नेपाल के लिए आगे क्‍या है रास्‍ता?

जब डा. बाबू राम भटटराई नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे तब नेपाली जनता में यह आशा जगी थी कि नेपाल में राजनीतिक गतिरोध जल्द ही समाप्त हो जायेगा। नया संविधान बनेगा। नया नेपाल नई रोशनी में तरक्की और खुशहाली की नई इबारत लिखेगा। इस सोच के पीछे कुछ जायज वजहें भी थीं। मसलन डा. बाबूराम भटटराई का उदारवादी चेहरा। राजनैतिक दूरदृष्टी। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की उनकी शैक्षणिक पूष्ठभूमि। यही नहीं माआवादियों के भूमिगत आन्दोलन के दौरान जो कुछ जानकारी उनके बारे में छनकर आती थी उससे भी उनके विराट राजनैतिक व्यक्त्वि का ही पता चलता था। संविधान सभा के चुनाव में गोरखा से वे सभासद चुने गये थे। वे सर्वाधिक 82 प्रतिशत मत हासिल करने वाले वे नेपाल के पहले सभासद थे। जो रिकार्ड मतों से जीते थे।

27 मई की अर्धरात्रि तक आम नेपाली के अलावा सामान्य बौद्धिक स्तर के आम नेपाली को भी यह अहसास हो चला था कि नये संविधान की घोषणा डा. बाबू राम भटटराई द्वारा आखिरी लमहों में ही सही, जाते जाते कर दी जायेगी। साथ ही आम जन को यह भी भरोसा था कि जिन जिन बिन्दुओं पर असहमति है उसे रूपान्तरित संसद द्वारा बाद में हल कर लिया जायेगा। लेकिन इसके उलट प्रधानमंत्री ने मध्यरात्रि संविधान सभा के दूसरे चुनाव का एलान कर सभी को चौंका दिया। अब सवाल उठता है कि नेपाल की शान्ति प्रक्रिया कैसे पटरी पर आयेगी? अब आगे का रास्ता क्या है? उन विवादित मुद्दों का अब क्या होगा जिस पर सहमति बन गयी है? मसलन माओवादी लड़ाकुओं का समायोजन? क्या संविधान सभा का नया चुनाव ही नेपाल की राजनैतिक गतिरोध को समाप्त कर नये नेपाल के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगा? या फिर रास्ते और भी है? दूसरा सबसे अहम और महत्वपूर्ण सवाल चार साल पहले हुए संविधान सभा के चुनाव से नेपाली जनता को क्या हासिल हुआ? जिसमें अरबों रुपयों के अलावा नेपाली जनता के सपने स्वाहा हुए अलग से? कुल मिलाकर नेपाल की शान्ति प्रक्रिया वहीं आकर ठहर गयी हैं जहां से चार साल पहले चली थी। नया संविधान तयशुदा समय सीमा के भीतर न पाने से शान्ति प्रयासों को गहरा धक्का लगा है।

आपको याद दिला दें प्रधानमंत्री बनते ही छठ और बकरीद पर्व के मौके पर देश वासियों को शुभकामना देते हुए प्रधानमत्री भटटराई ने जनकपुर में कहा था कि नये संविधान का पहला मसौदा 30 नवम्बर 2011 तक सार्वजनिक कर दिया जायेगा। चार बार संविधान सभा की समय सीमा बढ़ाने के बावजूद संविधान नहीं पेश हो पाया। माओवादी अध्यक्ष व गणतंत्र नेपाल के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहल उर्फ प्रचण्ड तो बाबूराम भटटराई से दो कदम आगे जाते हुए 5 नवम्बर 2011 को अपनी अमेरिकी यात्रा से पूर्व ही राजनैतिक गतिरोध समाप्त कर शान्ति प्रक्रिया को पटरी पर लाने को आतुर दिख रहे थे। उसके पीछे उनकी मंशा विश्व बिरादरी को यह संदेश देने की थी माओवादी राजनीति की मुख्य धारा में आकर नेपाल को प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया में लाने के लिए पूरी तरह गंभीर है। भोली भाली नेपाली जनता आंख मूंदे अपने नेताओ पर भरोसा करती रही है। अन्ततः उसे निराशा ही हाथ लगी। विभिन्न राजनैतिक दलों की मुसलसल बैठकें और तमाम तरह की सहमति के कथित प्रयासों के बावजूद भी नया संविधान चार वर्षों में नहीं बन पाया।

बतातें चलें कि नेपाल में संविधान सभा का चुनाव चुनाव मात्र दो सालों के लिए किया गया था। नेताओं ने अपनी राजनैतिक स्वार्थों को उपर रख कर ही काम किया। इनकी दलगत निष्ठा हमेशा ही राष्ट्रीय निष्ठा पर भारी पड़ी। नेपाली जनता ने नेताओं को भेजा तो था संविधान बनाने के लिए लेकिन किस तरह सत्ता की ललक ने एक एक कर सभी राजनैतिक दलों के चेहरों से नकाब हटा दिये। सत्ता के इस खेल में यह जगजाहिर हो गया कि सभी दल कुर्सी के लिए कितने बेताब हैं। कुर्सी के में नेपाली जनादेश की अवहेलना करते हुए कुल चार बार संविधान सभा की मियाद बढ़ायी गयी। पहली बार एक साल, दोबारा 6 माह के लिए, तीसरी और चौथी बार तीन तीन माह। बार बार संविधान सभा की समय सीमा को बढ़ाये जाने के मसले को नेपाल की सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए इस बार समय सीमा बढ़ाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। जो कि 27 मई को खत्म हो गयी। इस तरह दो साल के लिए गठित संविधान सभा चार वर्षों में नेपाली जनता को नया संविधान देने में नाकामयाब रही।

राजनैतिक विश्लेषकों की माने तो बहुत से विवादित मसले हल कर लिए गये थे जिसमें माआवादी लड़ाकों के समायोजन का मसला सबसे अहम था। इसके अलावा विभिन्न जातियों व समूहों से भी सहमति बन गयी थी। नया संविधान न बन पाने के पीछे प्रमुख कारण जाति के आधार पर राज्यों के गठन का मसला है। मधेशी हिमाली व जनजाति के लोग अपने अपने लिए जाति पर आधारित राज्य के गठन के लिए सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब हो गये। संविधानसभा के 11 राज्य माडल के खिलाफ 14 व 18 राज्य बनाने के अलग अलग प्रस्ताव दिये। दो बड़ी सियासी जमात नेपाली कांग्रेस व नेकपा एमाले जाति आधारित राज्य के गठन के प्रस्ताव के खिलाफ थी परिणाम स्वरूप सहमति नहीं बन पायी।

संविधान सभा अपनी तय समय सीमा खत्म होते ही स्वतः भंग हो गयी। प्रधानमंत्री भटटराई ने नये चुनाव की घोषणा को नेपाली कांग्रेस व एमाले सहित कुछ अन्य सियासी दलों ने असंवैधानिक करार दिया हैं और प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने की मांग राष्‍ट्रपति राम बरण यादव से की है। अब राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री विभिन्‍न राजनैतिक दलों के बीच सहमति कैसे बना पाते है नेपाली सियासत के आगे का रास्ता इसी से तय होगा। देखा जाये तो नेपाल के सियासी दल क्षुद्र राजनैतिक स्वार्थों से उपर नहीं उठ पा रहे है। भटटराई के पुनः चुनाव कराने की घोषणा के पीछे भी सियासी लाभ को ही ध्यान में रखा गया है। दस वर्षों के जनयुद्ध के दौरान माओवादियों ने आदिवासी, जनजाति के लोगों का समर्थन मिला था। जाति आधारित राज्यों के गठन की असफलता का ठींकरा वह नेपाली कांग्रेस व नेकपा एमाले के सिर फोड़कर सियासी लाभ लेने की फिराक में है। माओवादी इसे अपने सियासी चश्में की नजर से देख रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि चुनाव में इन्हें लाभ होगा। आदिवासी और जनजाति का वोट अपने पक्ष में करने के मकसद से ही भटटराई ने चुनावी तुरुप का पत्ता खेला है।

राजनैतिक विश्लेषक भी यह मान रहे है कि माआवादियों को चुनावी लाभ अवश्य मिलेगा।ै काठमाण्डू स्थित स्वतंत्र पत्रकार व राजनैतिक विश्लेषक रमेश घिमिरे ब्यास की माने तों निश्चित रूप से संविधानसभा के अगला चुनाव यदि हुआ तों इसका लाभ माआवादियों को ही मिलेगा। श्री ब्यास के मुताबिक नेकपा एमाले व नेपाली कांग्रेस अपने गिरते हुए जनाधार से चिन्तित है वो चुनाव का सामना करने से कतरा रहे हैं। इसलिए वे चुनाव का विरोध कर रहे है।ब्यास कहतें है कि लोकतंत्र में जब सियासी दल समस्या का समाधान करने में नाकामयाब होते हैं तो समाधान का रास्ता सीधे जनता की द्धार पर ही जाता है।लोकतंत्र में आखिरी फैसला जनता ही करती है। पंचायत काल के चुनावों को यदि दरकिनार कर दे तो बमुशिकल नेपाली जनता को कुल 60 साालों में मात्र 6 बार ही चुनाव को मौका मिला है। हर बार जनता परिपक्व होकर आती है। इसलिए वर्तमान कामचलाउ सरकार का यह निर्णय सैद्धाान्तिक रूप से मुझे तो सही लगता है।आगे किस बात पे और किस आधार पर सहमति बनेगी कुछ कहा नहीं जा सकता।

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री सूर्य बहादुर थापा भी सैद्धान्तिक रूप से जनता के बीच जाने के चुनावी निर्णय को गलत नहीं मानते लेकिन उनका कहना है कि गठबंधन सरकार में इतना बड़ा निर्णय राजनैतिक दलों की आपसी सहमति से ही लिया जाना चाहिए था। गठबंधन की सियासत में इतना बड़ा फैसला किसी एक राजनैतिक दल को अकेले लेने का अधिकार नहीं है। मधेशी जनाधिकार फोरम के सभासद अभिषेक प्रताप शाह कहते हैं अब किस मुंह से जनता के बीच जाया जाये। जनता ने तो दो साल दिये थे संविधान बनाने के लिए बीत गये चार साल। अब एक बार फिर चुनाव। 601 सदस्यीय जम्बू संविधान सभा क्या नेपाली आकांक्षा को पूरा करने में कामयाब होगी? इस सवाल के जवाब में श्री शाह कहते हैं कि इस सवाल का जवाब तो बहुत मुश्किल है लेकिन शायद यही एक रास्ता है जो अवाम की दहलीज तक ले जाता है।

हालांकि चुनावी प्रक्रिया में अभी भी कई पेंच है। राजनैतिक दलों में अभी आगे किस तरह की सहमति बनती है काफी कुछ इसी बात पर निर्भर करेगा। यहां सवाल यह भी पैदा होता है कि क्या एक और संविधान सभा का चुनाव गतिरोध को खत्म कर देगा? क्या नये संविधान सभा के गठन से नेपाली जनता को नया संविधान मिल जायेगा इसकी गारण्टी क्या है? नेकपा एमाले के युवा नेता सिराज फारूकी कहते है कि नये चुनाव की घोषणा और अब उसपर होने वाला व्‍यय नेपाली जनता की कमर तोड़ देगी। संविधान सभा पर पहले ही अरबों रुपये खर्च हो चुके हैं। श्री फारूकी कहते हैं कि संविधान सभा के यदि विश्व इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है यह अधिकांश जगहों पर संविधान सभा असफल रही है। श्री फारूकी कहते है कि संविधान सभा का पहला चुनाव 1784 में फ्रांस में हुआ था। दुनिया में लगभग 85 प्रतिशत संविधान सभाएं असफल हो चुकी है। राजनैतिक दलों को आपसी सहमति कायम कर वर्तमान गतिरोध को खत्म करने का तहे दिल से कोशिश करनी चाहिए।

क्या नये संविधान सभा का चुनाव सारे मसलों का हल है? जो संविधान सभा चार वर्षों में नया संविधान नेपाली जनता को नहीं दे पायी वो इस बार की संविधान सभा दे पायेगी इसकी गारण्टी क्या है? संविधान सभा के अलावा भी क्या कोई ऐसा विकल्प है जो नेपाली जन अकांक्षा को पूरा करते हुए नया संविधान भी दे सके? यह अहम सवाल भी लोगों को परेशान कर रहे हैं। नेपाल के संविधान विशेषज्ञ भीमार्जुन आचार्य के अनुसार 601 सदस्यीय संविधान सभा का चुनाव व भारी भरकम खर्च आम नेपाली पर डालना कत्तई उचित नहीं है। यह अंतहीन सिलसिला बंद करना ही नेपाल के लिए हितकर होगा। श्री आचार्य के मुताबिक संविधान सभा का नया चुनाव कराने के बजाय नेपाल के सियासी दलों को आपसी सहमति कायम कर संसद का चुनाव कराना चाहिए। नया संविधान बनाने का जिम्मा सर्वानुमति से गठित आयोग को सौंप देना और इसे निर्वाचित संसद से पारित करवा देना सबसे बेहतर विकल्प हो सकता है।

पिछले कुछेक दशक से नेपाल में राजनैतिक अस्थिरता व गतिरोध ने नेपाली जनमानस में अनिश्चय के हालात पैदा कर दिये हैं। आम नेपाली में निराशा का माहौल है। थोड़ी सी जो उम्मीदें उसे संविधान सभा से थी वो सपना भी धूलधूसरित हो गया है। राजनीतिक गतिरोध कायम है। नेपाली जनता ने नेपाल के सियासी दलों पर अपना भरोसा जताया। संविधान सभा के जरिये नया आईना बनाने की जिम्मादारी सौंपी। जनान्दोलनों में सियासी दलों की भागीदार बनी। देखा जाये तो यह संकट मात्र संविधान का संकट नहीं है सियासी जमातों पर आम नेपाली जनता के विश्वसनीयता का भी संकट है। पिछले 240 सालों की सामन्तवादी व्‍यवस्था को ढहाने म यही जनता में कारगर साबित हुयी। कहना गलत न होगा कि आज नेपाल जिस मुहाने पर आकर खड़ा है उसके जिम्मेदार सिर्फ और जिम्मेदार नेपाल के राजनैतिक दल और उसके नेता ही हैं। नेपाली जनता ने तो अपने फर्ज बखूबी निभाये हैं। और अब भी अपना फर्ज निभा रही है। फिलवक्त राजनैतिक दल ही खुद नेपाल की समस्या है। और समानधान भी।

लेखक सगीर ए खाकसार स्‍वतंत्र पत्रकार हैं तथा नेपाल के कपिलवस्‍तु में रहते हैं.

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