न्‍यूजरूम और टीआरपी में फंसी महिला पत्रकार की कहानी

टीवी पत्रकार उर्वशी गुलिया अपनी पहली किताब "माई वे इज द हाईवे" में पत्रकारिता के स्याह पहलू को दिखा रही हैं. किताब में मुख्य किरदार टीआरपी की दौड़ से परेशान हो कर अपनी नौकरी छोड़ देती है और हिमालय की तरफ घूमने निकलती है. अपने इस सफर में वह भारत को समझने लगती है. गुलिया ने अपनी सहेली और दिल्ली की टीवी पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की मौत से प्रेरित होकर यह किताब लिखी है. 2008 में सौम्या का राजधानी दिल्ली में कत्ल हुआ था. गुलिया के साथ साक्षात्कार के कुछ अंश.

– आप खुद एक पत्रकार रह चुकी हैं. इस किताब को लिखने का ख्याल आपको कैसे आया?

— 2004 में दफ्तर में कुछ मुश्किल रातें बिताने के बाद मैं ठीक से सो नहीं पाई. मैंने किताब शुरू की, उसका अंत भी लिखा दिया और अपने दोस्तों को भी बताया कि मैं एक किताब लिख रही हूं. मैंने वह सब दफ्तर के नोटपैड पर लिखा था. बाद में मैं उसे भूल गई. फिर 2007 में जब मैं घर बदल रही थी तब इस नोटपैड पर ध्यान गया. तब मैंने काम से छुट्टी ली और एक तरह से अपना करियर ही बदल लिया.

सच कहूं तो मैं इसे और लंबा खींच सकती थी. लेकिन मैंने अपनी एक बहुत करीबी सहेली को खो दिया, जिसके साथ मैं किताब लिखने के बारे में बात किया करती थी. हम फिल्म बनाने की बातें करते थे और भविष्य में ऐसी ही कई और चीजें करने के बारे में भी. (उसकी मौत के बाद) मुझे समझ आया कि हमारे पास जीवन में यह सब करने के लिए उतना वक्त नहीं है. उसके देहांत के दो हफ्ते बाद मैं पुणे में थी, मैंने नोटपैड खोला पर कुछ लिख नहीं पाई. फिर एक महीने बाद मैंने फिर से उसे उठाया और दो दिन तक बिना रुके लिखती रही.

– क्या आपने शुरू से प्लॉट और किरदारों के बारे में सोच रखा था?

— मैंने पहले ड्राफ्ट के बाद बस यही बदला कि मैंने किरदारों को थोड़ा सा उदास बना दिया है. पहले ड्राफ्ट में सब कुछ बहुत प्यारा सा था. शुरुआत में मैं भाषा को लेकर भी काफी सावधान थी, लेकिन फिर मैंने सोचा कि वही शब्द क्यों न इस्तेमाल किए जाएं जो असल जिंदगी में टीवी के न्यूजरूम में किए जाते हैं. मेरे संपादक के शब्द असली होने जरूरी थे, प्यारे नहीं.

किताब में पत्रकारिता को लेकर जो भी वाकये हैं, वे सब सच्चे हैं, कुछ मेरी जिंदगी से प्रेरित हैं तो कुछ दोस्तों की. मीडिया जगत की तरफ युवा बहुत आकर्षित होते हैं, हर जवान लड़की और लड़का टीवी पत्रकार बनना चाहता है, इसलिए मुझे लगा कि मुझे उन्हें इस पहलू की एक झलक भी दिखानी चाहिए.

– एक अकेली औरत के लिए भारत में जीवन कितना मुश्किल या आसान है?

— शहरों में जीना आसान नहीं है. यह आपके व्यक्तित्व से जुड़ा मुद्दा है. दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर या कोलकाता जैसे शहरों में आप जितनी चाहें बोल्ड जिंदगी जी सकते हैं. उसके अलावा तो सब आप पर निर्भर करता है. आप अपने लिए फैसला लेते हैं कि मुझे क्या करना है, खुद को सुरक्षित रखने के लिए मुझे किस तरह की सावधानियां बरतनी हैं. इन सभी शहरों में आप अपने लिए ऐसी जगह बना लेते हैं जहां आप सुरक्षित महसूस करते हैं. आपको दोस्तों की जरूरत होती है.

मुझे लगता है कि भारत में सिंगल औरतों के खिलाफ एक षड़यंत्र सा चल रहा है. बिलकुल अनजाने लोग हों, पड़ोसी, दोस्त या आपकी जान पहचान के लोग, करीबी या दूर के रिश्तेदार, हर कोई आपसे सवाल करने लगता है कि आप सिंगल क्यों हैं. और अगर आपकी किसी से दोस्ती है तो वह आपके घर क्यों आता है? इस तस्वीर में तुम्हारे साथ यह लड़का कौन है? लड़कों के साथ भी हालात ऐसे ही हैं. कोई कुंवारे लड़कों को घर किराए पर नहीं देना चाहता. साभार : डायच वेले

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