‘नोट के बदले वोट’ में दोहरा भ्रष्टाचार

'नोट के बदले वोट' के कुख्यात मामले का कैसा सुखांत हुआ है? इतना सुखांत नाटक तो कालिदास और शेक्सपियर भी नहीं लिख सके हैं! इस सुखांत नाटक के महानायक हमारे मित्र अमरसिंह हैं। आज के अखबारों में अमरसिंह छाए हुए हैं। अदालत ने ‘वोट के बदले नोट’ मामले में छह लोगों को बरी किया है लेकिन हर अखबार ने इस खबर के शीर्षक में अमरसिंह का नाम छापा है। आज अमरसिंह से ज्यादा खुश कौन होगा? उनका नाम सबसे ज्यादा क्यों उछला है? क्योंकि सारा देश यह मानकर चल रहा था कि सांसदों को पैसे खिलाकर संसद में कांग्रेस को बचाने का काम अमरसिंह ने किया है।

इस मामले ने 22 जुलाई 2008 को सारे संसार को चकित कर दिया था, जब भाजपा सांसदों ने तीन करोड़ के नोटों की गड्डियों को हमारी संसद में लहरा-लहराकर दिखाया था। देश के सारे टीवी चैनलों पर यह दृश्य देखकर पूरा देश हतप्रभ हो गया था। सांसदों का कहना था कि यह पैसा उन्हें अमरसिंह ने अपने किसी कर्मचारी के हाथ भिजवाया था ताकि वे नोट लें और उनके बदले वोट दें। वे भाजपाई होते हुए कांग्रेस सरकार के लिए वोट दें।

भाजपा के इन तीनों सांसदों ने खुद को बेचने की बजाय रिश्वत देने वालों का भांडाफोड़ करने की कोशिश की। इस कोशिश में उनकी सहायता लालकृष्ण आडवाणी के सहायक सुधींद्र कुलकर्णी ने की और एक टीवी पत्रकार को उन्होंने तैयार किया! इस पत्रकार ने सीडी तैयार की और उसे सार्वजनिक कर दिया। सरकार और रिश्वत देने वालों की सारे देश में भयंकर थू-थू हुई लेकिन अब अदालत के फैसले ने सबको-रिश्वत लेने वालों और उन्हें उजागर करने वालों को-एक साथ बरी कर दिया है। अदालत का कहना है कि यह महज एक नाटक था।

अदालत का यह फैसला बहुत ही निराशा उत्पन्न करता है। लेकिन इसमें अदालत का दोष क्या है? अदालत यह तो मानती है, जैसा कि सारे देश ने टीवी पर देखा, कि नोटों के बंडल संसद में लहराए गए लेकिन अदालत को कोई ऐसा ठोस सबूत नहीं मिला कि ये नोट अमरसिंह के थे। अमरसिंह के बैंक-खाते से इतने रुपए कभी निकले ही नहीं। यह भी सिद्ध नहीं हो सका कि ये रुपए अमरसिंह ने ही श्रीवास्तव नामक व्यक्ति को दिए थे, सांसदों को देने के लिए। श्रीवास्तव अमरसिंह का कर्मचारी था, इसके भी कोई प्रमाण नहीं मिले। अब अदालत का फैसला क्या हो सकता था जबब चोर और चौकीदार, दोनों एक ही थाली में जीम रहे हैं। कैसी हाथ की सफाई दिखाई है, सरकार ने।

यदि सरकारी एजेंसियों ने इस केस की ईमानदारी से जांच की होती, उसे ईमानदारी से लड़ा होता तो फैसला ऐसा आता कि यह सरकार पांच साल बाद भी गुड़क जाती लेकिन इस सरकार ने पहले तो सांसदों को भ्रष्ट करने की कोशिश की और जब वह रंगे हाथ पकड़ा गई तो उसने अपनी जांच एजेंसियों को भिड़ा दिया, उस कालिख को पोंछने के लिए। पहले उसने संसद की मर्यादा भंग की और अब उसने न्यायपालिका को अपना काम नहीं करने दिया। भारत की संसद के माथे पर लगे इस कलंक को धुलवाना अगली सरकार का कर्तव्य होना चाहिए। आरुषि-हत्या के मामले की तरह ‘वोट के बदले नोट’ का मामला दुबारा कभी अदालत में लाया जाना चाहिए और अपराधियों को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए और जिन लोगों ने इस मामले का भांडाफोड़ किया है, उन्हें सम्मानित किया जाना चाहिए।

लेख वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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