‘पत्रकारिता के नटवरलाल’ सरीखी एक कहानी ये भी

Priy Yashwant Bhai Ji, Jai Ram ji ki. Bhadas khub achha nikal raha hai. Din ki shuruvat chay aur bhadas se hi hoti hai. Ek story bhej raha hu. Dekh lijiye. 100% satya hai. Agar pasand Aa jaye to chhap dijiye. Badi meharbani hogi. Agar apne amulya samay me se iska link bhej denge to ham ye mail kai logo ko forward kar denge. Aur na bhi bhejenge to koi bat nahi. Ham bhadas din me 5 bar padhte hai. -Apka ek Gumnam pathak

हाल में भड़ास पर ''पत्रकारिता के नटवरलाल'' शीर्षक से नरेंद्र वर्मा जी की पुस्तक का अंश पढ़ने को मिला। इसी श्रेणी की एक सत्य कथा यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। मैंने किसी सज्जन का नाम नहीं लिखा है। इसलिए इसे व्यक्तिगत आक्षेप न मानें। लेकिन जिन लोगों ने यह कांड किया है उनके लिए यह आईना है। हम तो वैसे भी पत्रकार नहीं हैं, बस कभी-कभार थोड़ा पढ़-लिख लेते हैं। हां, अपने कुछ दोस्त पत्रकारिता में जरूर हैं। उनमें से ही एक महाशय हैं। यूं तो बेचारे बड़े गुणी हैं लेकिन बहुत परेशान भी हैं।

नरेंद्र जी की कहानी में किन्हीं मेनका और विश्वामित्र टाइप लोगों का जिक्र हुआ है। सो हमारा भी फर्ज बनता ही है कि एक मेनका का परिचय आपसे करा दें। यह अलग बात है कि इस कथा में विश्वामित्रों की ठीक-ठीक संख्या का हमें भी पता नहीं। हमारे मित्र बताते हैं कि उनकी संख्या सात से ऊपर है तो एक सज्जन बताते हैं कि यह आंशिक सत्य है। टाइम के हिसाब से यह आंकड़ा कम-बेसी होता रहा है। अब इसमें मेनका ज्यादा दोषी है या विश्वामित्र, यह तो भगवान ही जानें, लेकिन जिस तरह से पत्रकारिता में नटवरलालों की कमी नहीं है, उसी प्रकार से मेनका तथा विश्वामित्र भी अवतरित होते रहते हैं।

यह किस्सा है एक नामी अखबार का, लेकिन आज कल कुछ दुर्दिन चल रहे हैं। हमारी कथा के मेनका और विश्वामित्र यहीं से जुड़े हैं। एक विश्वामित्र घाघ किस्म के कुटिल प्राणी हैं जिनका काम अखबार के लिए बिजनस का जुगाड़ करना है। ये ऑफिस में जब आते हैं तो इतनी ज्ञान की बातें करते हैं कि आपको इन पर श्रद्धा हो जाए और उसी वक्त नारियल फोड़ने का मन करे, लेकिन ये भी मेनका के चक्कर में आ गए और अब लोगों की श्रद्धा जाती रही। इस बीच इन्होंने ज्ञान की बातें बंद कर दीं।

दूसरे विश्वामित्र डिजाइनिंग से हैं। यह विश्वामित्र अच्छा पेज बना लेता है लेकिन मेनका ने यह कहकर उसका ईमान बिगाड़ दिया कि हम अपना डिवीजन अलग काहे नहीं बना लेते? अब तो बिजनेस वाले बाबू भी अपने साथ हैं! रात को रोज ही बात होती है। ये विश्वामित्र भी षड्यंत्र में शामिल हो गए। दूसरा 15 साल से सिर्फ कंपोजिंग कर रहा है और आज भी यही कर रहा है। उसका कहना है कि आगे भी यही करता रहेगा।

अब मेनका के बारे में सुनिए। शुरुआत में एक अंग्रेजी अखबार से जुड़ी लेकिन वहां एक से एक कर्मकांडी बैठे थे। सो हिंदी का रुख किया। यहां संपादक को सैट कर मैग्जीन में जगह बना ली। कुछ साल बीते। मेनका ने भी अपना कुनबा बना लिया। एक से भले तीन। इस बीच संपादक को दूसरी जगह से मौका मिला और वे चलते बने। ऑफिस में लोक-दिखावे के लिए रोने-धोने का कार्यक्रम हुआ, लेकिन मेनका के मन में लड्डू फूट रहे थे कि अब पांचों अंगुलियां घी में और सर कड़ाही में। बिजनस बाबू को कहकर कुछ दिन के लिए संपादक बनी। बताते चलें कि मेनका को पत्रकारिता में सिर्फ दो ही विद्या में महारत हासिल है – Translation और षड्यंत्र। सो दोनों ही विद्याओं का खूब प्रयोग हुआ।

मैग्जीन में गुटबंदी बढ़ गई और कवर स्टोरी के नाम पर नेट से मारे गए मैटर को ट्रांसलेट कर चेपा गया। इससे पाठक बोर हो गया। नतीजा यह निकला कि ज्यों-ज्यों मैग्जीन में गुटबंदी और Translation बढ़ते गए त्यों-त्यों circulation नीचे आता गया। अब तक एमडी की भी आंखें खुल गईं। बिजनस बाबू को फटकारा कि ऑफिस आकर कभी-कभी कुछ काम भी कर लिया करो। लिहाजा नए संपादक की खोज शुरू हुई। नए संपादक आए और उन्होंने कार्यभार संभाला। इन महाशय पर भी मेनका ने जादू चलाना चाहा लेकिन नहीं चलना था सो नहीं चला। लिहाजा षड्यंत्र अनिवार्य था। दिल्ली, नोएडा के बड़े वकीलों के दरबार में मत्था टेकने लगे। लेकिन बात बन नहीं रही थी।

इधर नए संपादक बाबू काफी षड्यंत्रों के बावजूद और मजबूत हो रहे थे। इसलिए मेनका ने बिजनस बाबू की ओर पांसा फेंका – ग्रप में मैग्जीन की कोई कमी तो है नहीं। अगर आप मुझे अमुक मैग्जीन की संपादक मुकर्रर करवा दें तो बड़ी मेहरबानी हो। बिजनस बाबू मान गए। अब नई मैग्जीन की बारी थी। मेनका के साथ उसका पूरा कुनबा नई मैग्जीन में चला गया। एक बार फिर से Translation और षड्यंत्रों का मौसम शुरू हुआ। इस मौसम ने कई लोगों की नौकरियों का भक्षण किया। कोई पांचेक महीने बीते होंगे कि एमडी ने बिजनेस बाबू को फिर फटकारा – यार, तुम काहे हमारी बात पर ध्यान नहीं देते। तुम्हारी इस रासलीला की वजह से हमारा बंटाधार हो रहा है। मेनका की पेशी हुई। इस बार एमडी ने किसी का लिहाज नहीं किया। बोले – मैग्जीन का ग्राफ रसातल में चला गया। अगर मार्केट में मुफ्त में बांटो तो भी कोई नहीं लेगा। इसलिए बंद करो ये रासलीला और सब अपने-अपने घर जाओ।

इस हुक्म से मेनका और पूरे कुनबे के तोते उड़ गए। कुछ दिन बहुत भारी बीते लेकिन मेनका और बिजनस बाबू ने हार नहीं मानी। एक दिन जब एमडी अच्छे मूड में थे तो दोनों ने मिलकर पटा लिया। अब मेनका और उसका पूरा कुनबा अखबार में आ गया। खबर है कि मेनका के लिए ही बिजनस बाबू ने पेज बढ़वा दिए ताकि संपादक टाइप किसी पद के हिसाब से ये अपना काम करती रहें। ये अलग बात है कि इस पेज का भी वही हश्र होता दिख रहा है जो पहले हो चुका है। इतिहास कभी-कभी अपने आप को दोहरा भी लेता है। जैसे हर युग में मेनका और विश्वामित्र की कथा दोहराई जाती है। हालांकि दोनों की संख्या युग के हिसाब से कम-बेसी होती रहती है।

यह कहानी भड़ास के पास एक मेल के जरिए आई है जिसमें लेखक ने अपना नाम और मेल आईडी न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है.

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