न्‍यूज चैनल, अज्ञानता और आस्‍था का कारोबार

 

दो साल पहले मेरे ऑफिस के एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी ने कहा कि एक दिन की छुट्टी चाहिए। मैंने कारण पूछा तो उसने बताया कि बेटी की तबियत खराब है और उसे दिखाने ले जाना है। मैंने उत्सुकतावश जानना चाहा- किस डॉक्टर से दिखा रहे हो तब उसने बताया कि डॉक्टर से नहीं एक ओझा से दिखा रहे हैं। मैंने चौंक कर पूछा- ओझा से क्यों? उसका विश्वास से भरा जबाब था, “सर ये डॉक्टर का मामला नहीं है हमारे पड़ोसी ही ने‘कुछ’करवा दिया है”। लगभग ठीक इसी समय में हमारे एक अधिकारी मित्र ने मुझसे न्यूज़ चैनलों पर चलने वाले एक बाबा का पता पूछा क्योंकि वह अपने लड़के की एक गंभीर बीमारी के बारे में उस बाबा से सलाह लेना चाहते थे और उनका मानना था कि आधुनिक चिकित्सा की अपनी सीमाएं हैं जबकि “पहुंचे हुए”बाबाओं का ज्ञान सीमा से परे होता है।
   
कर्मचारी अज्ञानी था और उसके अंदर वैज्ञानिक सोच पैदा करने की ज़रूरत थी लेकिन इस अधिकारी का बाबाओं की शरण में जाना बेचारगी का परिणाम था। निर्मल बाबा या इस तरह का एक पूरा बाबा सम्प्रदाय इसी सोच की उपज है। यह सोच है तो बाबा है, बाबा है तो यह सोच है। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। इसको विस्तार देने का काम भारतीय इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ मीडिया ने किया है। जब एक टीवी चैनल पर बाबा आकर कहता है कि बृहस्पतिवार को काले कुत्ते को लाल रुमाल में पीला चना रख कर खिलाओ तो घर धन–दौलत से भर जाएगा, तब इस बाबा ने विज्ञान और तकनीकि का अवैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए इस्तेमाल किया। भारतीय मीडिया इसे देखती रही और इस कुकृत्य की सहभागी होकर इसका लाभ भी लेती रही। 
 
कर्मचारी अपनी बेटी को दिखाए तो ज्यादा से ज्यादा दो से चार आदमी जानेंगे लेकिन जब टीवी चैनल पर यही बाबानुमा ओझा अपने को तकनीकि और ग्राफिक्स के जरिए एक आभामंडल बनाकर काले कुत्ते को पीला चना खिलवाता है तब बीसों करोड़ लोग देखते हैं। इनमें से कुछ करोड़ लोग जो कि बढ़ती शिक्षा की वजह से वैज्ञानिक सोच की तरफ बढ़ रहे होते हैं उनके भी कदम रूक जाते है और वह भी काले कुत्ते को पीला चना खिलाना शुरु कर देते हैं, भारतीय समाज फिर एक बार जड़ता की तरफ बढ़ता जाता है। दुनिया के हज़ारों वैज्ञानिक कई दशक खपाने के बाद जब विज्ञान और तकनीक का विकास करते है तब अपेक्षा यह होती है कि उस विज्ञान और तकनीकि का इस्तेमाल जनकल्याण के लिए किया जाए वह भी जर्मी बेन्थम के सिद्धान्त “सबसे ज्यादा लोगों के लिए सबसे ज्यादा सुख”के तहत। यहां यह भी अपेक्षा होती है कि विज्ञान और तकनीकि का इस्तेमाल भूल से भी समाज को अतार्किक व आदिम सोच वाले रास्ते पर ढ़केलने के लिए न हो।
   
भारतीय संविधान में 1976 में 42वें संशोधन के तहत नागरिकों के मौलिक कर्तव्य का एक अध्याय जोड़ा गया जिसके तहत अनुच्छेद 51(ए) (एच) में हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक सोच और अन्वेषण एवं सुधार के उत्साह का विकास करे। अगर दुनिया में मृत्युदर कम हुयी है, प्लेग, चेचक, हैजा जैसी महामारियों से निज़ात मिली है या गुलाम प्रथा, सत्ती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों से मुक्ति मिली है या रंगभेद खत्म हुआ है तब उसके पीछे यही वैज्ञानिक-तार्किक सोच रही है। लेकिन आज तकनीकि का इस्तेमाल जाने-अनजाने में अज्ञानता फैलाने में हो रहा है जिसका सीधा मतलब है कि समाज को आदिम सोच की तरफ ढ़केला जा रहा है।
   
अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के कई स्तर होते हैं। न्यूज़ चैनलों पर बाबा का काले कुत्ते को पीले कपड़े में चना खिलाना भी एक अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता है, राखी सांवत का डांस दिखाना भी अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता में ही आता है। एक प्रोफेसर का चैनल के माध्यम से आई.आई.टी के छात्रों को पढ़ाना भी अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता है, टू-जी स्पेक्ट्रम में हुए घोटाले का पर्दाफाश करना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है या किसानों की अभावजनित बढ़ती आत्महत्याएं भी अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता है। लेकिन इन सभी किस्म की अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता में गुणात्मक अंतर है। हम बाबा-तांत्रिक का भूत को कब्ज़े में करना या राखी सांवत की डांस-रुपी सांस्कृतिक स्वतंत्रता को उसी तराजू पर नहीं रख सकते जिस पर बच्चों को पढ़ाया जाना या सत्ता-नीत स्पेक्ट्रम घोटाले को रखते हैं या किसानों की आत्महत्या से खबरों के उपजे जनाक्रोश को रखते हैं या भ्रष्टाचार के खिलाफ उपजी जनचेतना को रखते हैं।  
   
न्यूज़ चैनलों की प्रतिबद्धता जनहित में काम करने की होती है और जनहित का मतलब वह नहीं होता है जो कि जनता चाहती है बल्कि वह होता है जिसमें जनता का हित हो। तात्पर्य यह है कि जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमानस को जगाना या समाज में वैज्ञानिक सोच विकसित करना या अच्छे प्रतिमान बनाना मीडिया के उच्च स्तरीय कार्यों में आता है वहीं रबी की बुआई के समय यूरिया खाद की किल्लत, लगातार बढ़ते हुए डी.ए.पी खाद की कीमत के खिलाफ सरकार को आगाह करना, जन-उपादेयता में काम करने का एक और नमूना है। अगर मीडिया सांस्कृतिक कार्यक्रम दिखा रही है तो उसकी उपादेयता अपेक्षाकृत कम मानी जाती है और अगर सांस्कृतिक कार्यक्रम और मनोरंजन के नाम पर राखी सावंत का डांस या फूहड़ या कामुक मजाक दिखाया जा रहा है तब मीडिया अपने कार्य से विमुख हो रही है। कहना न होगा कि बाबाओं के प्रोग्राम समाज में अतार्किक सोच पैदा करते हैं लिहाजा यह कहीं से भी मीडिया के कर्तव्यों में नहीं आता बल्कि मीडिया को समाज की नाराजगी का शिकार होना पड़ता है। 
 
चूंकि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अभी विश्व के अन्य मीडिया उद्योगों से नई है इसलिए इस तरह की गलतियां हो रही हैं। 16 साल पुरानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को उन गलतियों का एहसास हुआ है और एडिटरर्स की सर्वोच्च संस्था ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन लगातार इस तरह की गलतियों को सुधारने में संलग्न है। प्रथम चरण में प्राइम टाइम में इन बाबाओं को हटाया गया और अब यह कोशिश हो रही है कि इसे अंतिम रूप से अलविदा कह दिया जाये। संभव है इसमें आर्थिक दिक्कतें आएं लेकिन अगर सही तरीके से सही परिप्रेक्ष्य में व्यापक जनसमस्याओं को उजागर किया जाये तब कोई कारण नहीं कि इस तरह की खबरों की 

लोकप्रियता बाबाओं की खबरों की टी.आर.पी को मात न दें। चूंकि जरूरत सामूहिक संकल्प की है इसलिए अगर बाबाओं को टेलीविजन से हटा दिया जाए तब न कोई दिखायेगा न टी.आर.पी की होड़ रहेगी और तब हम मूल्य कर्तव्य और उपादेयता को अंजाम दे सकेंगे।
 
लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख आज के नेशनल दुनिया में भी प्रकाशित हो चुका है.

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