पत्रकारद्वय अरविंद कुमार सिंह और असरार खान के बीच फेसबुकी संवाद

Arvind K Singh : भाई असरार खान फेसबुक के ही नहीं बल्कि हमारे पुराने साथी हैं… उनके प्रति मेरे मन में बहुत आदर और सम्मान है… इसलिए कि जब तक उन्होंने पत्रकारिता की, बहुत स्तरीय पत्रकारिता की… दलित, वंचित और पीड़ित तबके की आवाज बुलंद की… उनकी बातें उठायीं, जिनको कोई पूछता नहीं.. मुझसे भी काफी पहले वे रेल भवन में जब रेल मंत्री के सलाहकार रहे, वो चाहते तो क्या कुछ नहीं कर सकते थे लेकिन विरोधी भी उन पर उंगली नहीं उठा सकता…

लेकिन राजनीति में आने के बाद हमारी उनकी धारा अलग है… कई बार जब मैं उनके विचारों से खुद को असहमत पाता हूं और टिप्पणी करता हूं तो भी मन को पीड़ा होती है… हमारी धारा अलग है… लेकिन माफ करना असरार भाई… आपके प्रति मेरे मन में बहुत इज्जत है और आपकी ईमानदारी और सरोकारी जीवन को सलाम करता हूं… शायद इसी नाते इस टिप्पणी को सार्वजनिक कर रहा हूं.

इन दिनों राज्यसभा टीवी में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. इस स्टेटस पर खुद असरार खान ने जो कमेंट किया है, वह इस प्रकार है….

Asrar Khan : अरविन्द जी मेरा ख्याल है है कि हमारे आपके विचारों में कोई भिन्नता नहीं है… हाँ, यह सही है कि मैं राजनीति में हूँ और जिस पार्टी में कोई व्यक्ति रहता है उसे अनुशासन के नाम पर पार्टी की सभी गतिविधियों का पालन करना पड़ता है चाहे व्यक्तिगत तौर पर वह सहमत हो या न हो … खैर, पार्टी में वही व्यक्ति अपनी पार्टी लाइन के खिलाफ अपनी बात रख पाता है जो बहुत सबल होता है… कहने का मतलब यह कि कमजोर या छोटे पदाधिकारियों के लिए किसी भी पार्टी में पर्याप्त लोकतंत्र का नितांत अभाव है जिसकी वजह से ज्यादातर पार्टियों में चाटुकारिता का बोल-बाला है …

मैं आम आदमी पार्टी में हूँ इसलिए उसकी नीतियों को फैलाना मेरी पहली जिम्मेदारी है और दूसरी पार्टियों की नीतियों को खारिज करना भी उतना ही जरूरी है वरना हमारी पार्टी का औचित्य ही क्या है …लेकिन फिर भी यदि किसी पार्टी में कोई ऐसी अच्छाई दिखाई दे रही है जो हीरे की भांति उजागर हो रही है तो फिर उसकी तारीफ़ या आलोचना कोई मुद्दा नहीं है …

अरविन्द जी मैं तो एक मार्क्सवादी था लेकिन भारत का सारा कम्युनिस्ट आन्दोलन खुद ही इतना कन्फ्यूज्ड है कि खुद ही कुछ कदम आगे बढ़ कर भी रसातल में जा रहा है ….मैंने उसकी इस कमजोरी को १९८० में ही अच्छी तरह भांप लिया था और माकपा से अलग हो गया था ….लेकिन दूसरा भी कोई ऐसा नहीं मिला जो गांधी -विनोवा और जेपी के मार्ग पर सही ढंग से चला हो …इसीलिए मुझे पत्रकार बनना पड़ा था ….लेकिन सड़क पर उतर कर सीधी लड़ाई लड़ने की जज्बात ने मुझे फिर से राजनीति में ला दिया ….मुझे आम आदमी पार्टी से बहुत उम्मीद है इसलिए उसकी हौसला आफजाई करता रहता हूँ और चाहता हूँ कि लोग इस पार्टी को अपनी पार्टी समझ कर इसमें शामिल हों और खुद राजसत्ता को अपने हाथ में लेने के लिए एक बड़े आन्दोलन में कूद पड़ें …मेरा यकीन है कि लाठी -डंडे भी पड़ेंगे लेकिन सत्ता भी मिलेगी बस उसे जनता की सत्ता में तब्दील करने की कंजूसी न करें ….

मित्रों, अरविन्द जी इस समय भी पत्रकारिता की ऊंचाइयों पर हैं और जब से मैं उन्हें जानता हूँ तब से उन्हें इसी जज्बे के साथ पत्रकारिता में जुटा हुआ पाया ….चौथी दुनिया जब शुरू हुआ तब से अरविन्द जी की रिपोर्टिंग का लुत्फ़ ले रहा हूँ और सच कहूं तो इनकी पत्रकारिता से प्रेरित होता रहा हूँ …मित्र की ज्यादा तारीफ़ करना ठीक नहीं वह भी मुंह पर तो बिलकुल भी नहीं करना चाहिए लेकिन दिल्ली में कई ऐसे धाँसू पत्रकार मिले कि पत्रकार होते हुए भी मैं उनका फैन हो गया …उनमें हेमंत शर्मा …अलोक तोमर …ओम प्रकाश …राजेश जोशी …राजकिशोर जी ..स्वर्गीय उदयन शर्मा …और अरविन्द कुमार जी काम लिए बगैर मैं नहीं रह सकता ….

मेरे बारे में अरविन्द जी ने जो भी लिखा है उसे पढ़कर मुझे ख़ुशी हुई है क्योंकि जब आप कठिन परीक्षाओं से गुजरते हैं या जब आप बड़ी- कुर्शी पर बैठे होते हैं तभी दुनिया आप का सही मूल्यांकल कर पाती है ..ऐसे में मेरे इस ओजस्वी पत्रकार मित्र ने मुझे सभी परिस्थियों में देखा और सही पाया …मेरे लिए बहुत ख़ुशी की बात है … मेरी हार्दिक शुभकामना है कि अरविन्द जी इस देश के सबसे बड़े पत्रकार और आथर बने ….

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