नौसिखिये पत्रकारजी भी पेशेवर होंगे

जनसंवाद माध्यम के विविध पक्षों पर पर तो खूब चर्चा होती है, लेकिन इन चर्चाओं में ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े लोग व उनकी कार्यशैली पर चर्चा कम होती है। तकनीक के ढेरों साधन की सुविधा पा चुके जनसंवाद माध्यमों ने जहां महानगरीय क्षेत्रों में पत्रकारों की गतिशिलता बढ़ा दी है, वहीं ग्रामीण क्षेत्र में इसकी पहुंच होते हुए अभी कृष्णपक्षीय स्थिति है।

तकनीक के आने से पहले से ही ग्रामीण पत्रकार उपेक्षित थे। शोषित थे। बड़े शहरों में तो समय के साथ पत्रकारों की स्थिति में कुछ बदलाव हुआ है, लेकिन गंवई पत्रकार अभी भी शहर में स्थित मीडिया संस्थानों से एक मामूली राशि का मानदेय पाने के लिए महीनों उम्मीद के साथ पसीना बहाते है। जो चतुर थे, उन्होंने समय पर मीडिया मालिक के शोषण के नजरिये को ताड़ लिया। लिहाजा, मेहनत वाली खबरों पर पसीना बहाना छोड़ दो-चार सौ रुपये की जुगाड़ वाली खबरों पर मेहनत करना शुरू कर दिया। पत्रकारिता छोड़ प्रभावशाली लोगों के पिछलग्गू बन गए। लिहाजा, अब ग्रामीण पत्रकारिता के नाम पर ही कुछ खास लोगों व संस्थानों के गतिविधियों की खबरे आती है।

कहने वाले कहते हैं कि जिला संवाददाता पूरी तरह दलाल होते हैं। वे बिना लेन-देन के अनेक खबरों को मुख्य मीडिया हाऊस तक जाने ही नहीं देते हैं। पर जिला संवाददाता और ग्रामीण संवाददाता को दलाल की संज्ञा देने वाले कभी इस बात की जिरह नहीं करते कि उनके मानदेय से ज्यादा कुछ मिलना चाहिए। मानदेय से ज्यादा की बात छोड़िये जो फैक्स, ई-मेल अथवा पेट्रोल आदि का खर्च है, वही मानदेय के रूप में तय समय में मिल जाए। विज्ञापन में आगे पंगु पत्रकारिता के हित की बात करने वाले को भी भारतीय गांवों की पत्रकारों में पिछड़ा माने जाने लगा है। विशेष आयोजन पर दिग्गज पत्रकार भले ही गाल बजा लें, लेकिन कभी मौका रहते उन्होंने भी इस हालात को बदलने की कोई कोशिश नहीं की।

संस्थानों में उपेक्षित ग्रामीण डेस्क पत्रकारिता के पेशे में अधिक्तर पत्रकार एक दूसरे को मूर्ख और खुद को तीसमारखां समझते हैं। लेकिन कभी भी अपनी तीसमारखाईं दिखाने के लिए स्वयं पहल करके ग्रामीण डेस्क की जिम्मेदारी उठाने की नहीं सोचते। जब कभी संस्थान के वरिष्ठकर्मी अपने किसी सहयोगी से दु:खी होते हैं तो उसे ग्रामीण डेस्क पर भेजने का दंड देते हैं। जो लोग प्रिंट की पत्रकारिता में डेस्क पर कार्य कर चुके हैं, वे यदि संवेदनशील हो तो इस बात को समझ सकते हैं कि यह डेस्क कितना उपेक्षित रहता है। उसे कितनी हेय दृष्टि से देखा जाता है। हालांकि कार्य-कौशल दिखाने की असली गुंजाईश ग्रामीण डेस्क पर ही होती है।

ऐसा कई बार होता है, जब गांव का पत्रकार एक बेहतरीन खबर को बेतरतीब शैली में महज सूचना के रूप में लिख कर भेजता है। उसे नये सिरे से शब्दों में संजों कर बेहतरीन खबर बनाई जा सकती है। ऐसा कई बार हुआ है, जब ऐसी बेतरतीब लिखी खबर को अच्छे से लिखी गई और वह पहले पेज की खबर बनी। उस खबर से प्रशासन जगा और संबंधित गड़बड़झाले का संज्ञान लेते हुए प्रशासन ने कारर्वाई भी की। ऐसे खबरों के लिए ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। लेकिन रोजमर्रा की दिनचर्या में फिर से ग्रामीण पत्रकारों के महत्व और ग्रामीण डेस्क को उपेक्षित कर दिया जाता है। काम का अंतर ग्रामीण डेस्क पर कम समय में ज्यादा काम होता है। अमूमन ग्रामीण पेज समाचारपत्रों के डाक संसस्करणों में होते हैं।

दूर-दराज के डाक संस्करण रात 10.30 से 11.30 तक छूट जाते हैं। शहर संस्करण के लिए रात एक बजे तक का भी समय चल जाता है। यदि अखबार का प्रसार कम हो तो कई बार दो बजे तक भी खबरों में बदलाव हो जाते हैं। लेकिन डाक संस्करणों में ऐसा नहीं होता। ग्रामीण पेज जब पहले बनते हैं तो जाहिर सी बात है खबर भी पहले चाहिए। लेकिन महानगरीय पत्रकारों की कार्यशैली से उलट ग्रामीण पत्रकारों की कार्य दिनचर्या होती है। वे पूरी तरह से पत्रकार नहीं होते हैं। जब मीडिया संस्थानों की ओर से उन्हें समय पर मानदेय नहीं मिलता है तो वे जीविका के लिए निर्भर दूसरे व्यावसायों से जुड़े रहते हैं। लिहाजा, उनकी प्राथमिकता में खबरों के लिए भागना नहीं होता है। पहले वे उनक कार्य को देखते हैं, जिससे उनकी रोजी सुनिश्चित होती है। उसी के साथ-थोड़ी बहुत दैनिक खबरों की सूचनाएं जुटाते हैं।

अधिकतर अखबारों में अमूमन शाम पांच से आठ बजे तक ग्रामीण खबरों की बाढ़ होती है। सैकड़ों खबरों के संपादन के लिए ग्रामीण डेस्क पर पर्याप्त सहयोगी नहीं होते हैं। लिहाजा, अक्सर वे जल्दी और सरसरी तौर पर खबरों को देख कर पेज के लिए जारी कर देते हैं। ढ़ेरों खबरों के दबाव के कारण कई बार उन्हें न चाहते हुए कि प्रूफ की छोटी मोटी गलतियों की अनदेखी करनी पड़ती है। क्योंकि डाक संस्करण को समय पर छोड़ने का बड़ा दबाव होता है, यदि वह समय पर अखबार का बंडल संबंधित स्थान तक जाने वाले वाहन में नहीं लदा तो वह बंडल वहीं पड़ा रह जाएगा।

सामान्य कई बार छोटी-बड़ी खबरों के लिए ग्रामीण संवाददाता सौदेबाजी कर लेते हैं। ऐसा कार्य उनका है, जो पेशेवर पत्रकार नहीं है। ऐसे लोगों के कारण ही कुछ काम करने वाले ग्रामीण पत्रकार बदनाम हैं। ऐसे पत्रकारों के हालात में सुधार तो नहीं हुआ, लेकिन सौदेबाजी करके अवसरवादी पत्रकारों ने बिना किसी मानदेय के संपन्न हो गए। ऐसे कई पत्रकार मतलब की खबरों से स्थानीय प्रशासन में पैठ जमा चुके हैं और ग्रामीणों के छोटे-मोटे काम थोड़े-बहुत पैसे के दम पर करवाते हैं। स्थानीय स्तर पर ऐसे पत्रकार प्रभावशाली हो गए हैं। लेनदेन के मामले को संभल कर निपटाते हैं। स्थितियों के अनुसार बिना लेनदेन की खबर भी देते हैं। ऐसे ग्रामीण पत्रकार ज्यादा सफल हैं। उसे स्थानीय स्तर पर थोड़ा बहुत सम्मान भी है। वहीं कई बार कम अनुभव वाला हर स्थिति में लेनदेन की प्रवृत्ति वाला पत्रकार ऐसी स्थितियों में कई बार गच्छा खा जाते हैं। कभी जनता से मार पड़ती है तो कभी प्रशासन उन पर दमन का डंडा चलाता है। ऐसे प्रशासनिक दमन से पीड़ितों में ज्यादातर छोटे बैनर से जुड़े पत्रकार होते हैं।

आरटीआई से मजबूती भी आई
पत्रकारिता सूचनाओं का संचार है। सूचना के अधिकार कानून लागू होने के बाद ग्रामीण पत्रकारिता की स्थिति में थोड़ी-बहुत करवट ली है। हालांकि इसे अभी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। लेकिन जिला संवाददाताओं के माध्यम से गांवों की अनेक खबरें राज्य स्तर तक सुखिर्यों में आने लगी है। ऐसे खबरों में विशेषकर मनरेगा, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन, बिजली आदि केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं में अनियमितता एवं घपलेबाजी का उजागर है। हालांकि आरटीआई से सूचना लेकर भी कई बार पत्रकार मामले को सौदेबाजी से निपटाये हैं। लेकिन हर मामले में सौदेबाजी नहीं चल पाती है। जब आरटीआई या कोई अन्य एक ही खबर कइ पत्रकारों के हाथ में लग जाती है तब मामले को दबाना मुश्किल हो जाता है। उसे प्रकाशित या प्रसारित नहीं होने पर संबंधित मीडिया संस्थान उस क्षेत्र के संवाददाता से जवाब-तलब करेगा।

जमाना हाईटेक हो गया। मीडिया भी अनेक तकनीक से लैस हो चुकी है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तेज रफ्तार से राष्ट्रीय स्तर की खबरों तो दिनभर सुखिर्यों में प्रसरित होती रहती है। इसके साथ ही समाचार पोटर्लों पर भी सबसे पहले और बेहतरीन खबरों को प्रसारित करने की होड़ चल पड़ी है। लिहाजा, दिन पर में अमूमन तीन चार खबरे समाचार चैनलों व ऑनलाइन मीडिया में इतनी प्रसारित हो जाती है कि पाठकों के एक बड़े वर्ग के लिए दूसरे दिन यह खबर पूरानी जैसी है। लिहाजा, अनेक समाचारपत्रों ने इस स्थिति को देखते हुए राज्यस्तरीय और स्थानीय खबरों को प्रमुखता देना शुरू कर दिया है। इस दृष्टि से यह उम्मीद लगाई जा सकती है कि आने वाले दिनों में ग्रामीण पत्रकारिता के हालात सुधरने की उम्मीद है। गांवों के नौसिखीये पत्रकारजी भी पेशेवर होंगे।

पत्रकार संजय स्वदेश का विश्लेषण

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *