: इंटरव्यू : गोपाल शर्मा : पत्रकार ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े संपादकों की भूमिका भी अब दलालों की सी ही हो गई है या बना ली गई है…. नीरा राडिया, प्रभु चावला व जी वालों के खुलासे के बाद तमाम परिदृश्य और भी स्पष्ट हो गया है…. वास्तविक पत्रकारिता कर समाज सेवा की इच्छा रखने वाले पत्रकारों के जज्बे की भ्रूण हत्या करने के लिए आज संपादक रूपी प्राणी पूंजीपतियों के हाथों हत्यारे का रूप धर चुका है…. बाहर से चकाचैंध भरा मीडिया जगत अन्दर से बेहद खोखला हो चुका है… यहां वेतन को मानदेय कहा जाता है और मानदेय ऐसे दिया जाता है कि उससे ही पत्रकारों का सबसे अधिक अपमान होता है… मीडिया की डिग्री व डिप्लोमा कर सुनहरे भविष्य का सपना संजोए लोग दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं… मीडिया में महाक्रान्ति की आवश्यकता है…. :
गोपाल शर्मा चंडीगढ़ में रहते हुए मीडिया के कई मोर्चों पर सक्रिय हैं. वे प्रिंट एण्ड इलेक्ट्रानिक मीडिया ग्रुप के संपादक हैं. लाईव टुडे व हिमाचल आजकल के सलाहाकार हैं. साथ ही न्यूज़ लाईव नाऊ के निदेशक हैं. एक मुलाकात के दौरान उन्होंने विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय प्रकट की. उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं. जैसे ये कि टीवी चैनल के लिए लाइसेंस फ्री कर देना चाहिए क्योंकि पैसे देकर लाइसेंस लेने के कारण मीडिया में भ्रष्टाचार बढ़ गया है. पेश है उनसे बातचीत के कुछ अंश–
अपने जीवन और करियर के बारे में विस्तार से बताएं?
उत्तराखंड के जिला टिहरी में मेरा जन्म स्थान है। टिहरी डैम के विस्थापितों में शामिल होने के कारण विस्थापन का दंश बालपन से ही झेलते आए। सुंदर लाल बहुगुणा जी के साथ तुतलाती जुबान ने कब से बांध विरोधी नारे लगाने शुरू किए पता ही नहीं चला। उम्र बढ़ती गई ग्रेजुएशन हेमंती नंदन बहुगुणा, गढ़वाल, विश्व विद्यालय से की। आईटीआई का टापर भी रहा। मनमुक्ता पत्रकारिता संस्थान से पत्रकारिता का प्रशिक्षण हासिल किया। कुछ-कुछ महीनों के लिए कई छोटी-मोटी नौकरियां भी की किंतु 23 साल की उम्र तक जीवन किस ओर जा रहा है मैं खुद भी न जान पाया। 1995 में काम के सिल-सिले में मनाली आ गया। बचपन से लिखने का शौक था कई साप्तहिक, मासिक पत्र-पत्रिकाओं के पत्र कालम में छपा चुका था, यहां लेखन को अनुकूलता मिली। कुछ पत्रकारों से मित्रता हो गई और मैं भी जालंधर से प्रकाशित उत्तम हिंदू का अवैतनिक पत्रकार बन गया।
दो साल तक पत्रकारिता की और अंत में अखबार ने ज्यादा खबरें भेजने की सज़ा यह दी कि मेरी फैक्स आथरटी छिन गई। तब दूर संचार विभाग एक पेज फैक्स भेजने के 32 रूपए चार्ज करता था। मैं नियमित 10 से अधिक खबरें भेजता था। 320 रूपए रोज का बिल चुकाने से अखबार ने हाथ खड़े कर दिए और मेरी यह अवैतनिक नौकरी जाती रही। 29 दिसंबर 1997 को दिव्य हिमाचल लांच हुआ। लांचिंग से पूर्व हुई पत्रकारों की फौज में मुझे तत्कालीन मुख्य संपादक श्री बी.आर.जेतली जी ने कुल्लू से बतौर जिला संवाददाता नियुक्त कर दिया। 1000 रूपए का परिश्रमिक तय हुआ। अवैतनिक से अब मैं 1000 रूपए का वैतनिक संवाददाता बन चुका था। खूब मेहनत की बिना शिकवा-शिकायत किए यहां दिव्य हिमाचल को शीर्ष पर पहुंचाया। इस मेहनत से संपादक भी प्रभावित हुए और सर्कुलशन वाले भी विज्ञापनों की भी कुल्लू से गंगा बहने लगी। पहली बार किसी समाचार पत्र में कुल्लू से 4.5 लाख रूपए का सप्ल्लिमेंट प्रकाशित हुआ। और यहीं से कमीशन की लेन-देन पर समाचार पत्र से संबंध बिगड़ गए।
13 जनवरी 2001 को अमर उजाला बतौर जिला संवाददाता ज्वाइन किया और 2005 तक अमर उजाला को अपनी सेवाएं दी। रामपुर के लिए तबादला होते ही मैंने अमर उजाला को भी अलविदा कह दिया। उसके बाद सोचा अपना ही कुछ किया जाए। हैलो हिमाचल की नींव रखी किंतु कई पार्टनर होने के कारण सामंजस्य न बैठ सका। इसके बाद प्रिंट एण्ड इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क का गठन किया और एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ। यह पत्रिका आज भी कुशलता से संचालित हो रही है।
पत्रिका के साथ-साथ न्यूज़ टुडे में बतौर हिमाचल के लिए निदेशक नियुक्त हुआ तथा 5 साल तक इस संस्थान से जुड़ा रहा। 2010 में लाईव टुडे में बतौर मुख्य संपादक कार्यभार संभाला। हाल ही में मुझे हिमाचल के लिए एक नया चैनल स्थापित करने की परियोजना पर कार्य करने का आफर मिला है जो कि अभी विचाराधीन है। पिछले 14 सालों से एक स्वयं सेवी संस्था से भी महासचिव के रूप में जुड़ा हूं. इस संस्था के माध्यम से हम अनाथ बच्चों का लालन-पालन करते हैं। 35 अनाथ बच्चों को हम यथा सामार्थ डीपीएस जैसे अच्छे स्कूलों में तालीम दिलवा रहे हैं । हालांकि जो भी हम करना चाहते हैं उसका अभी एक प्रतिशत भी हम नहीं कर पाए किंतु प्रयास अविरल जारी है। हमारी एक एनजीओ आवारा कुत्तों पर काम कर रही है। इसके तहत हम कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए उनकी नसबंदी करवा रहे हैं ताकि कुत्तों को निर्ममता से मौत के घाट उतारने की प्रवृति पर रोक लगाई जा सके। जख्मी कुत्तों के ईलाज के लिए हम विशेष इंतजाम कर रहे हैं। बिना किसी सरकारी मदद के चलाई जा रही यह दोनों एनजीओ समाज सेवा के क्षेत्र में हमारा छोटा सा प्रयास है।
क्या आप वो सब कर पाए हैं, जो करना चाहते थे। यानि करियर और जीवन का लक्ष्य क्या क्या है?
दरअसल मैं मीडिया के वर्तमान स्वरूप से बिल्कुल संतुष्ट नहीं हूं। प्रमुखतयः विजुअल मीडिया से क्योंकि प्रिंट मीडिया में तो फिर भी शोषण और पेड न्यूज़ दो बड़ी और गंभीर समस्याओं पर खूब माथा पच्चीसी चल रही है किंतु विजुअल मीडिया की समस्या की तो अभी असली जड़ ही ढूंढी जानी बाकी है। अधिकांश विजुअल मीडिया आज अपराधियों के चंगुल में है। दो
नम्बर के कथित कारोबारी इस मीडिया का सरकार की कुछ अपराध संरक्षण नीतियों के कारण खूब फयदा उठा रहे हैं। अपराधियों की मीडिया में दखल के कारण इसमें पत्रकारों के रूप में भी अब अपराधी मानसिकता के लोग घुस आए हैं और पत्रकारिता का ककहरा न जानने के बावजूद नेताओं व अपराधी मालिकों के बीच कड़ी का काम कर यह मीडिया व राजनीति दोनों में प्रदूषण फैला रहे हैं।
हम इस गंदगी को जड़ से मिटाने के लिए एक नया प्रयोग कर रहे हैं। हम मीडिया में एक संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं। इसमें हमारी प्रमुख मांग है कि प्रिंट मीडिया के पंजीकरण की भांति मीडिया पोर्टल व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पंजीकरण निःशुल्क किया जाए क्योंकि विजुअल मीडिया का लाइसेंस आज रिश्वत के बिना मिलना नामुमकिन है जो कि 30 से 35 लाख में मिलता है और मिलते ही उसकी कीमत 3 करोड़ हो जाती है। यदि लाइसेंस की यह प्रणाली प्रिंट मीडिया की भांति निःशुल्क हो जाती है तो पत्रकारिता की मर्यादा को समझने वाले लोगों को मीडिया समूह खड़ा करने के लिए लालाओं का मुंह नहीं देखना पड़ेगा। यानि कोई भी पत्रकार मामूली सी पूंजी से एक विश्व स्तर का चैनल खड़ा कर सकता है। इससे गुणवत्ता भी आएगी और लोगों की समस्याओं को मंच भी सहजता से मिल सकेगा। आपको हैरानी होगी कि आज हमारे पास ऐसी तकनीकी मौजूद है कि यदि सरकार चाहे तो हम नाममात्र की पूंजी से यह सब सहजता से कर सकते हैं और मीडिया का पूरा का पूरा परिदृश्य बदल सकता है। पत्रकारों का शोषण पूरी तरह समाप्त हो सकता है। खबरों की खरीदफरोख्त एवं मीडिया में कुछ लोगों का एकाधिकारवाद समाप्त हो सकता है।
मीडिया को भ्रष्टाचार की गर्त से निकालने के लिए जरूरी है कि मीडिया की शक्तियों का विकेंद्रीकरण किया जाए। एक ऐसा मीडिया प्रसव पीड़ा झेल रहा है जिसके जन्म की सुगम पृष्ट भूमि यदि हम तैयार कर पाए तो वह निश्चित तौर पर सूचना तकनीकि की कोख से जन्मा अवतार होगा। किंतु सरकार कंस की भांति कृष्ण की भांति अपनी मृत्यु के भय से इसे मिटाने पर आमादा न रहे बल्कि इसकी किल्कारियों को सहज गूंजने दे। यदि हम इस लड़ाई को जीत पाए तो मीडिया जगत को दिया गया यह योगदान सदियों तक याद रखा जाने लायक होगा।
अगर कहा जाए कि आप अपनी पांच अच्छाइयां और पांच बुराइयां बताइएए तो क्या क्या गिनाएंगे?
मैं कपटी लोगों से नफरत करता हूं। क्रांति के मार्ग में बाधक शांति के पुजारियों को देशद्रोही मानता हूं। नेताओं की चम्चागिरी करने वालों को सबसे निकृष्ट प्राणी मानता हूं। झूठ से नफरत, छल से नफरत, कपट से नफरत करता हू। खूबी तो कोई भी नज़र नहीं आती।
पत्रकारिता के स्तर में घनघोर पतन हुआ है, क्या यह सच है? अगर हां तो किस तरह से और इसका असर क्या होगा? इसे ठीक कैसे किया जा सकता है?
पत्रकारिता के घनघोर पतन का कारण है इसमें गलत लोगों का प्रवेश जिन्होंने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। अपराधी बड़े-बडे अपराध कर बचने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करते हैं । मीडिया के कारण वे अधिकारियों व नेताओं तक सहज़ पहुंच बनाते हैं व अपने अपराधों पर पर्दा डालने का खाका तैयार करते हैं। इसमें पत्रकारों की भूमिका भी है अब अब पूरी तरह दलालों की सी हो गई है।
यह कहना ज्यादा न्यायोचित होगा कि पत्रकार ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े संपादकों की भूमिका भी अब दलालों की सी ही हो गई है या बना ली गई है। नीरा राडिया, प्रभु चावला व जी वालों के खुलासे के बाद तमाम परिदृश्य और भी स्पष्ट हो गया है। वास्तविक पत्रकारिता कर समाज सेवा की इच्छा रखने वाले पत्रकारों के जज्बे की भ्रूण हत्या करने के लिए आज संपादक रूपी प्राणी पूंजीपतियों के हाथों हत्यारे का रूप धर चुका है। बाहर से चकाचैंध भरा मीडिया जगत अन्दर से बेहद खोखला हो चुका है। यहां वेतन को मानदेय कहा जाता है और मानदेय ऐसे दिया जाता है कि उससे ही पत्रकारों का सबसे अधिक अपमान होता है। मीडिया की डिग्री व डिप्लोमा कर सुनहरे भविष्य का सपना संजोए लोग दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। मीडिया में महाक्रान्ति की आवश्यकता है। मीडिया की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है।
आपको अपने करियर और जीवन में क्या कुछ सीखने को मिला जिसे आप हम सभी से बांटना चाहते हैं।
मीडिया यदि ठीक प्रकार से अपनी भूमिका निभाए तो देश उन्नति न करे, ऐसा हो ही नहीं सकता किंतु मीडिया का वर्तमान स्वरूप किसी भी दृष्टि से देश के हित में नहीं है। जितना बड़ा मीडिया समूह है वह उतनी ही बड़ी सौदेबाजी में संलिप्त हैं। बड़े-बड़े समाचारों या बड़े खुलासों में हर छण बदलते मीडिया के सुरों से मीडिया में व्यप्त भ्रष्टाचार को वांचा जा सकता है।
ऐसी कोई बात जो कहना चाहते हों मीडिया इंडस्ट्री के लोगों से पर अब तक कह न पाए हों?
यही कि हर मीडियाकर्मी मीडिया को गर्त में जाने से बचाने के लिए अपनी भूमिका निभाए। झूठ को बेनकाब करने के जज्बे का बेखौफ पालन करे। न डरे, न झिझके, न झुके, बस मीडिया को लोकतंत्र का सर्वोच्च स्तंभ बनाए रखने के लिए संकल्पित रहे।
गोपाल शर्मा से संपर्क 08054310441 के जरिए किया जा सकता है.
आपमें से भी कोई अगर यह मानता है कि उसे अपनी बात, अपना करियर, अपनी सोच, अपना इंटरव्यू भड़ास पर प्रकाशित कराना चाहिए तो आपका स्वागत है. भड़ास ने स्थापित व नामचीन लोगों का इंटरव्यू प्रकाशित करने की जगह देश के कोने-कोने में सक्रिय मीडियाकर्मियों की बातों, अनुभवों, करियर, सोच को प्रकाशित करने को तरजीह दिया है. आपको करना बस इतना है कि आप नीचे दिए गए सवालों के जवाब भेज दें. अगर लगता है कोई बात इन सवालों से कवर नहीं हो पा रहा तो सवाल अपनी तरफ से क्रिएट कर सकते हैं. साथ में एक तस्वीर भी भेजें. जवाब और तस्वीर मेरी निजी मेल आईडी पर भेजें जो यूं है: [email protected]
सवाल यूं हैं-
-अपने जीवन और करियर के बारे में विस्तार से बताएं.
-क्या आप वो सब कर पाए हैं, जो करना चाहते थे… यानि करियर और जीवन का लक्ष्य क्या क्या है?
-अगर कहा जाए कि आप अपनी पांच अच्छाइयां और पांच बुराइयां बताइए, तो क्या क्या गिनाएंगे.
– मीडिया में काम के दौरान कोई ऐसा अनुभव जिससे आप काफी दुखी हुए हों और कोई ऐसा अनुभव जिससे आपको काफी तसल्ली-खुशी मिली हो?
-पत्रकारिता के स्तर में घनघोर पतन हुआ है, क्या यह सच है, अगर हां तो किस तरह से और इसका असर क्या होगा, इसे ठीक कैसे किया जा सकता है…
-आपको अपने करियर और जीवन में क्या कुछ सीखने को मिला जिसे आप हम सभी से बांटना चाहते हैं…
– आपकी अपनी लाइफस्टाइल कैसी है? खान-पान, सुनने-पढ़ने में क्या पसंद है? शौक क्या है?
-आप जीवन में किससे सबसे ज्यादा प्रभावित रहे और क्यों? आपके रोल माडल कौन हैं?
-आपने जीवन या करियर में कुछ ऐसा किया है जिसका आपको प्रायश्चित करने का दिल करता है?
-ऐसी कोई बात जो कहना चाहते हों, मीडिया इंडस्ट्री के लोगों से, पर अब तक कह न पाए हों..





