न्यूज़ चैनलों में सुरक्षित क्यों नहीं है नौकरी?

हाल ही में नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट के 17वें अधिवेशन में शामिल होने का न्यौता मिला…देशभर से आए बुद्धिजीवी पत्रकारों से रूबरू होने का मौका मिला.. मुख्य अतिथि उपराष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी के भाषण से प्रभावित हुआ.. उन्होंने एक ऐसी मीडिया काउंसिल बनाने की बात कही जिसमें इलेक्ट्रानिक मीडिया भी शामिल हो… इसके अलावा एक औऱ महत्वपूर्ण बात कही कि ग़ैर मीडिया घरानों के प्रवेश से मीडिया की कार्यशैली बुरी तरह से प्रभावित हुई है.

खैर, अधिवेशन में पत्रकारों ने पत्रकारों के द्वारा पत्रकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया…लेकिन बिना संगठित हुए ये लड़ाई कैसे लड़ी जाएगी..ये बड़ा सवाल है…क्योंकि मीडिया एक ऐसा दीया है जिसके तले अंधेरा ही अंधेरा है… मारुति के मानेसर प्लांट में मजदूरों के निकाले जाने पर मैनेजमेंट के खिलाफ हंगामा होता है तो चैनलों में खबर बनती है.. एयर इंडिया में पायलट हड़ताल करते हैं या निकाले जाते हैं तो ये खबर चैनलों में खूब चलती है, लेकिन कोई चैनल बंद होता है या फिर चैनल द्वारा एक साथ पचासों पत्रकारों को निकाला जाता है तो ये खबर किसी अखबार में और न ही किसी चैनल में चलती है..इसका मतलब साफ है कि प्रताड़ित और पीड़ित पत्रकारों की आवाज उनके अपने ही बिरादरी के लोग नहीं उठाते.

दूसरी ओर जिन पत्रकारों को सामूहिक रूप से बेरोजगार बना दिया जाता है वो संगठित होकर अपने हक़ की लड़ाई नहीं लड़ते..ऐसे में चैनल मालिकों का हौसला बढ़ता है इसलिए वे जब चाहें जिसे चाहें नौकरी से निकाल दें… क्योंकि पिछले 5 साल के न्यूज चैनलों का इतिहास देखें तो साफ होता है कि एक साथ नौकरी से निकाले जाने वाले पत्रकारों की संख्या सैकड़ों में है….सीएनईबी, महुआ यूपी बंद हुए तो सैकड़ों पत्रकार बेरोजगार हुए…..कुछ को दूसरे चैनलों में नौकरी नसीब हुई तो कुछ का मीडिया से मोहभंग हुआ तो दूसरे फील्ड में चले गए.

उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जी ने अपने भाषण में पत्रकारों की नौकरी की सुरक्षा के बारे में आवश्यक कदम उठाने की बात कही लेकिन वो क़दम कौन उठाएगा, कैसे उठाएगा औऱ कब उठाएगा ..ये अपने आप में गंभीर सवाल है..क्योंकि अब वक्त आ गया है कि पत्रकारों को प्रताड़ित करने वाले मीडिया संगठनों के खिलाफ कोई ठोस कानून बने…. पंजाब, हिमाचल औऱ हरियाणा  से शुरू हुए 19 क्षेत्रीय चैनलों में से 16 बंद हो चुके हैं और बाकी बंद होने के कगार पर हैं… दिल्ली और नोएडा से प्रसारित होने वाले चैनलों का भी कुछ यही हाल है… महुआ या न्यूजलाइन, सीएनईबी इसका उदाहरण है… महुआ के पत्रकारों ने एकजुट होकर प्रबंधन के खिलाफ धरना प्रदर्शन किया तो उन्हें कानून के मुताबिक उनका हक़ मिला.

दरअसल आज की मीडिया में खासतौर पर न्यूज चैनलों के संचालन में ऐसे बिजनेस घराने आ गए हैं जिनका पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं है, वे तो बस मीडिया के माध्यम से अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं… इसलिए उपराष्ट्रपति का ये कथन अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है कि गैर मीडिया घरानों ने मीडिया की कार्यशैली और पत्रकारों की स्थिति को बुरी तरह से प्रभावित किया है…ये कहना भी पूरी तरह से सही नहीं होगा कि मीडिया घरानों में पत्रकारों की स्थिति बहुत अच्छी है…कुछ समय पहले एनडीटीवी ने अपने मुंबई और दिल्ली ब्यूरो से एक साथ कई लोगों की छंटनी की थी….इसके अलावा हाल ही में टीवी टुडे नेटवर्क (आज तक) से एक साथ लगभग 150 लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने की पूरी तैयारी कर ली गई है, जिसमें कि 60 पत्रकारों को 30 जून तक चैनल से विदा लेने को कहा गया है…शेष बचे लोगों को धीरे धीरे हर महीने निकाला जाएगा…टीवी टुडे ग्रुप से निकाले गए लोगों में जूनियर, सीनियर और मिडिल हर लेवल के पत्रकार शामिल हैं.

अब एनडीटीवी और टीवी टुडे ग्रुप का संबंध तो ग़ैर मीडिया घरानों से नहीं है फिर भी नौकरी सुरक्षित नहीं है….इन बड़े चैनलों को इनकी इच्छानुसार लाभ नहीं मिल पा रहा इसलिए कास्ट कटिंग के नाम पर पत्रकारों की नौकरी ली जा रही है…सूत्रों की मानें तो टीवी टुडे ग्रुप का सालाना लाभांश घट रहा है इसलिए लोगों को निकाला जा रहा है.. यहां ध्यान देने की बात है कि आज तक का संचालन करने वाली कंपनी घाटे में नहीं है फायदे में है, लेकिन कंपनी लाभांश घटने की बात कहकर पत्रकारों को बेरोजगार कर रही है…अब अगर बड़ी बड़ी मीडिया कंपनियां अपने कर्मचारियों के साथ ऐसा करेंगी तो फिर क्या होगा पत्रकारों का और पत्रकारिता का…?

नोएडा के पत्रकारों को पश्चिम बंगाल के शारदा मीडिया समूह के पत्रकारों से सीख लेनी चाहिए.. दरअसल पश्चिम बंगाल और असम में शारदा मीडिया समूह के सेवन सिस्टर्स पोस्ट, बंगाल पोस्ट, सकालबेला, आझाद हिंद, तारा न्यूज, तारा मुझिक और तारा बांग्ला इन समाचारपत्रों में काम करने वाले करीब 1200 पत्रकारों पर बेरोजगारी की गाज गिरी है… कोलकाता के प्रेस क्लब में विभिन्न पत्रकार संगठनों के तत्वावधान में शारदा समूह के बंद हुए चैनलों और अखबारों के तमाम पत्रकार एकजुट होकर अपनी लड़ाई लड़ी और उसमें काफी हद तक सफल हुए… इस बैठक में शारदा मीडिया समूह से अपना बकाया वसूलने के लिए राज्यपाल और मु्ख्यमंत्री से आवेदन करने का फैसला हुआ.

दरअसल मुख्य समस्या बकाया की नहीं है बल्कि वैकल्पिक रोजगार की है… मुख्यमंत्री ने तो शारदा समूह के दो चैनलों के कर्मचारियों को एक मुश्त सोलह हजार के अनुदान देने की घोषणा की है… इससे वहां के पत्रकारों को पूरी तरह से न सही पर कुछ तो राहत मिली है, पर क्या ऐसा महुआ, सीएनईबी, एनडीटीवी और आज तक जैसे कई चैनलों से निकाले गए बेरोजगार पत्रकारों के साथ नहीं हो सकता…बिलकुल हो सकता है बस दूसरों के हक के लिए आवाज उठाने वाले पत्रकार बंधुओं को अब अपने उत्पीड़न के खिलाफ अपने हक़ के लिए संगठित होकर आवाज उठानी होगी.

अब वो समय आ गया है जब पत्रकार संगठनों को एक जुट होना होगा…जिन पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है दूसरे चैनलों में कार्यरत उनके साथी पत्रकारों को भी इस आंदोलन में आगे आना होगा क्योंकि उनको इस गफलत में नहीं रहना चाहिए कि उनके चैनल में नौकरी सुरक्षित है.. आज तक चैनल से पत्रकारों के निकाले जाने के बाद ये साफ हो चुका है कि अब किसी भी चैनल के किसी भी बड़े या छोटे पत्रकार पर गाज़ गिर सकती है…इसलिए सभी पत्रकारों को मिल जुल इस विकट समस्या का समाधान निकालना होगा.

एनबीए, एडिटर्स गिल्ड और पत्रकारों के हित में काम करने वाले अन्य संगठनों को आगे आकर सरकार से गुजारिश करनी होगी कि पत्रकारों को भी अन्य पेशेवरों की तरह काम करने की स्वतंत्रता, नौकरी की सुरक्षा और वेज बोर्ड जैसी सुविधाएं मिलनी चाहिए…संगठित पत्रकार बंधु ही मीडिया मालिकों के तेवर और कलेवर को बदल सकते तभी न्यूज चैनलों में नौकरी सुरक्षित हो सकती है…अन्यथा पत्रकारों की पीड़ा दिन प्रतिदिन बढ़ती रहेगी और मीडिया से उनका मोहभंग हो जाएगा…अगर ऐसा हुआ तो वो दिन दूर नहीं होगा जब मीडिया में सिर्फ निहित स्वार्थी तत्वों का एकछत्र राज्य होगा, योग्य पत्रकार और संपादकों का अभाव होगा और पत्रकारिता की पवित्रता सरेआम बाजर में नीलाम होगी…. इसलिए पत्रकारों…उठो जागो और अपना हक़ लेकर रहो.

लेखक अरूणेश कुमार  द्विवेदी ईटीवी न्यूज, साधना न्यूज, सीएनईबी न्यूज, ज़ी न्यूज और आकाशवाणी में काम कर चुके हैं. वर्तमान में वे मंगलायतन विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में प्रवक्ता हैं. इनसे संपर्क arundubey101@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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