नेशनल दुनिया संपादकीय पेज पर छापेगा कविता, लेकिन स्‍तरीय कविताओं का सूखा

Pradeep Saurabh : इन दिनों कविताएं टनों में लिखी जा रही हैं। फेसबुक पर तो कवियों ने अपनी कविताओं का हमला बोल ही रखा है। हमने नेशनल दुनिया में एक नए प्रयोग के तहत संपादकीय पेज पर प्रतिदिन एक कविता प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। लेकिन अफसोस है कि हमें स्‍तरीय कविताएं प्रकाशन के लिए नहीं मिल पा रही हैं।

क्‍या सचमुच अच्‍छी कविताएं नहीं लिखी जा रही है्? शायद मौजूदा वक्‍त कविता के हस्‍तक्षेप का सही वक्‍त है, फिर ये सूखा क्‍यों है..!

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं नेशनल दुनिया के संपादक प्रदीप सौरभ के एफबी वॉल से साभार.

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