नेताओं ने खरीद लिया न्यूज़ चैनल्स को

18 सितम्बर 2013 को देश के दो बड़े अंग्रेजी न्यूज़ चैनल्स पर दिल्ली विधान सभा की 70 सीटों को लेकर एक सर्वे दिखाया ! "टाइम्स-नाउ" औए "सी-वोटर" ने भाजपा-कांग्रेस को तक़रीबन बराबरी (30-29 सीट) पर दिखाया, और "आप" को महज़ 7 सीट जीतते बताया ! जबकि "सी.एन.एन-आई.बी.एन." और कांग्रेसी सांसद बिरला के "हिन्दुस्तान टाइम्स" के "खेल" में दिल्ली में, कांग्रेस को लगातार चौथी बार काबिज़ होते बताया गया, भाजपा को हरा दिया गया !

यहाँ ध्यान देने वाली ये बात है कि टाइम्स नाउ, हल्का सा ही सही, भगवा खेमे को प्रोत्साहित करता है, जबकि सी.एन.एन.-आई.बी.एन. तो कांग्रेस का माउथ-पीस बनने को बेकरार ही है ! अब बात हिन्दी न्यूज़ चैनल की ! "आज तक" नाम का चैनल पूरी तरह भाजपा को समर्पित हुआ जान सा पड़ता है ! भाजपा से ज़्यादा नरेंद्र मोदी को ! इस चैनल की वेबसाईट हो या टेलीकास्ट, हर जगह नरेंद्र मोदी-नरेन्द्र मोदी !

देश में मौजूद महंगाई-बेरोजगारी-भ्रष्टाचार-बिगडती क़ानून व्यवस्था तो, अब इस चैनल पर एलियन की तरह ही नज़र आती हैं ! देश के दूर-दराज़ के हिस्से में क्या चल रहा है, इस बात से इस चैनल का वास्ता कभी-कभार (भूल-वश) ही पड़ता है ! बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि "आज तक" के प्राइम-टाइम के कई (दुर्भाग्यवश) नामचीन पत्रकार , निजी तौर पर भी भगवा मेल-मिलाप में लिप्त हैं ! बरसों से ! इन्हीं को अहम् ज़िम्मेदारी मिलती है , "आज तक" को  भगवा कलर में रंगने के लिए ! आप बतौर दर्शक "आज तक" चैनल और इसकी वेबसाईट को देखें , तो रोजाना का इसका ढर्रा ये बताता है कि परदे के पीछे भी "गठबंधन" की राजनीति होती है ! फ़र्क सिर्फ ये होता है कि ये राजनीति, दो राजनीतिक दलों के बीच ना होकर एक राजनीतिक दल और एक न्यूज़ चैनल बीच होती है ! जिसकी रामकहानी ये होती है, कि, "तुम मुझे देखो-मैं तुम्हे" ! "इंडिया.टी.वी." के रजत शर्मा के बारे में तो सब को मालूम है कि, भगवा विचारधारा ही "इंडिया टी.वी" को पालती-पोसती है ! इस टी.वी. को न्यूज़ चैनल की दुनिया में "कार्टून" का दर्ज़ा हासिल है, मगर कार्टून बच्चों का पसंदीदा चैनल होता है ! ये चैनल दर्शकों के "मानसिक बचपन" का फायदा खूब उठाता है !

उधर दीपक चौरसिया नाम के एक "बीमार" पत्रकार के नेतृत्व में ऊँचाइयों को छू रहा ""इंडिया न्यूज़" है तो कट्टर कांग्रेसी विनोद शर्मा का मगर, बतौर एडिटर-इन-चीफ़, दीपक इसे भगवा रंग में रंग रहे हैं ! आसाराम की यौन क्षमताओं और रंगीनियत से बेहद प्रभावित, दीपक चौरसिया पत्रकारिता जगत की त्रासदी हैं ! मगर "राजनीति" के चलते छाए हैं ! बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि दीपक का भगवा बैकग्राउंड ही उन्हें पत्रकारिता में प्रवेश और "उंचाई" के लिए ज़िम्मेदार है ! ज़ाहिर है, दीपक अपना नमक अदा कर रहे हैं ! "स्टार-न्यूज़" से "ए.बी.पी.न्यूज़" बन चुका, ये चैनल नरेंद्र मोदी का इस कदर प्रचार करता है कि मानो ये भाजपा का कोई दैनिक "मुखपत्र" हो ! लगता ही नहीं कि इस चैनल को देश में मौजूद दूसरी समस्याओं के बारे में कोई गहरी जानकारी हो ! "ज़ी- न्यूज़" की चर्चा अप्रसांगिक हो चली है क्योंकि "फिरौती" मांगने के आरोपी इस चैनल के बेशर्म संपादकों का मुंह दिखाना और बक-बक करना मीडिया में ""गिरावट की इन्तेहाँ है ! "न्यूज़ २४" को न्यूज़ चैनल कहना न्यूज़ की तौहीन होगी ! मगर न्यूज़ चैनल का तमगा हासिल ये चैनल कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला का है ! राजीव शुक्ला की राजनीति ही चाटुकारिता पर जीवित है, लिहाज़ा कांग्रेस के अलावा इस चैनल पर किसी और दल को ऊपर रखा जाए , ये बुद्धिमानी की बात नहीं होगी ! ये कुछ बानगी है देश के कुछ "नाम" वाले न्यूज़ चैनल्स की !

इसमें कोई दो-राय नहीं कि मेन-स्ट्रीम का मीडिया हो या सोशल-मीडिया, नरेंद्र मोदी ने इनका जैम कर उपयोग किया ! गुजरात दंगों और समृद्ध गुजरात को ज़्यादा खुशहाल बनाने के अलावा नरेंद्र मोदी के पास कोई योग्यता नहीं थी जो उन्हें राष्ट्रीय स्तर का नेता और प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना दे ! ये मीडिया का ही कमाल था कि बेहद गरीब और बीमारू राज्य के मुख्यमंत्रियों का शानदार काम,फर्श पर चला गया और पहले से ही बेहद अमीर राज्य के मोदी का काम अर्श पर ! खुद भाजपा के कई बड़े दिग्गज , मोदी के मीडिया प्रबंधन का शातिराना अंदाज़ नहीं समझ पाए ! अब जब समझ गए हैं तो हाशिये पर पड़े हैं ! कांग्रेस के कई बड़े दिग्गज भी मीडिया प्रबंधन में कूदे , मगर महंगाई की मार से शर्मसार वो खुल कर "समर्थन" नहीं पा पाए ! किसी की नाकामी , बिना कुछ किये किसी दूसरे की काबिलियत कैसे बन जाती है , ये बात कोई नरेंद्र मोदी से पूछे !

साम्प्रदायिक दंगे किस तरह किसी व्यक्ति को लोकप्रिय बना सकते हैं ,ये बात भी सिर्फ नरेंद्र मोदी ही जानते हैं ! किसी एक राज्य की खुशहाली, पूरे देश की किस्मत बदल देने वाली साबित होगी, ये बात शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, नितीश कुमार जैसे नेता भले ही ना जान पाए हों पर नरेन्द्र मोदी ने मीडिया की मदद से ये हवाई-महल खडा कर दिया ! अब ये देखना बाकी है कि जब ये महल भर-भरा कर गिरेगा तो , इसकी ज़िम्मेदारी नरेंद्र मोदी और इन्हें बेतहाशा "प्रायोजित" करने वाला मीडिया लेता है या मीडिया की तरह नरेंद्र मोदी भी पल्ला झाड कर निकल लेंगें !

खैर ! कुछ भी हो पर इतना ज़रूर है जिस आम आदमी को मीडिया में अपना अक्स नज़र आने लगा था , अब वही मीडिया राजनीति के रंग में रंग गया है ! आम की जगह ख़ास लोग मीडिया में नज़र आने लगे हैं , चाहे वो समाचार-प्रस्तुतकर्ता हों या समाचार ! "बदनाम गलियों" की एक कहावत हैं, कि,  "बाज़ार में बिको, पर इस कदर भी मत बिको को कुछ वक़्त बाद खरीदार भी मिलना मुश्किल हो जाए" ! कहते हैं आज का दौर पूंजीवाद का है और इसमें वही टिकेगा जिसके पास पूंजी होगी ! पर "टिकने" और "बिकने" का फासला बड़ी तेज़ी से कम हो रहा है और जो सबसे खतरनाक बात ,कि, "टिकने" और "बिकने" के लिए पैसों के साथ-साथ, मज़हबी उन्माद भी बतौर हथियार इस्तेमाल हो रहा है !

नीरज के ब्लाग 'लीक से हटकर' से साभार.

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