पटना से निकले हिंदी अखबार आज पलटें और सोचें

: काटजू ने सुना था, आप देखना चाहते हैं तो देख लें : लालू प्रसाद यादव तृणमूल सांसदों के कब्जे में जाने के पहले तक लगातार 5 साल तक रेल मंत्री रहे हैं. साथ ही दिल्ली-पटना की सत्ता से बेदखल होने के बावजूद आज भी बिहार में विपक्ष की धुरी हैं. बिहार के बड़े नेताओं में से एक हैं. इन दोनों पात्रताओं को देखते हुए इतना तो बनता ही था कि पटना से निकलने वाले हिंदी अखबार कल पेश हुए रेल-बजट पर उनकी टिप्पणी को प्रमुखता से जगह देते. वे लालू यादव, जो कि कल संसद में भी मौजूद थे, की प्रतिक्रिया समग्रता में न सही बिहार के संदर्भ में ही कम-से-कम लेते. लेकिन नहीं. हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और प्रभात खबर – पटना से प्रकाशित इन तीनों प्रमुख हिंदी अखबारों के पहले पन्ने पर रेल-बजट पर टिप्पणी देते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही छाये हुए हैं.

लालू प्रसाद यादव अंदर के पन्नों पर धकिया दिये गये हैं. अब जरा कुछ दिनों पहले भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू द्वारा कही गयी बातों को याद करें. उन्होंने कुछ दिनों पहले पटना कालेज में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था, ‘बिहार में सत्ता पक्ष द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता के विरुद्ध रवैया अपनाने की शिकायतें मिल रही हैं. लालू के राज में फ्रीडम ऑफ प्रेस होती थी, लेकिन अब यहां फ्रीडम ऑफ प्रेस नहीं है’.

आज पटना के प्रमुख हिंदी अखबारों ने जिस ढंग से रेल-बजट का कवरेज किया है. क्या वो काटजू द्वारा लगाये गये आरोपों को प्रकारांतर से मजबूत नहीं करता है. हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और प्रभात खबर का पहला पन्ना आज एक बार फिर से यह साबित करता है कि नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ में पिछले सात वर्षों से मुख्यधारा का मीडिया (खासकर बड़े हिंदी अखबार) अलग-अगल वजहों से खबरों के मामले में संतुलित रहना भूल गया है. हद तो तब हो जाती है कि जो खबरें सीधे-सीधे बिहार सरकार से नहीं जुड़ी होती हैं उन खबरों के मामले में भी वह   नीतीश  कुमार के मोहासक्ति का ही शिकार नजर आता है. नीतीश कुमार भी दिल खुल कर बयान देते हैं. (2010 में दिल्ली स्टेशन पर मची भगदड़ में जब कुछ बिहारियों की मौत हुई थी तब इसके लिए भी   नीतीश  कुमार ने लालू प्रसाद यादव को ही दोषी ठहराया था).

रेल-बजट जैसे मामलों में इस तरह की सेंसरसिप मीडिया संस्थानों ने अपने लिए खुद चुनी है. (शायद) इस कारण यह ज्यादा खतरनाक है. ऐसा लगता है बिहार में आज कारपोरेट संचालित मीडिया उन स्वरों को प्रमुखता से जगह देने को तैयार नहीं है जो बड़े और लगातार विज्ञापन देने के लायक नहीं है. बिहार में प्रेस की आजादी छीनी भी जा रही है और बहुसंख्य मीडिया संस्थान अपने फायदे के लिए खुद गुलाम भी बन गये हैं. देखना है कि आने वाले दिनों में स्थिति और बदतर होती है कि प्रेस के लब आजाद होते हैं. यह तस्वरी साफ होने में तो अभी समय लगेगा. वैसे इसी सप्ताह यह साफ हो जायेगा कि कोई संपादक ‘सुशासन’ की चाटुकारिता कर सांसद बनने में कामयाब हो पाया कि नहीं?

लेखक मनीष स्वतंत्र युवा पत्रकार हैं.

 

 
 

 

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