पत्रकारिता के नटवरलाल (एक) : सुमेश दोषी

पर्ल ग्रुप की मैग्जीन 'शुक्रवार' के पत्रकार नरेंद्र कुमार वर्मा की एक किताब आई है. नाम है- 'पत्रकारिता के नटवरलाल'. इसमें दर्जनों पत्रकारों की सच्ची कहानियों को मिलते-जुलते नामों के साथ पेश किया गया है. कहानी का शीर्षक संबंधित पत्रकार के मिलते-जुलते नाम पर ही है. लिखने का अंदाज सरल, सहज और बातचीत वाला. पढ़ेंगे तो पढ़ते जाएंगे. ईमानदार और संवेदनशील लोग अगर इन कहानियों को पढ़ेंगे तो पढ़ते-पढ़ते उन्हें उबकाई आने लगेगी. संभव है पूरी पत्रकारिता और सारे पत्रकारों से घृणा होने लगे.

16 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय नरेंद्र कुमार वर्मा ने ये कहानियां अपने अनुभवों और शोध के आधार लिखी हैं. पत्रकारों की कहानी बताती इस किताब का प्रकाशन किया है प्रतिमा प्रकाशन ने. इस कहानी संग्रह से एक कहानी यहां प्रकाशित कर रहे हैं जिसका नाम है- 'सुमेश दोषी'. इस कहानी के सभी चरित्रों के बारे में दिल्ली-एनसीआर के ज्यादातर पत्रकार बहुत कुछ जानते रहे हैं पर पहली बार किसी ने इसे लिखकर प्रकाशित किया है. लीजिए, पढ़िए कहानी. -यशवंत, भड़ास4मीडिया


सुमेश दोषी

सुमेश दोषी ने अस्सी के दशक में देहरादून से दिल्ली आकर पत्रकारिता की शुरुआत की थी। दिल्ली में उन दिनों आंचलिक पत्रकारों की खूब पूछ थी। सुमेश दोषी ने भी हाथ-पैर मारने शुरू किए, लेकिन किसी ने हाथ नहीं रखने दिया। एक बड़े अंग्रेजी दैनिक के मालिकान ने उन्हीं दिनों अपना हिंदी अखबार शुरू किया। हिंदी अखबार में सुमेश दोषी को रख लिया गया। यह बात अलग है कि जिन संपादक ने उन पर कृपा की, उन्हें सुमेश दोषी बाद में गालियां देते रहे।

दरअसल, सुमेश दोषी की फितरत ही ऐसी थी कि जो भी उन पर अहसान करता, वह उसे ही काट खाने को दौड़ते। नए-नए शुरू हुए हिंदी अखबार ने अपनी पकड़ बनानी शुरू की और जल्द ही सारे बाजार को अपनी गिरफ्त में ले लिया। सुमेश दोषी की गाड़ी चल निकली। वह एक पैंट-शर्ट झोले में रखकर दिल्ली आए थे। अखबार की नौकरी मिलते ही उनके पर लग गए। दिल्ली से निकलने वाले अखबार में काम करने का उन्हें पहला अनुभव था। वह हर वक्त गर्व से चूर-चूर रहते। अपनी फितरत के अनुसार सुमेश दोषी ने काम करना शुरू कर दिया और एक साल के भीतर ही अखबार में पत्रकारों के दो गुट पैदा करवा दिए। बात संपादक तक पहुंची, तो उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि काम करना है, तो करो, वरना पहाड़ की राह पकड़ो। अगर काम के वक्त ज्यादा गुटबाजी की, तो ठीक नहीं होगा।

लेकिन सुमेश जी कहां मानने वाले थे। सो, उन्होंने अपनी गुटबाजी जारी रखी और एक दिन एक गुट के नेता को पहाड़ के एक नेता से मिलवाकर उनसे पत्रकारों की मीटिंग के नाम पर चंदा ले लिया। चंदे की रकम इतनी थी कि कोई छोटा-मोटा प्रोग्राम करने के बाद भी काफी पैसा बच सकता था। लेकिन भाई लोगों ने प्रोग्राम नहीं किया, बल्कि चंदा आपस में आधा-आधा बांट लिया। सुमेश दोषी डेस्क पर काम करते थे और फील्ड में काम करने वाले लोगों की हर वक्त कमियां निकालते रहते। संपादक के पास अक्सर उनकी शिकायतें पहुंचतीं कि वह बिना किसी आधार के खबरों को काट देते हैं। संपादक कब तक बर्दाश्त करते! शायद ही ऐसा कोई दिन बीतता होगा, जब उन्हें बुलाकर झाड़ न पिलाई जाती हो, लेकिन थेथरों पर जिस तरह कोई असर नहीं पड़ता, वैसा ही हाल दोषी का भी था।

वहां काम करते हुए सुमेश दोषी ने कई पत्रकारों के बीच घुसपैठ कर ली थी। किसी तरह वह एक दूसरे अखबार से जुड़ गए। वहां उन्हें उनका मन-पसंद काम रिपोर्टिंग मिला। दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों की बीट उन्हें हासिल हो गई। बस, सुमेश दोषी ने खेल शुरू कर दिया। उन्होंने सबसे पहले अपनी बीट की पार्टियों के छोटे नेताओं को पकड़ा। उनसे संबंधित खबरों को छापना शुरू किया। फॉर्मूला काम कर गया। सुमेश दोषी को नए नेता पहचानने लगे। जान-पहचान जब बढ़ी, तो दोषी छुटभैये टाइप के नेताओं की गाड़ियों में भी बैठने लगे। सिलसिला आगे बढ़ा और सुमेश दोषी छोटे नेताओं के सबसे पसंदीदा पत्रकारों में शुमार हो गए। नए अखबार में उन्होंने हाथ-पैर तो मारने शुरू कर ही दिए थे, जल्दी ही उन्होंने दूसरे कई लोगों को भी यह गणित समझा दिया।

अखबार की कैंटीन में एक दिन दोषी किसी नेता के साथ बैठे थे कि किसी ने टिप्पणी कर दी- 'अब तो चोर भी अखबारों के दफ्तर में आने लगे हैं…!' टिप्पणी करने वाला क्राइम बीट का रिपोर्टर था। दोषी ने उसे टोका, तो वह बोला- 'ज्यादा बोला, तो छठी मंजिल से नीचे धक्का दे दूंगा।' नेता जी के सामने दोषी पानी-पानी हो गए, लेकिन कुछ बोले नहीं। अलबत्ता नेता उठकर चला गया और दोषी से बोला- 'कोई बात नहीं यार, अखबार वालों की बातों का मैं बुरा नहीं मानता।' दोषी को लगा कि अब इस अखबार में ज्यादा दिन का खर्चा-पानी निकालना मुश्किल है, तो उन्होंने जुगाड़ भिड़ाकर किसी तरह दूरदर्शन में काम हासिल कर लिया। दूरदर्शन उन दिनों फ्री-लांसर पत्रकारों से खबरें लिखवाता था। दोषी की लाटरी लग गई। वह दो बजे के करीब दूरदर्शन के दफ्तर जाते, दो खबरें लिखते और बाकी वक्त में वहां काम करने वाली लड़कियों से गप्पें लड़ाते।

दूरदर्शन में काम करने के दौरान दोषी ने दो अखबारों में अपने स्वजातीय संपादकों से जुगाड़ भिड़ाकर अपने लिए साप्ताहिक तौर पर काम भी हासिल कर लिया। उन्हीं दिनों राजीव गांधी ने दूरदर्शन का विस्तार करना शुरू किया था। जिस कांग्रेसी नेता को उनके पुराने दफ्तर में क्राइम रिपोर्टर ने बेइज्जत किया था, वह नेता अब कांग्रेस में काफी दम रखता था। उसकी मार्फत दोषी ने ऐसा जुगाड़ भिड़ाया कि वह दूरदर्शन पर खबरें पढ़ते दिखाई देने लगे।

अब दोषी के अंदर गजब का आत्मविश्वास आ गया था। वह अपने से आधी उम्र की लड़कियों को साथ लेकर अक्सर कई बड़े नेताओं से बातचीत करने जाते और उनके बारे में दूरदर्शन स्तुति की तरह खबरें दिखाता। टीवी पर चेहरा दिखाने के बाद दोषी के अंदर चमक-दमक और काफी स्फूर्ति आ गई थी। उन्हीं दिनों आईआईएमसी के कुछ छात्र इंटर्नशिप करने दूरदर्शन आए थे। उन्हीं में से एक छात्र ने उनसे पूछ लिया कि सर आपकी उम्र क्या है? बस, दोषी का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। उन्होंने आईआईएमसी के सभी छात्रों को रात की शिफ्ट में काम पर लगवा दिया। चूंकि दोषी का सिक्का दूरदर्शन में चल रहा था, लिहाजा वहां काम करने वाले दूसरे लोग उनसे डरकर रहते थे। दूरदर्शन में दोषी ने जमकर काम किया और इसी दरमियान वहां उन्होंने कई ऐसी लड़कियों और महिलाओं को भी कांट्रेक्ट पर रखवा दिया, जिन्हें न तो खबरों के बारे में पता था और न ही टीवी के बारे में।

सुमेश दोषी को दिल्ली में दस साल हो गए। इन दस वर्षों में दोषी के पास घर, गाड़ी-घोड़ा सब पैदा हो गया था। दिल्ली के उन पत्रकारों के बीच भी दोषी ने पहचान बना ली थी, जो शाम ढलते ही किसी क्लाइंट को खोजते रहते हैं। एनडीए सरकार के आने के बाद दोषी की दूरदर्शन से विदाई हो गई। लेकिन तब तक दोषी को सब दांव-पेंच आ चुके थे। वह जान चुके थे कि अगर कोई जानकारी नहीं है, तो भी ऐसा दर्शाओ कि सामने वाले को लगे कि अगला तो गुरु है। दोषी के अंदर एक और प्रवृत्ति थी। वह छोटे लोगों से बात करते हुए खूब हल्ला मचाते और उनकी गलतियों को निकालते रहते। राजनीतिक खबरों की बात छोड़िए, उन्हें लोकल खबरों तक की तमीज नहीं थी और क्राइम की खबरों से तो उनका कभी वास्ता भी नहीं पड़ा था।

खबरों की समझ न होने के बावजूद भी दोषी की गाड़ी सुपर फास्ट तरीके से दौड़ रही थी। दोषी को अपनी बात मनवाने का हुनर आता था। दूरदर्शन से विदाई के बाद दोषी ने दिल्ली के एक मीडिया स्कूल का रुख किया और वहां बच्चों को पत्रकारिता की शिक्षा देने का काम शुरू कर दिया। लेकिन पत्रकारिता की एबीसीडी भी उन्हें नहीं आती थी। हालांकि इसके बावजूद दोषी हार मानने वाला शख्स नहीं था। उसने पत्रकारिता की दो-तीन किताबें खरीदीं और छात्रों को इंट्रो से लेकर एंकर और बाई-लाइन से लेकर सिंगल कॉलम तक के बारे में बताने लगे। मीडिया स्कूल के कर्ताधर्ताओं को उन्होंने समझा दिया था कि वह साल के अंत में वहां के सारे बच्चों को दूरदर्शन में रखवा देंगे। लेकिन साल आखिर आने से पहले ही दोषी वहां से कट लिए।

इसके बाद दिल्ली में बिताए अपने पत्रकारिता जीवन पर उन्होंने एक किताब लिखना शुरू किया। लेकिन उससे पहले ही दिल्ली के एक छोटे टीवी चैनल से जुड़ गए। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि दोषी अपनी पुत्री के साथ चैनल के दफ्तर गए थे, वहां चैनल के सीईओ को दोषी कम और उनकी पुत्री ज्यादा पसंद आई। दिल्ली के पत्रकारिता इतिहास में ऐसा शायद पहली बार ही हुआ होगा कि पिता-पुत्री को एक ही दिन और एक ही दफ्तर में नौकरी मिली हो। टीवी चैनल में दोषी को ज्योतिष के प्रोग्राम का जिम्मा मिला। उन्होंने दो-चार ज्योतिषियों को सेट किया और उनसे तय कर लिया कि आपका कार्यक्रम मैं दिखाऊंगा, बताओ क्या दोगे? कई ज्योतिषियों ने दोषी के साथ पैक्ट किया और कई महीनों तक लोगों को बेवकूफ बनाते रहे। दोषी जी की लड़की भी उसी चैनल में काम करती थी। मजेदार बात यह कि दोनों अलग-अलग घर जाते। लड़की को बॉस की कार में लिफ्ट मिलती और दोषी जी दूसरी महिला सहकर्मी को लिफ्ट देते।

उक्त चैनल से दोषी जी की गाड़ी फिर से पटरी पर लौट आई। किस वजह से लौटी, इस बारे में लोग अपने-अपने तरीके से व्याख्या करते हैं। खैर, सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि उस चैनल में देहरादून की एक लड़की एंकर की पोस्ट पर आई। दोषी जी ने उसे एंकरिंग के गुर बताए और उस लड़की के साथ नजदीकियां बढ़ाईं। लोगों का तो यह भी कहना है कि यह लड़की अक्सर दोषी के साथ उनकी कार से जाती थी। एक दिन खबर आई कि उस लड़की ने आत्महत्या कर ली और मौके पर जो सुसाइड नोट छोड़ा, वह सीधा दोषी की तरफ इशारा करता था।

इस बारे में अखबारों में खूब खबरें छपीं। मीडिया बिरादरी के लोगों ने भी अपने तरीके से सच्चाई पर गुफ्तगू की, लेकिन कमाल देखिए, दोषी जी का बाल भी बांका नहीं हुआ। रो-धोकर लड़की के मां-बाप दिल्ली से विदा हो गए। दोषी जी इस हादसे के बाद फिर फॉर्म में आ गए और पूरी उर्जा से चैनल में काम करने लगे। वह अक्सर न्यूज रूम में काम करने वाले बच्चों पर चीखते-चिल्लाते रहते। दो-चार महीने बीते होंगे कि एक रात दोषी जी अपने चिरपरिचित अंदाज में बुलेटिन पढ़ रहे थे, उसी वक्त न्यूज रूम में हल्ला मचना शुरू हुआ। लोगों ने देखा, दोषी जी की बेटी बॉस के साथ लड़खड़ाती हुई न्यूज रूम में घुसी, वह अंग्रेजी में किसी को गाली बक रही थी। दोषी जी बुलेटिन खत्म करके न्यूज रूम में आए, लेकिन उन्होंने अपनी पुत्री को कुछ नहीं कहा और चुपचाप निकल लिए।

दोषी जी की लड़की ने कुछ दिनों बाद चैनल छोड़ दिया और एक दूसरे चैनल में पहले से शादीशुदा व्यक्ति के संग ब्याह रचा लिया। लोगों ने जब पूछा कि तुम 24 की और पति 52 का? इस पर वह बोली- तो क्या हुआ, डैड भी तो 60 के हैं और इस उम्र में उनका स्टेमिना इतना है कि 25 साल की लड़की के साथ घूमते हैं…इसमें हर्ज क्या है…पसंद अपनी-अपनी।

दोषी जी आज भी उसी चैनल में काम कर रहे हैं। वह अक्सर राजनीतिक खबरों की रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टरों को खबरों का एंगल समझाते हुए देखे जा सकते हैं। लोग कहते हैं कि उनका काम क्या है और उन्हें रखा क्यों गया है? लोग अब दोषी जी के सामने ही उन पर कटाक्ष कर देते हैं, लेकिन वह सब जानते हुए भी कुछ नहीं बोलते। चैनल की एक शादीशुदा महिला रिपोर्टर की स्टोरी अक्सर दोषी जी रोक देते और कहते- इस स्टोरी में कोई दम नहीं है और बिना एंगल की स्टोरी को वह क्यों चलने दें? महिला रिपोर्टर उनसे बहुत परेशान रहती थी। इत्तेफाक से एक दिन लिफ्ट में दोषी जी उस महिला रिपोर्टर से टकरा गए। लिफ्ट में जाने क्या हुआ, उसके बाद उस रिपोर्टर की कभी कोई स्टोरी नहीं रुकी, बल्कि दोषी जी की कृपा उस महिला पर कुछ ज्यादा ही होने लगी।

सुमेश दोषी कभी-कभी राजनीतिक बातें करते-करते अध्यात्म की तरफ मुखातिब हो जाते हैं। लोग कहते हैं कि देर रात तक चलने वाली पार्टियों में जब वह गिलास हाथ में लेकर अध्यात्म की बातें करते हैं, तो सामने वाला सोच में पड़ जाता है कि अगला पत्रकार है या कोई बाबा? वैसे उनके साथ काम कर चुकी और करने वाली महिलाएं उन्हें बाबा ही कहती हैं। कुछ महिलाएं कहती हैं कि सुमेश दोषी दरअसल अपने आपको विश्वामित्र कहते हैं। बकौल उनके- जिस तरह मेनका ने विश्वामित्र की तपस्या भंग कर दी थी, उसी तरह टीवी चैनलों में काम करने वाली युवतियां उनका भी ध्यान भंग कर देती हैं। एक तेज-तर्रार महिला ने एक बार उन्हें सार्वजनिक तौर पर लताड़ लगाई और सलाह दी कि इस उम्र में अब ज्यादा उछल-कूद मत करो…जाओ, अब किसी पहाड़ पर जाकर तपस्या करके पत्रकारिता जीवन में किए गए पापों की माफी मांगो। वैसे लोगों का कहना है कि दोषी जी को काफी पहले पहाड़ पर लौट जाना चाहिए था, तपस्या करने या फिर चाहे कोई दूसरा धंधा चलाने।

कहानी लेखक परिचय…

अगर आप इस किताब को मंगाना चाहते हैं तो pratimaprakashan2004@gmail.com पर मेल कर सकते हैं या फिर 09350887815 या 09968482820 पर काल कर सकते हैं. प्रतिमा प्रकाशन का पता है: आर-2/29, गुरुद्वारा रोड, रमेश पार्क, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-110092.

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