न्‍यूज चैनलों में स्‍टूडियो डिस्‍कशन भड़ैती से ज्‍यादा नहीं

टीवी चैनलों में समसामयिक मुद्दों पर होने वाले स्टूडियो डिस्कशन जनोपादेयता की कसौटी पर निरर्थक साबित हो रहे हैं। कॉमेडी के नाम पर घटिया टिप्पणी व स्तरहीन भावभंगिमा देखने के बाद कम से कम दर्शकों को किरदारों के भोंडेपन से ओछा ही सही कुछ मनोरंजन तो होता ही है लेकिन स्टूडियो डिस्कशन से शायद यह भी हासिल नहीं हो पाता। दरअसल स्टूडियो डिस्कशन की अवधारणा मीडिया की उस मूल भूमिका से आती है जिसके तहत जनता को मुद्दों के बारे में सूचित करना, शिक्षित करना मीडिया का मुख्य कर्तव्य होता है। लेकिन तथ्यों की बेहद कम जानकारी, तर्कशास्त्र की अल्प समझ और यह भाव कि “दूसरे पक्ष को बोलने नहीं दिया”, मीडिया के इस पूरे प्रयास को बेमानी कर देता है।

नतीज़ा यह होता है कि गठबंधन की मर्यादा या विदेशी कंपनियों का भारतीय रिटेल में आने सरीखे गंभीर मुद्दों में भी चर्चा बहकती हुयी इस बात पर पहुंच जाती है कि भारतीय जनता पार्टी का कौन नेता जेल में है या यूपीए सरकार कितनी भ्रष्ट है। चर्चा चाहे किसी भी मुद्दे पर हो अगर राजनीतिक दलों के लोग बैठे हों तो वह चर्चा गांव के अशिक्षित दो परिवारों के बीच नाली के झगड़े से बेहतर नहीं दिखायी देती। प्रजातंत्र की संतोषप्रद व्यवस्था के लिए पांच तत्व हैं। पहला- राजनीतिज्ञों का उच्च स्तर, दूसरा- प्रतिस्पर्धी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के बीच कार्यक्रमों को लेकर एक प्रतियोगी भाव लेकिन साथ ही राष्ट्र की व्यापक दिशा को लेकर आम सहमति, तीसरा- सिविल सेवाओं की एक परंपरा जिसमें अधिकारी अपने मंत्रियों को नीति बनाने व अनुपालन करने में मदद करें, चौथा- विरोधी मतों के प्रति आदर की संस्कृति और पांचवा- आलोचना के लिए आलोचना करने की आदत का पूर्ण परित्याग।

खबरिया चैनलों के स्टूडियो डिस्कशन में इन पांचों का सर्वथा अभाव मिलता है। अव्वल तो राजनीतिक वर्ग में ही उच्च स्तरीय लोगों का नितांत अभाव होता जा रहा है और जो कुछ लोग बच गए हैं वह अपनी गरिमा बचाने के लिए टीवी के डिस्कशन में आना पसंद नहीं करते। लिहाज़ा सभी पार्टियों ने द्वितीय या तृतीय स्तर के ऐसे नेताओं को भेजना शुरू किया जिनका मष्तिष्क भले ही खाली हो लेकिन गले की ताकत पूरी हो। इन्हें न तो अर्थशास्त्र का ज्ञान होता है, न संविधान का, न ही ये जनअपेक्षाओं से बाबस्ता रहते हैं। इनका एक ही ध्येय होता है कि चिल्ला कर दूसरी पार्टी को चुप करा दो और जैसे ही इनके नेता के खिलाफ कोई बोले तो इतना हंगामा कर दो कि वह नेता खुश हो जाए। शायद राजनीतिक दल यह भूल रहे हैं कि टेलीविज़न एक सशक्त माध्यम है जिसमें जनता भड़ैती भी देखती है और गंभीर परिचर्चा के प्रति भी उसकी ललक रहती है। लेकिन भड़ैती का प्रभाव चाय की चुस्कियों के बाद खत्म हो जाता है, गंभीर चर्चा उस पर आजीवन प्रभाव डालती है।

ब्रिटिश संसद की एक परंपरा है कि अगर कोई एक नेता, चाहे वह कितना ही बड़ा हो या कितना ही छोटा हो, कुछ बोल रहा हो तब बीच में कोई दूसरा सदस्य नहीं बोलता। लेकिन अगर कोई सदस्य बीच में बोलने के लिए खड़ा होता है तब पहले से बोल रहा वक्ता तत्काल ही बैठ जाता है। इंद्रजीत गुप्ता तक यह परंपरा कायम रही लेकिन बाद के दिनों में “लंग पावर” का इस्तेमाल सदन में विपक्षी को चुप करने और अपने नेता के सामने श्रेय पाने का साधन बन गया। इसी आदत का पालन खबरिया चैनलों के स्टूडियो डिस्कशन में भी देखने को मिलता है। 2500 साल पहले भारत के वैशाली राज्य में और यूनान के एथेंस शहर की जनसभाओं में भी विपक्षी विचार को पूरी मान्यता देने की परंपरा रही है ताकि विचार-विमर्श के जरिए एक निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके। लेकिन वर्तमान में यह भाव बिल्कुल ही खत्म होता जा रहा है।

हाल ही में एक राष्ट्रीय हिंदी चैनल पर गठबंधन की राजनीति और उसकी नैतिकता को लेकर एक परिचर्चा हुयी। पूरी चर्चा में एक बार भी किसी राजनीतिक या गैर-राजनीतिक प्रतिभागी ने यह नहीं बताया कि एक अच्छे गठबंधन की क्या शर्तें व मर्यादाएं होती हैं? चर्चा की गुणवत्ता इतनी नीचे रही कि तीन राजनीतिक दल के प्रतिभागी लगातार यही चर्चा कर रहे थे कि दूसरी पार्टी के कौन-कौन से लोग भ्रष्टाचार के मामले में जेल में हैं। अपेक्षा यह थी कि दुनिया के अन्य प्रजातंत्रों में गठबंधन सरकार हैं तो क्यों हैं? विकास और गठबंधन का उन देशों में क्या रिश्ता है या गठबंधन पर अगर जनोपादेय न होने का संकट है तो कहीं ऐसा तो नहीं कि वर्तमान चुनाव पद्दति “फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम” दोषी है? लेकिन 42 मिनट के विमर्श में 25 मिनट से ज्यादा कांग्रेसी और भाजपा के प्रतिभागी एक-दूसरे पक्ष के कितने नेता भ्रष्टाचार को लेकर जेल में हैं, इस बात की चर्चा करते रहे।

मेरा पूरा विश्वास है कि प्राइम टाइम में हुयी परिचर्चा के बाद दर्शक गठबंधन का “ग” भी नहीं समझ पाया। चूंकि समाज में तर्कशक्ति आमतौर पर काफी कम है इसलिए चिल्लाने वाले प्रतिभागियों को उसके कार्यकर्ताओं से डिस्कशन के बाद संदेश आते हैं “वाह आपने बिल्कुल चुप करा दिया विपक्षियों को और छा गए”, और तब यह प्रतिभागी विजयी भाव से अगले किसी चैनल में चला जाता है। उसे यह समझ नहीं आता कि उसके इस पूरे कृत्य को जनता ने दो जोकरों के बीच लड़ाई से ज्यादा कुछ नहीं समझा। नतीज़ा यह होता है कि प्रजातंत्र की गुणवत्ता एक बार फिर नीचे आ जाती है।

आज जरूरत इस बात की है कि न्यूज़ चैनल इस तरह के गंभीर मसले पर होने वाली चर्चाओं का एक कोड तैयार करें जिसमें एंकर या मॉडरेटर की इजाज़त के बिना प्रतिभागी न बोलें और कोई भी जवाब मूल प्रश्न से बहक रहा हो तब उस वक्ता को ताकीद की जाए। “लंग पावर” का इस्तेमाल करने वाले प्रतिभागियों का इस तरह गंभीर परिचर्चाओं में आना पूरी स्टूडियो डिस्कशन की सार्थकता को खत्म कर रहा है। प्राइम टाइम का उद्देश्य गंभीर मुद्दों को जनधरातल पर लाना, मुद्दों के पक्ष-विपक्ष से अवगत कराना व जनता को अपनी बुद्धिमत्तापूर्ण राय बनाने (इनफॉर्म्ड ओपिनियन) में मदद करना होता है। लेकिन वर्तमान में यह प्रयास भड़ैती से ज्यादा कुछ नहीं रह गया है। राजनीतिक दलों से भी अपेक्षा रहती है कि वह मुद्दों पर अपना पक्ष प्रस्तुत करें न कि “बोलती बंद” करने का भाव रखें। किसी ने एक शेर कहा है-

खामोश! ऐ दिल, भरी महफिल में चिल्लाना नहीं अच्छा,
अदब पहला करीना है मोहब्बत के करीनों में।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख आज के दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

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