न्यूज का पहला ज्ञान और रिपोर्टिंग का ‘र’ मैंने शाह सर से ही सीखा

रवीन्द्र शाह सर…आज हमारे बीच भले ही न हों पर उनकी यादें आज भी हमारे दिल में तरो-ताजा हैं। दरअसल, मैं शाह सर के प्रिय शिष्यों में से एक था। वो जब भी कोई काम या महत्वपूर्ण फैसला लेना होता उसमें मुझे भी शामिल किया करते थे। शाह सर मीडिया में ऐसे व्यक्ति थे जो हमेशा दूसरों की मदद करते थे। मुझे वो पल भी याद हैं जब वो एसवन न्यूज चैनल से आजाद चैनल चले गये, फरि भी हमारे जैसे कई लोगों को उन्होंने अपने स्तर से मदद की। मैं उस दौरान आर्थिक संकट के जूझ रहा था। इस संकट से निपटने का मार्ग उन्होंने दिखाया।

मीडिया में शाह सर जैसे विरले लोग ही होंगे जो उनकी तरह आगे बढ़ कर दूसरों की मदद करते हों। शाह सर जितने तन के खूबसूरत थे उतने ही मन के भी खूबसूरत थे। न्यूज का पहला ज्ञान और रिपोर्टिंग का ‘र’ मैंने शाह सर से ही सीखा। मैं शाह सर के घर अक्सर एडिटोरियल डिस्कशन को लेकर आया जाया करता था। जब भी मैं उनके घर जाता था वो मुझ जैसे जूनियर रिपोर्टर को अपने हाथों से खाना बना कर खिलाते थे। वो खुद खाना बनाने के शोकीन थे। अलग-अलग तरीके के व्यंजन बनाना उनकी हॉबी थी। यह सारी बातें मैं इसलिए बता रहा हूं कि जो व्यक्ति अपने से जुडे़ लोगों को इस हद तक सपोर्ट करता था, वो व्यक्ति कितने बड़े दिल वाला होगा। आज हमारे बीच वो नहीं हैं, पर जिस मंच पर जब भी मैं उनके साथ गया हूं, वहां मैं आज जब दोबारा पहुंचता हूं तो वो सारे पल वैसे ही जीवंत हो जाते हैं और लगता है कि शाह सर यहीं हैं और उनका मार्ग दर्शन वैसा ही मिल रहा है।

‘खूब गये परदेश, कि अपना दीवार-ओ-दर भूल गये

शीश महल ने ऐसा घेरा, मिट्टी का घर भूल गये

उसकी गलियों से जब लौटे अपना भी घर भूल गये’

लेखक जितेन्द्र बहादुर सिंह सम्प्रति सहारा समय में वरिष्ठ रिपोर्टर के बतौर कार्यरत हैं.


रवीन्द्र शाह की द्वितीय पुण्य तिथि पर इंदौर में 27 फरवरी को आयोजन

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