरी बरतने की कोशिश कर रहे थे और 2005 में बिहार में सरकार बनाने के बाद से तो खुलकर अदावत दिखाने लगे थे। किसी भी चुनाव में प्रचार के लिए आने से रोकने से लेकर कोसी के बाढ़ पीड़ितों के लिए भेजा गया चेक लौटाने तक वे लगातार संबंध तोड़ने की भूमिका तैयार कर रहे थे। इसी के समानांतर बीजेपी से अलग होने की ज़मीन भी तैयार हो रही थी। जब उन्होंने बिहार में अपने पाँव अच्छे से जमा लिए और अपनी सत्ता को काफ़ी हद तक निरापद बना लिया तब बीजेपी को आख़िरी झटका दिया।

नीतीश को करीब से देखने वाले जानते हैं कि वे अपनी छवि को बहुत प्यार करते हैं। वे चाहते हैं कि लोग उन्हें साफ़-सुथरे और सत्ता से विरक्त एक ऐसे राजनेता के रूप में देखें, जो जनहित के अलावा कुछ सोचता ही नहीं है। मीडिया का इस्तेमाल करके उन्होंने इस छवि को भली-भाँति गढ़ा है और देश-दुनिया में इसी छवि का प्रचार-प्रसार भी खूब किया-करवाया है। बहरहाल, सचाई चाहे जो हो लेकिन चूँकि नीतीश अपनी इसी छवि के ज़रिए अपनी दावेदारी को पुख़्ता करना चाहते होंगे, इसलिए अपने मुँह से कभी नहीं कहेंगे कि वे प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा रखते हैं। ये कहने के लिए उनके पास बहुत से लोग हैं, लेकिन उनको भी समय से पहले बोलने नहीं दिया जाएगा। राहुल गाँधी के बरक्स दावेदारी प्रस्तुत करने को उतावले नरेंद्र मोदी का चरित्र ठीक इसका उलटा है। इसी उतावली में उन्होंने अपनी पार्टी का बना बनाया खेल बिगाड़ दिया। अलबत्ता एक बिहारी के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद जगाकर मतदाताओं को रिझाने में वे और उनकी पार्टी हरगिज नहीं चूकना चाहेगी।

नीतीश की एक दूसरी छवि उनके प्रचार अभियान के बावज़ूद बनी है और जो सच के करीब भी है। निजी एवं सार्वजनिक व्यवहार में वे भी मोदी ही की तरह हठी और दंभी हैं। उनके साथ काम करने वाले नेता इसे बेहतर जानते हैं। सत्ता और राजनीति के संचालन में इसकी बराबर झलक मिलती रही है। इसी तरह वे अपने विरोधियों के मामले में बहुत निर्मम हैं। मोदी की ही तरह उन्होंने किसी भी ऐसे नेता को खड़े नहीं होने दिया है जो उनकी आलोचना करे या उन्हें चुनौती दे सके। इसीलिए जेडीयू और नीतीश एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। पार्टी में किसी भी नेता की कोई ख़ास हैसियत नहीं है चाहे वे शरद यादव ही क्यों न हों। मीडिया के साथ भी उनका बर्ताव भी इसी तरह का रहा है। बिहार का मीडिया इसे अच्छी तरह समझता है और ऐसा कुछ भी करने से बचता है जिससे उन्हें नीतीश का कोपभाजन बनना पड़े।

नीतीश की छवि-निर्माण परियोजना में हाल में आए परिवर्तन पर भी ग़ौर किया जाना चाहिए। हालाँकि ये उन्होंने मोदी के संदर्भ में मोदी के विरूद्ध शुरू की थी। इस नई छवि में वे खुद को पिछड़े एवं ग़रीब राज्यों के नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। यहीं उन्होंने मोदी के विकास मॉडल के बरक्स अपने विकास मॉडल को रखकर अमीर बनाम ग़रीब की शक्ल दे दी है। नीतीश के राजनीतिक मॉडल की परिकल्पना का आधार भी यही है। वे खुद को समावेशी और धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, ख़ास तौर पर बीजेपी से संबंध विच्छेद के बाद से। ये इसी परियोजना का कमाल है कि वे एक ही झटके में सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष नेता बन गए हैं और उन्होंने भारतीय राजनीति में एक बार फिर से धर्मनिरपेक्षता के आधार पर ध्रुवीकरण की शुरुआत कर दी है। यहां तक कि प्रधानमंत्री तक उन्हें सर्टिफिकेट दे रहे हैं और वामपंथी दल उनके समर्थन में खड़े हो गए हैं।

नीतीश ये भली-भाँति जानते हैं कि एनडीए से नाता तोड़कर उन्होंने भारतीय राजनीति में तमाम संभावनाओं को खोल दिया है। लड़ाई अब यूपीए बनाम एनडीए तक सिमटी नहीं रह गई है और सारे प्रयोगों के लिए मैदान खुल गया है। पार्टियों और मोर्चों के लिए ही नहीं प्रधानमंत्री बनने के बहुत सारे महत्वाकांक्षियों को भी कुर्सी ज़्यादा करीब दिखने लगी है। ज़ाहिर है ऐसे में उसी की दावेदारी मज़बूत होगी जो ज़्यादा से ज़्यादा सीटें जीतकर लाएगा और जिसकी सबसे ज़्यादा स्वीकार्यता होगी। इस लिहाज़ से नीतीश का काम अभी आधा भी नहीं हुआ है। बिना बीजेपी के उन्हें अब अपनी सीटों में इज़ाफ़ा भी करके दिखाना होगा। अगर वे इसमें कामयाब नहीं हुए तो प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी जगहँसाई की वजह भी बन जाएगी। नीतीश ये कतई नहीं चाहेंगे, इसलिए उनकी नीति इंतज़ार करने और देखने की होगी।

नीतीश की राजनीति की एक ख़ासियत ये भी है कि वे अंतिम समय तक रहस्य बनाकर रखते हैं। इसका लाभ ये होता है कि वे कभी भी अपना फ़ैसला बदल सकते हैं या अन्य विकल्पों को आज़मा सकते हैं। इसीलिए उन्होंने काँग्रेस के संकेतों का आधा-अधूरा जवाब ही दिया है। वे ममता बैनर्जी के तथाकथित फेडरल फ्रंट की व्याख्या भी गोलमोल तरीके से कर रहे हैं और तीसरे मोर्चे का ज़िक्र छिड़ने पर हँस देते हैं। मगर उन्होंने इनमें से किसी भी विकल्प को न तो खारिज़ किया है और न ही किसी के प्रति अपना अनुराग दिखाया है। साफ़ है कि जब तक वे कोई फ़ैसला नहीं ले लेंगे तब तक भनक भी नहीं लगने देंगे। हो सकता है काँग्रेस से कोई डील हो, जाए। हो सकता है न हो और वे तीसरे विकल्प के गठन में सक्रियता के साथ जुट जाएं।

लोग आज नीतीश में लोहिया और जयप्रकाश को ढूँढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, मगर सचाई ये है कि दोनों ही बहुत पीछे छूट गए हैं। समाजवाद भी पीछे छूट गया है और ग़ैर काँग्रेसवाद अगर छूटा नहीं है तो बहुत कमज़ोर ज़रूर पड़ गया है। मंडल के प्रभाव में समाजवादी जाति आधारित राजनीति को अपना अस्त्र बना चुके हैं। इसके ज़रिए आसानी से सत्ता मिलने के कारण उनका इस पर भरोसा भी बढ़ा है। नीतीश ने बिहार में नई सोशल इंजीनियरिंग करके इसे और आगे बढ़ा दिया है। लालू यादव के मुस्लिम-यादव समीकरण के जवाब में उन्होंने जिस जातीय गणित को आकार दिया है, अब सही मायनों में उसकी परीक्षा होगी ये नीतीश बखूबी जानते हैं। इसलिए अपने राजनीतिक भविष्य का निर्धारित करने के पहले वे इसे मज़बूत करने में जुट जाएंगे। फिलहाल यही उनकी पहली प्राथमिकता होगी। इस मोर्चे पर वे जितना आश्वस्त होंगे उसी से उनकी भावी राजनीति भी निर्धारित होगी।

वरिष्‍ठ पत्रकार मुकेश कुमार का यह लेख नईदुनिया में भी प्रकाशित हो चुका है.

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