पत्रकारिता में प्रलोभन : हरियाणा डेस्क के सभी लोगों के पास गुड़गांव में प्लाट है, आप भी ले सकते हैं

भारत में पत्रकारिता एक मिशन के रूप में आरंभ हुई मगर बाद में एक धंधा बन गई। अखबार मालिक जब इससे कमाई करने लगे तो पत्रकार भी फिर क्यों पीछे रहते। सो, उन्होंने भी पत्रकारिता के साथ साथ कई प्रकार के धंधे आरंभ कर दिए। पत्रकारों द्वारा ब्लैकमेल और अवैध वसूली के समाचार आए दिन सुनने पढ़ने को मिलते रहते हैं। कई लोग अपने धतकर्मों को छुपाने के लिए पत्रकारों को खरीदने लगे हैं जिसके चलते पत्रकारों की एक ऐसी पीढ़ी सामने आ गई है जो देखते ही देखते करोड़पति बन गई है।

लंबे पत्रकारीय जीवन में मेरे सामने भी ऐसे कई अवसर आए, मगर एक तो अध्यापन जैसे व्यवसाय से पत्रकारिता में आया था जहां बेईमानी का कोई अवसर नहीं था, दूसरे हमारे जमाने के पत्रकारों के कुछ आदर्श होते थे, सो बेईमानी करने का साहस ही कभी नहीं हुआ। कई लोग ताना भी मारते हैं कि तुम्हारे अमुक अमुक चेले करोड़ों में खेल रहे हैं और एक तुम हो कि खटारा गाड़ी में घूमते हो या रेल बसों में धक्के खाते हो। मेरे सामने कई अवसर आए, आज सोचता हूं, इन पर भी चर्चा कर ली जाए।

पहला अवसर नवभारत में आने के कुछ दिन बाद ही मिला। हुआ यह कि बुलंदशहर में एक एस. पी. ने गणतंत्र दिवस पर पदक प्राप्त करने के लिए एक फर्जी एनकाउंटर कर दिया। रात में एनकाउंटर किया तो दापहर के अखबारों ने एस. पी. साहब का खूब गुणगान किया और शाम को शहर के कुछ सेठों ने एक समारोह कर उन्हें सम्मानित भी कर दिया और उन्हें पदक देने के लिए एक ज्ञापन भी सरकार को भेज दिया। कुछ जानकार मेरे पास आए और एनकाउंटर को फर्जी साबित करने के कुछ सबूत भी दिखाए। मैं तुरंत बुलंदशहर गया और स्थानीय संवाददाता को साथ लेकर पड़ताल आरंभ कर दी।

पहला सबूत यह मिला कि जिस आदमी को पुलिस ने दिन में बुलंदशहर से उठाया था, उसके परिवार वालों ने उसी समय टेलीग्राम कर दिया था। उसका कोई आपराधिक रिकार्ड भी नहीं था। दूसरा सबूत यह मिला कि पुलिस ने सड़क पर पेड़ काट कर डालने के लिए जो कुल्हाड़ी बरामद दिखाई थी उसे शाम को एक सिपाही पास की दुकान से लाया था। पुलिस ने सड़क रोकने के लिए जो पेड़ दिखाया था वह सफेदा का एक छोटा सा पेड़ दिखाया जिससे साइकिल भी नहीं रोकी जा सकती थी। आस-पास के लोगों के बयान ले कर एस. पी. साहब से मिला। उन्हें भी गोली लगी बताई गई थी। एस. पी. साहब अकेले ही लॉन में धूप सेंक रहे थे। बातचीत के बाद जब उनसे गोली लगने के बारे में पूछा गया तो वह गोलमोल जवाब देने लगे। मैं अपना काम निपटा कर शाम को घर आ गया।

अगली सुबह होते ही बुलंदशहर के तीन सेठ संवाददाता के साथ घर पर आ गए और बताया कि उन्हें एस. पी. साहब ने भेजा है। यह कहते हुए उन्होंने एक ब्रीफकेस मेरी ओर बढाते हुए कहा कि साहब ने यह आपके लिए दिया है। संवाददाता ने भी उसे लेने का आग्रह किया मगर मैंने इंकार कर दिया। इस पर उन लोगों ने कहा कि इसे खोल कर तो देख लें। मगर मैंने यह भी नहीं माना और चाय पिला कर उन्हें विदा कर दिया। अगले दिन फर्जी एनकाउंटर की रपट छप गई। इसके तीसरे दिन लखनऊ से एक टीम जांच के लिए आ गई। इस टीम की सिफारिश पर एस. पी. से लेकर सिपाही तक 22 लोग जो उस एनकाउंटर में शामिल थे, सबका तबादला हो गया। बाद में संवाददाता ने मुझे बताया कि ब्रीफकेस में मोटी रकम थी।

मेरठ से दिल्ली आने के बाद मैंने एक लेखमाला 'सारे दुखिया यमुना पार' शीर्षक से पांच किस्तों में लिखी। यमुना पार उस समय दिल्ली के बेताज बादशाह हरकिशन लाल भगत का चनुाव क्षेत्र था। इस लेखमाला के छपने के बाद भगत जी के दूत मेरे पास आने लगे कि भगत जी आप से मिलना चाहते हैं। उस समय दिल्ली के बहुत सारे पत्रकार भगत जी के दरबार में हाजिरी लगाया करते थे। भगत जी के दूत जब बार बार आने लगे तो एक दिन संसद भवन जाकर उनके कार्यालय में मिला। भगत जी का आग्रह था कि किसी दिन घर पर आएं ताकि विस्तार से बात हो सके। मैंने शनिवार के लिए कहा तो भगत जी ने अपने पी. ए. से कहा कि शनिवार में 11 और 12 बजे के बीच किसी को समय न दें।

मैं तय समय से कुछ पहले पहुंच गया तो भगत जी ने मुझे एक बड़े से कमरे में बिठा दिया। थोड़ी देर बाद वह आ गए और इधर उधर की बातें करते रहे। फिर उठ कर एक सेफ के पास गए। उसे खोला तो नोटों की कई गड्डियां नीचे गिर गईं। भगत जी ने उन्हें उठा कर सेफ में रख दिया और मेरे पास आ कर बैठ गए और बोले- हम तो पत्रकारों का बहुत सम्मान और सेवा करते हैं, आप तो कभी आते ही नहीं। इसी प्रकार एक घंटा बीत गया मगर काम की एक भी बात नही हुई। मैं वापस आ गया। अगले दिन टाइम्स आफ इंडिया के रमन नंदा को भी भगत जी से मिलना था। रमन ने मुझसे पूछा तो मैंने सारी बात बता दी। अगले दिन रमन ने बताया कि उसे भी सेफ खोल कर दिखाई गई थी। इसके बाद भगत जी के दूत आते रहे और सेवा के बारे में पूछते रहे मगर मैंने कभी कोई सेवा नहीं बताई। कुछ दिन बाद मुझे दिल्ली से हटा कर यू. पी. भेज दिया गया। पता यह चला कि भगत जी को मेरा दिल्ली पर रहना रास नहीं आ रहा था।

यू. पी. में मजे से कट रही थी। फील्ड और डेस्क दोनों पर काम कर रहा था। यह 1990 की बात है। मुलायम की सरकार थी। मेरे यहां रहने से संघी भाई बहुत परेशान थे। तरह-तरह की शिकायतें करते रहते थे। मगर मुझे कोई कुछ नहीं कहता था। चुनाव हुए। सरकार बदल गई और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बन गए। इसके साथ ही मेरी यू. पी. से विदाई हो गई। कुछ दिन भ्रमण कर खबरें लाता रहा और एक दिन मुझे हरियाणा का इंचार्ज बना दिया गया। सरकार भजन लाल की थी और जनता में बहुत विरोध हो रहा था। संवाददाताओं की खबरें भी इसी प्रकार की आ रहीं थीं। ओम प्रकाश चौटाला आए दिन आंदेालन कर रहे थे, जिनकी खबरें खूब छप रही थीं। एक दिन हरियाणा भवन से बुलावा आया कि मुख्यमंत्री मिलना चाहते हैं।

मैं गया तो मुख्यमंत्री ने बड़ा सत्कार किया। एक अलग कमरे में लेकर बैठ गए और बताया कि उनकी सरकार के चार साल पूरे हो रहे हैं। मैं इसकी उपलब्धियों पर लिखूं। मैंने इस बारे में विज्ञापन देने का सुझाव दिया मगर वह मेरे कलम से ही लिखवाना चाहते थे और मैं झिझक रहा था तो मुख्यमंत्री ने सीधे बताया कि हरियाणा डेस्क पर काम कर चुके लगभग सभी लोगों के पास गुड़गांव में प्लाट है, आप भी ले सकते हैं। मैंने इंकार कर दिया और वापस आ गया। मैनेजमेंट फरीदाबाद में एक बैंक खोलना चाहता था। उसके लिए परिसर की आवश्यकता थी तो अधिकारी मुख्यमंत्री से मिले तो मुख्यमंत्री ने लगे हाथों मेरी भी शिकायत कर दी। इसके बाद हरियाणा से भी मेरी विदाई हो गई।

इस प्रकार पत्रकारिता से कमाई के तीन बड़े अवसर मिले मगर मैं किसी का भी लाभ नहीं उठा पाया। अधिकांश मित्र इसे मेरी मूर्खता मानते हैं। हो सकता है वह सही हों मगर जब मैं पत्रकारों के भ्रष्टाचार के बारे में सुनता हूं तो लगता है कि मैं इस काजल की कोठरी से बेदाग निकल आया। बस खुशी इसी बात की है कि मेरी पत्रकारिता की चादर पर कोई दाग नहीं है।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या  maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207

अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *