पंडित रविशंकर : राग-अनुराग के गरुड़ का जाना

पण्डित रविशंकर का जाना उनके स्वर के सभी ज्योतिर्लिंगों में रह जाना है। स्वरसाधना से उन्होंने मृत्युहीन जीवन का आनन्द अपने जीवन में ही ले लिया था। अपनी हर प्रस्तुति में वे हर राग के साथ जीते, जाते और फिर से जन्म लेते। वे राग हो जाते। रागों को हम हर बार एक नयी देह पाते देखते। स्वरों से उनका अनुराग ही राग हो जाता जिसे हम कभी श्री कहते तो कभी परमेश्री। इसे हम उनका नया राग कहते, परमेश्वरी।

सितार पर राग का अवतरण उनका नये रूपों में अवतरण होता था। इसे श्रोता उस राग के स्वरों के साथ देखते हुए अब बूढ़े हो गये हैं। उनके देहान्त से शोक के विवरण भी करुण रागों में ही अवतार ले रहे हैं। जिनका जीवन स्वरतपस्या से आनन्द में रूपान्तरित हो गया था उनकी भौतिक अनुपस्थिति में अतीतवाची वाक्य भी वे भाव नहीं ले पा रहे जो बारह स्वरों से बने उनके नादवांग्मय के ज्योतिर्लिंग बन चुके हैं, कहीं तीव्र मध्यम तो कहीं कोमल निषाद।

इसलिए हम वर्तमान स्वर में आज उन पर चर्चा करेंगे। अतीत उनके साथ कभी चलता भी नहीं था। ऐसा शायद सभी उन रचनाकारों के साथ होता है जो जीवन में रहते हुए ही देहातीत हो जाते हैं जैसे भारतेन्दु, प्रसाद और प्रेमचन्द। वे परिमित काया में रहते हुए ही अपरिमित आनन्दकाया में ढ़ल जाते हैं। गरुड़ की उड़ान भारतीय मिथ की एक अप्रतिम छवि है। पण्डित रविशंकर इस अप्रतिम छवि के सांगीतिक नाद हैं।

सात शुद्ध स्वरों के साथ यदि चार कोमल और एक तीव्र स्वर ने हो तो भारतीय राग संगीत का सारनाथ नहीं बन सकता। बारह स्वर आवश्यक हैं। मिथकथा में तो अमृतकुम्भ लेकर उड़े गरुड़ की उड़ान से भारतीय धरती पर तीन जगह ही अमृत छलका था किन्तु राग-अनुराग के कुम्भ को लेकर सितार पर संगीत के इस गरुड़ की उड़ान से बारह स्वर बारह प्रकार की ज्योतियों से दीप्त हुआ है। यह आप अभी उनके बजाये किसी भी राग को सुनकर अनुभव कर सकते हैं। उन्हें लीजेन्ड हम इसीलिए कहते हैं क्योंकि वे बारह ज्योतिःस्वरों की मिथकथा स्वयं ही रच लेते हैं। उनका अनुभवअमृत बारह स्वरों पर छलकता है, बारह ज्योतिर्लिगांे में रूपान्तरित होता, हुआ जिनमें एक है काशी।

यह मिथकथा शुरु हुई थी काशी से। आलाप उनके जन्म और उनके किशोर जीवन में हुआ जिसका सुर लगा मैहर में। उस्ताद वजीर खाँ के एक शिष्य हाफिज अली खाँ ग्वालियर के दरबारी गायक हो गये तो दूसर शिष्य मैहर के मन्दिर में आ गये जिन्हें हम उस्ताद अलाउद्दीन खाँ कहते हैं। उनके बेटे थे अली अकबर खाँ और बेटी हैं अन्नपूर्णा देवी। रविशंकर मैहर गये तो संगीत का यह संगम खाँ साहब को मिल गया। दिख उन्हें पहले ही गया था। उदयशंकर के नृत्यदल में अलाउद्दीन खाँ संगीतनिर्देशक थे तो एक बार इस दल की किसी यात्रा के दौरान उन्होंने किशोर रविशंकर को देखा तो मैहर आने के लिए कह दिया। और बस रवि को अपना गुरु मिल गया। बाद में अन्नपूर्णा देवी से उनका विवाह भी हुआ।

कथा लम्बी है। कथा दर्ज है उनकी किताब ‘राग अनुराग’ में। मैहर का प्रसाद पूरी दुनिया में फैला और यह देवदीप्त ओज मनुष्य मन का आनन्दवैभव बनता चला गया। पण्डित किशन महाराज से लेकर स्वप्न चौधरी, जाकिर हुसैन और शफात अली तक उन्हें संगत देते और नक्षत्र बनते गये। और फिर अपने बनारस लौटकर पण्डित जी ने अपना नया जीवन शुरु किया। शिवपुर क्षेत्र में घर और रिम्पा नामक संगीत संस्था का सांगीतिक सिलसिला। यहीं उनसे मिलने का सिलसिला भी मेरा शुरु हुआ। मैं क्या, उन दिनांे कोई भी कभी भी उनसे मिल सकता था, सीख सकता था और आनन्दित हो सकता था। मेरा रिम्पा अनुभव 1978 से 1982 तक का रहा और फिर तब जब 1986 में हम उनके घर उनके यहाँ के आखिरी जलसे में गये जहाँ उन्होंने देर रात राग श्री बजाया।

अमेरिका में बसने के बाद उन्हें साल में एक बार भारत आना पड़ता। दिल्ली के अपने घर में वे रिम्पा का जलस कराते। यहीं पण्डित किशन महाराज के साथ 2006 मंे उनके घर जाना हुआ जब उन्हें पता चला कि मैं अब इतना बड़ा हो गया हूँ कि महाराज की आत्मकथा लिख रहा जिसके लिए पण्डित जी के अनुभव की भी जरूरत है। वे बोलने लगे, नहीं, वे बोलते नहीं, कहते। वे कहते गये उस शाम और मैं उन्हें हृदयंगम करता रहा। सेन्ट्रल हिन्दू गर्ल्स स्कूल में रिम्पा दिनों में देखी उनकी संगीत जिजीविषा, कलाकुलता, शिष्टता और मनुष्य मन को आनन्द से रंगने की उनकी अटूट आकांक्षा इस शाम भी दिख रही थी। मैंने दबी जुबान में कहा, बनारस आइए न ! उन्होंने ऐसे देखा मानो कह रहे हों, ‘मेरे मन का एक पैर तो बढ़ा ही हुआ है लेकिन क्या तुम मुझे इस बात के लिए आश्वस्त कर सकते हो कि अब वहाँ सभ्य व्यक्तियों के साथ अशिष्टता नहीं होती ! क्या अब वहाँ का मन शिक्षित और संस्कारित हो गया है !’
 

पिछली बार वे दिल्ली आये तो उन्होंने अपना दिल खोल ही दिया कि बनारस जाने की इच्छा है बस एक बार। लेकिन यह इच्छा उन्होंने मुझसे नहीं जाहिर की। उन्होंने कहा, मेरे तबलाशिल्पी मित्र विनोद लेले से, जिन्हें वे अपने घर बुलाते, तबला सुनते और स्पीकमैके ने जो एक कार्यक्रम उनके व्याख्यान का करायाए वहाँ वे उन्हें लय की बारीकियाँ सिखाते। विनोद वो सब अपने तबले पर करते जो लयकारियाँ वे ताली खाली से दिखाते। यह भारत में उनका अन्तिम सार्वजनिक दृश्य हुआ। 92 साल की उम्र में ताली खाली से साढ़े ग्यारह मात्रा कैसे बजाये करके वे विनोद लेले को समझा रहे और विनोद जी सब शिक्षा पी रहे। गरुड़ की यह अनन्त में उड़ान। इस दृश्य को बारह स्वरों के साथ लिखते हुए मेरा मन अचानक क्यों रुंध आया है, आप बता सकते हैं !

गौतम चटर्जी की तरफ से श्रद्धांजलि. 

 


 


(सुनें)

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