नेपाल का भटका गैंडा महराजगंज के सोहगी बरवां वन्‍य जीव प्रभाग में पहुंचा

 

इन दिनों महराजगंज के सोहगी बरवाँ वन्य जीव प्रभाग में चितवन नेशनल पार्क का गैंडा आर्कषण का केन्द्र बना हुआ है। चितवन नेशनल पार्क से अक्सर भटक कर गैंडे सोहगी बरवाँ वन्य जीव प्रभाग में पहुँच जाते हैं। इसके पहले भी 9 दिसम्बर 2009 तथा 9 दिसम्बर 2010 को भटक कर गैंडा यहाँ पर आये हुए थे। 
सोहगी बरवॉ के उत्तरी चौक रेंज के कोरियहवा कोठी के अगल-बगल गैंडे ने अपना वास-स्थल बनाया हुआ है। गैंडे को सुरक्षित एवं संरक्षित सोहगी बरवाँ उनके आराम और सुकून उपलब्ध कराता है। ऐसे में गैंडे एक दो महीने यहीं पर ठहर जाते हैं। पुनः अपने स्थल को लौट जाते हैं। चितवन नेशनल पार्क के अन्य जानवर भी यहां पर बिछड़कर पहुंच जाते हैं। वन्य जीव जंतुओं को न तो सरहद रोक सकता है न ही उन्हें देश की जानकारी है। ऐसे में सेंचुरी के अधिकारी उसके संवर्धन और संरक्षण के लिये उस स्थल को कोर जोन घोषित कर दिया है।
 
कैसे पहुँचते हैं गैंडे  – चितवन नेशनल पार्क और बिहार के बाल्मीकि व्याध्र परियोजना त्रिवेणी नदी के अगल-बगल है, ऐसे में क्रीड़ा करता हुआ गैंडा नदी पार कर बाल्मीकि व्याध्र पहुँच जाता है। उसके बाद बाल्मीकि व्याध्र परियोजना एंव सोहगी बरवाँ सेन्चुरी का शिवपुर रेंज एंव निचलौल रेंज को गंडक नदी विभाजित करती है, ऐसे में आराम से गैंडा इस ट्रॉन्जिट से सोहगीबरवाँ के जंगल में पहुंच जाता है। ऐसे आने-जाने में चितवन नेशनल पार्क की दूरी 20 किमी0 पड़ती है। जबकि गैंड़े 30-40 किमी0 एक दिन में घुमा करते हैं।
 
कैसे बिछड़ते है गैंडे – जनवरी और फरवरी के महीने में सुबह और रात में अक्सर इनका मिलन होती है। मिलन में 20-30 किमी0 की दूरी तय करते हैं। और गैंडे अक्सर रात में मिलन करते हैं और सीधे दिशाओं 35-40 किमी0 चलते हैं। मिलन के समय ही अपने साथी से बिछड़ कर उसकी खोज में काफी दूरी तक आगे बढ़ जाते है। चूंकि पीछे और दाहिने-बांये इनको देखने की स्थिति नहीं होती है और काफी आगे बढ़कर बिछड़ जाते हैं और पुनः स्मरण आने पर उसी रास्ते अपने सूंघने की शक्ति के द्वारा उसी स्थान पर पहुँच जाते हैं।
 
एशियाई गैंडे अधिक से अधिक एक सींग वाले होते हैं। उनके ऊपर के घेरे में कवर कर मेंशा की तरह बुम्पस से इनके शरीर में बुहत कम बाल होते हैं। इनका वजन 1900-3800 किलोग्राम तक होता है और 2 मीटर लम्बे गैंडा सहवास करने के लिये रात और सुबह में सक्रिय होते झीलों-नदियों तालाबें में अक्सर रात को सहवास को अन्जाम देते हैं ऐसे में इनमें रात में ही लम्बीं दूरी तय करने की आदत होती है। रात में भटकने की इनकी अधिक सम्भावना रहती है भारत के असम राज्य के सरकारी पशु के रुप में गैंडे ने अपनी जगह बना ली है। 1960 के दशक में 310 गैंडे नेपाल के चितवन नेशनल पार्क में थे, जो दशकों के साथ इनकी संख्या घटती गयी अब मात्र 65 गैंडे ही चितवन नेशनल पार्क में बचे है। 
 
डब्‍ल्‍यू-डब्‍ल्‍यूएफ और अन्य गैर सरकारी संगठनों ने 1980 के दशक में एक राइनो स्थानान्तरण योजना शुरू किया था, जिसमें गैंड़ों को एक जगह से दूसरे जगह भेजकर इनके प्रजनन को बढ़ावा दिया जाता था। इस योजना की पहली जोड़ी नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से पाकिस्तान के तराई पाकिस्तान लाल सुहाना राष्ट्रीय उद्यान में भेजा गया। अकेले केवल 2002 में वाइल्ड लाइफ फेडरेशन आफ वर्ल्ड के रिकार्ड में 37 गैंडों को मारकर उनके बहुमूल्य सींघ को शिकारियों ने बेंच दिया था। गैंडा सूंघने के लिये अपने परिग्राही होठ का हमेशा प्रयोग करते हैं। गैंडा गर्भधारण 15 महीने का करते हैं। उसके बाद ये 34-51 महीने के अंतराल पर पुनः गर्भधरण करते हैं। गैंड़े अपने सुरक्षा के लिए शत्रु पर सीधे सींघ से प्रबल प्रहार करता है। दल-दल या छिछले पानी में अधिक समय तक रहने वाला गैंडा पानी सूखने पर अपना जगह बदल देता है। घास के घने जंगलों में गैंडे अपने मार्ग बना लेते हैं। इन संकरे रास्ते से वे प्रतिदिन गुजरते रहते हैं, जो लम्बी घास झुकने के कारण सुरंगों की भाँति बन जाते हैं। गैंड़ा इन खुफिया रास्तों से लम्बी-2 दूरियां बिना देखे तय कर लेते हैं।
 
क्यों पड़ती है शिकारी की नजर – चीन और फ्रांस के मार्केट में गैंडे के सींग की अधिक मांग है। गैंडे की सींग किसी जगह रख देने पर वहाँ की तरँगे काम करना छोड़ देती हैं। पूर्व की दशक में नेपाल में भी इनकी काफी मांग होती थी। इनके सींग से नेपाल में खगौती बनती है। जो यौनवर्धक दवाइयों में प्रयोग होता है। दवाइयों की मॉग खाड़ी देशों में अधिक होती है। ऐसे में सोहगी बरवाँ सेन्चुरी का यह सुखद एहसास यह गैंडा उठा रहा है। उधर नेपाल के चितवन नेशनल पार्क ने गैंडे़ की खोजबीन शुरु कर दी है। वहीं सोहगी बरवाँ वन्य जीव प्रभाग के उत्तरी चौक के रेंज के रेंजर आर.एन.पाठक ने बताया कि गैंडे के लिए संरक्षण एवं संवर्धन के लिए हम लोगों ने गश्त बढ़ा दिया है। जब तक गैंडा रहेगा तब तक उस जगह कोर जोन घोषित कर दिया गया है। रास्ते बन्द करके आवाजाही रोक दी गयी है।
 
महराजगंज से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की रिपोर्ट. 

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