नेतृत्व का अभाव कांग्रेस को भारी पड़ेगा

‘एग्जिट पोल हमेशा ‘एक्जेक्ट पोल' नहीं होते, लेकिन वे जनमत सर्वेक्षणों के नतीजों की तरह अनाप-शनाप भी नहीं होते। यदि उनका नतीजा यह है कि अभी हुए पांच राज्यों के चुनावों में कांग्रेस चार राज्यों में हार रही है तो लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि वह क्यों हार रही है और इस हार के परिणाम क्या होंगे? इसका असर लोकसभा के आगामी चुनावों पर क्या होगा?
 
पांच राज्यों में से मिजोरम को फिलहाल छोड़ा जा सकता है। अभी हम केवल मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली की ही बात करें। इन राज्यों में लोकसभा की कुल 72 सीटें हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं और राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस की। भारतीय जनता पार्टी की दो और कांग्रेस की दो सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में काफी ठीक-ठाक काम किया है। यदि उनके काम-काज में थोड़ा-बहुत फर्क है तो 19-20 का ही है।
 
फिर भी क्या वजह है कि राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस हारती हुई दिखाई पड़ रही है? इसकी वजह यह नहीं है कि जनता सत्तारूढ़ दलों के विरुद्ध हो गई है। सत्तारूढ़ तो भाजपा भी दो प्रांतों में रही है। लोकमत उसके विरुद्ध क्यों नहीं हुआ? क्योंकि वास्तव में इस समय देश में कांग्रेस-विरोधी हवा बह रही है। कांग्रेस की केंद्र और राज्य सरकारों ने अनेक ऐतिहासिक और उल्लेखनीय काम किए हैं, लेकिन वे भी इस प्रभंजनकारी हवा में उड़ गए हैं। इन चुनावों में उन कामों की तरफ कांग्रेसी नेताओं ने बार-बार जनता का ध्यान दिलाया है। उन्होंने बताया कि सूचना का अधिकार, मनरेगा के अंतर्गत रोजगार का अधिकार, भोजन-सुरक्षा, शिक्षा का अधिकार, महिलाओं, बुजुर्गों और अल्पसंख्यकों को विशेष सुविधाएं आदि भारत में पहली बार किसी सरकार ने जनता को प्रदान की हैं, लेकिन, कांग्रेस विरोध की हवा में ये सब जन-सेवाएं चिकने घड़े पर पानी की तरह फिसल गईं।
 
मतदाताओं के दिमागों में कुछ बातें घर कर चुकी हैं। सबसे पहली बात तो यह कि उन्हें कांग्रेस के शीर्ष पर नेतृत्व का अभाव आश्चर्य में डुबोता है। दुनिया की यह सबसे बड़ी और महान पार्टी आज बिना मस्तूल के जहाज की तरह हो गई है। जब-जब देश में कोई बड़ी घटना या दुर्घटना हुई, इस पार्टी के नेता गायब दिखे और यदि उन्होंने मुंह खोला तो इतनी देर से खोला कि तब तक उनकी दुकान लुट चुकी थी। राष्ट्रकुल खेल या 2-जी घोटाला हो, निर्भया दुष्कर्म प्रकरण हो, अन्ना-रामदेव के जनता पर असर डालने वाले आंदोलन हों, आतंकवादी घटनाएं हों, महंगाई हो या और कोई ज्वलंत समस्या, देश के लोगों को लगता रहा कि कांग्रेस के नेतृत्व को शायद मुंह का लकवा हो गया है।
 
हर नाजुक मौके पर वह बोलने में देर करती है और जो बोलती है, वह भी अटपट और लटपट होता है। उसका उलटा ही असर होता है। उसके कुछ नेता कई नाजुक मुद्दों पर ज्यों ही अपना मुंह खोलते हैं, लाखों वोट कच्चे चबा डालते हैं। राहुल गांधी ने बड़े नाटकीय ढंग से एक पत्रकार-परिषद में अपने प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की जो धज्जियां बिखेरी, उसने राहुल की अपरिपक्वता पर तो मुहर लगाई ही, सरकार की इज्जत को भी पैंदे में बिठा दिया। कांग्रेस को रौंदने के लिए भाजपा के हाथियों की जरूरत ही नहीं है, उसके घर में ही ‘पुरु के हाथियों’ की कमी नहीं है, जो अपनी ही सेना को रौंद देते हैं। जब शीर्ष नेतृत्व ही वोटों के खजाने में सेंध लगा रहा हो तो बेचारे प्रांतीय नेता- अशोक गहलोत और शीला दीक्षित कहां तक टेका लगा सकते हैं।
 
इसके विपरीत भाजपा ने अपने नेतृत्व को सफलतापूर्वक उभारा है। नरेंद्र मोदी को नेता घोषित करते ही उसका आंतरिक द्वंद्व समाप्त हो गया। कम से कम जनता तो यही महसूस करती है। भारत दुनिया का अकेला मूर्तिपूजक देश है। वह लाख लोकतांत्रिक बन जाए, लेकिन उसके करोड़ों मतदाता किसी एक नेता पर अपनी आस्था टिकाए बिना नहीं रहते। देश में जब-जब स्थायी सरकारें बनी हैं, कोई न कोई बड़ा नेता उसके पहले उभर चुका था। हम जरा देखें, इतिहास की तरफ। नेहरू, इंदिरा, नरसिंह राव और अटलबिहारी वाजपेयी। इनकी सरकारें पांच-पांच साल या उससे ज्यादा चलीं। राजीव गांधी की सरकार भी पांच साल चली, लेकिन वह ‘शहीद इंदिरा गांधी’ की सरकार थी। इन प्रांतीय चुनावों में जहां-जहां मोदी गए, लोगों की भीड़ और भीड़ का उत्साह देखने लायक था। प्रांतीय नेताओं का जलवा तो वहां था ही, मोदी का जादू भी लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था। इस बार सभी प्रांतों में मतदान का प्रतिशत काफी बढ़ गया है, क्यों? क्योंकि नए नौजवान मतदाता तो आए ही, कांग्रेस से खिसियाए हुए लोगों को अब आशा की एक नई किरण उभरती हुई दिखाई पडऩे लगी है।
 
अकेली दिल्ली में त्रिकोणात्मक संघर्ष रहा। आम आदमी पार्टी ने जोरदार टक्कर दी। टेलीविजन चैनलों और अखबारों में तो दी ही, मैदानी काम भी उसने डटकर किया। यदि उसे पांच सीटें भी मिल गईं तो लोकसभा चुनावों में उसे 50 सीटें मिलने की आशा बंध सकती है। एक हवाई आंदोलन में से एक ठोस पार्टी का आविष्कार कर लेना कोई मामूली बात नहीं है। अन्ना हजारे अभी भी काठ के घोड़े को पीटे जा रहे हैं। ‘आम आदमी’ की चींटी अगर चार कदम भी चल पड़ी तो वह बड़े-बड़े हाथियों की नाक में दम कर देगी।
 
तो आगामी लोकसभा चुनावों में क्या होगा? देश के अन्य प्रांतों में सिर्फ कांग्रेस और भाजपा का द्विदलीय मुकाबला नहीं है। वहां प्रांतीय दल भी होंगे और कुछ अन्य अखिल भारतीय दल भी निश्चित ही होंगे। हालांकि, पिछले पांच साल में कांग्रेस की करनी ऐसी रही है कि उसने एक अखिल भारतीय उलट-चेतना पैदा कर दी है। उसने भ्रष्टाचार और कुशासन को राष्ट्रीय मुद्दे बना दिए हैं। हालत यह हो गई है कि ये मुद्दे क्षेत्रीय मुद्दों पर काफी भारी पड़ेंगे। जैसे कि 1977 में आपातकाल पड़ गया था।
 
जातिवाद, भाषावाद और सांप्रदायिकता का असर रहेगा जरूर, लेकिन देश के मतदाता लोकसभा चुनाव में शायद अखिल भारतीय मुद्दों को ही अपने मतदान का आधार बनाएंगे। करोड़ों युवा मतदाता अब जात और मजहब के कठघरे से निकलकर विकास और संपन्नता के सपने देख रहे हैं। ऐसी स्थिति में इन चार हिंदी-राज्यों में कांग्रेस की हार का बिगुल सारे देश में गूंजेगा, क्योंकि कांग्रेस देश की सबसे बड़ी और अखिल भारतीय पार्टी है। यदि 8 दिसंबर को वाकई कांग्रेस बुरी तरह से हार गई तो भी उसमें कोई नेतृत्व-परिवर्तन नहीं होगा। क्यों नहीं होगा, इसका कारण सभी जानते हैं। यही वजह है कि जो नरेंद्र मोदी को (जो अभी तक प्रांतीय नेता और भाजपा में द्वितीय स्तर पर रहे हैं) एक अखिल भारतीय नेता बनाएगी। नरेंद्र मोदी अगर भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे तो उसका श्रेय सबसे अधिक कांग्रेस को होगा।
 
लेखक वेद प्रताप वैदिप वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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