पटना के पत्रकारों की मौज ही मौज

मौज में अभी पटना के पत्रकार हैं। बाजार भाव बढ़ा है। मोल-जोल करने की स्थिति में हैं। हाल यह है कि सुबह आप मीटिंग में शामिल हो रहे हैं। संभावित खबरों की फेहरिश्‍त तैयार कर रहे हैं। लेकिन शाम को खबर लिखने दूसरे दफ्तर में पहुंच जा रहे हैं। सभी संपादक इसमें ही परेशान हैं कि कौन किनसे मिल रहा है।

जहां, दूसरा हाउस मिलने को बुलाता है, वहां जासूसी को ड्यूटी लग रही है। जिनका भाव है, अकेले में बुलाकर समझाया जा रहा है कि चलो, बढ़ा दे रहे हैं इतना, हिलना मत। लेकिन फिर भी टूट बंद नहीं हो रही है। बड़े मीडिया हाउस की पहले सिटी रिपोर्टिंग टूटी, तो अगले दिन ब्‍यूरो के योद्धा भाग गये। धन्‍य हो दैनिक भास्‍कर, जो पत्रकारों की कीमत बढ़ाये है।

ज्ञानेश्वर का विश्लेषण.

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