पत्रकारिता याने ‘निपटा दो स्साऽऽऽले को’

17 मार्च रविवार को, ‘जनसत्ता’ में, ‘अनन्तर’ स्तम्भ में श्री ओम थानवी के, ‘अक्ल बड़ी या भैंस’ शीर्षक आलेख के, तीसरे पैराग्राफ के पहले दो वाक्यों ‘अखबारों की सबसे बड़ी समस्या है, समझ और सम्वेदनशीलता की कमी। इसके कारण सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि का उनमें अभाव दिखता है।’ ने मुझे यह संस्मरण लिखने को विवश कर दिया।

यह, 1970 से 1975 के बीच की बात है। मैं मन्दसौर में, ‘दैनिक दशपुर दर्शन’ का सम्पादक था। जिला युवक काँग्रेस के अध्यक्ष श्री सौभाग्यमल जैन ‘करुण’, अखबार के मालिक थे। मन्दसौर तब आठ तहसीलों वाले अविभाजित मन्दसौर जिले का मुख्यालय था। कालान्तर में इसका विभाजन हो गया और चार तहसीलें मिला कर नीमच जिला बना दिया गया। उन दिनों मन्दसौर की जनसंख्या एक लाख से भी कम थी।

अखबार यद्यपि ‘काँग्रेसी का’ था किन्तु ‘काँग्रेस का’ नहीं था। ऐसी प्रत्येक कोशिश को मैंने असफल किया। सौभाग्य भाई की पीठ सुनती है कि उन्होंने एक बार भी मुझे रोका-टोका नहीं। मेरी इन ‘हरकतों’ के कारण उन्हें काँग्रेस के, प्रादेशिक स्तर के नेताओं से प्रायः ही खरी-खोटी और अच्छी-बुरी सुननी पड़ती रहती थी।

पूरे अविभाजित मन्दसौर जिले पर भारतीय जनसंघ का दबदबा था। एक समय वह भी था कि वहाँ की सातों ही विधान सभा सीटों पर भारतीय जनसंघ का ‘दीपक’ जगमगा रहा था। किन्तु 1967 में पहली बार जनसंघ के इस ‘अभेद्यप्रायः दुर्ग’ में दरार आई जब दादा ने श्री सुन्दरलालजी पटवा को हराया था। बाकी छहों सीटों पर जनसंघ का कब्जा कायम रहा था। पटवाजी जिले के ‘एकमात्र पराजित जनसंघी उम्मीदवार’ बने थे।

मैं जिन सज्जन की बात कर रहा हूँ ‘वे’ मन्दसौर जिले के एक विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे। अपने विधान सभा मुख्यालय पर नहीं रहते थे। मूलतः, मन्दसौर के पास के एक गाँव के निवासी थे और मन्दसौर में रहते थे। मैं उनका नाम नहीं लिखूँगा। ‘वे’ अब दुनिया में नहीं हैं।

‘वे’ प्रखर वक्ता थे। जन-रोचकता और आक्रामकता उनके भाषणों के प्रमुख तत्व हुआ करते थे। संघ/जनसंघ/(और आज की भाजपा) के सामान्य वक्ताओं की तरह ‘वे’ भी ‘विचार’ की दुहाई देकर ‘व्यक्ति’ पर प्रहार करने में विशेषज्ञ थे। दादा तब तक लोकप्रिय जननेता के रूप में स्थापित हो चुके थे – इस सीमा तक कि जनसंघ के लगभग प्रत्येक वक्ता का भाषण, दादा के व्यक्तित्व-हनन के बिना कभी पूरा नहीं होता था। किन्तु कुछ लोग इस क्रम में दादा को पीछे छोड़ मेरी भाभीजी तक को निशाने पर लेने में संकोच नहीं करते थे। जैसा कि होता ही है, घटिया उपमाओं, अभद्र भाषा-शब्दावली से सजे ऐसे भाषण लोगों को खूब पसन्द भी आते। ‘वे’ भी ऐसा ही करते थे। मुझे बहुत बुरा लगता। गुस्सा आता। तमतमा कर दादा से कहता – “आप तो ‘सरस्वती-पुत्र’ हैं। बड़ी सुन्दरता और शालीनता से सबको जवाब दे सकते हैं। जवाब क्यों नहीं देते?” दादा हर बार मुस्कुरा कर, कभी मेरी पीठ, कभी मेरा कन्धा तो कभी मेरा माथा थपथपाते हुए कहते – ‘तू क्या समझता है मुझे तकलीफ नहीं होती? होती है। लेकिन अपन भी वैसा ही करने लगे तो उनमें और अपने में फरक ही क्या रह जाएगा? लोगों की समझ पर भरोसा रख। लोग सब समझते हैं। तेरी भाभी का मजाक उड़ानेवाले उनके भाषणों पर तालियाँ बजानेवाले भी उन्हें ही बुरा कहेंगे।” दादा की ऐसी बातें मुझे कभी अच्छी नहीं लगीं।

यह वह जमाना था जब मन्दसौर जैसी छोटी जगहों से निकलनेवाले अखबार, छपाई मशीन सहित सारे कामों पर पूरी तरह से मानव-श्रम पर निर्भर होते थे। स्टिक-कम्पोजिंग, गेली में पेज बनाना, हाथ से संचालित मशीन पर पेज का प्रूफ निकालना, पूरे पेज को ‘चेस’ में कस कर मशीन पर चढ़ाना और एक-एक पेज छापना। पाँव से चलाई जानेवाली ट्रेडल मशीन पर अखबार छपता था। दोपहर में 2 बजकर 40 मिनिट पर आकाशवाणी से प्रसारित होनेवाले ‘धीमी गति के समाचार’ मुखपृष्ठ के मुख्य समाचार का स्रोत होते थे। शाम तक तीन पेज छाप लिए जाते। रात आठ बजते-बजते मुखपृष्ठ तैयार हो जाया करता था। आकाशवाणी से, रात पौने नौ बजे प्रसारित होनेवाले समाचार की प्रतीक्षा की जाती थी। उस बुलेटिन में कुछ काम का हुआ तो ठीक वर्ना फटाफट अखबार छापने की तैयारियाँ शुरु हो जातीं। मुखपृष्ठ का मशीन प्रूफ देखकर मैं अपनी कुर्सी पर निढाल हो जाता। एक दिन की मजदूरी पूरी।

ऐसे ही एक दिन, अपराह्न में खबर मिली कि ‘उनकी’  सयानी बेटी, एक मुसलमान युवक के साथ घर छोड़ कर चली गई है। आज से  लगभग 45-50 बरस पहले भी, ‘संघ’ का कट्टर हिन्दुत्व, आनुपातिक रूप से तनिक भी कम नहीं था। मुसलमानों के प्रति नफरत और उन्हें राष्ट्र विरोधी निरूपित करना आज से कम नहीं था। होली पर साम्प्रदायिक दंगे होना मन्दसौर की पहचान बन गया था – कुछ इस तरह कि तय करना मुश्किल हो जाता था कि लोग होली की प्रतीक्षा कर रहे हैं या दंगों की। ऐसे में, कट्टर हिन्दुत्ववाले, कट्टर हिन्दू की, वह भी हिन्दू नेता की, बेटी का, घर से छोड़ कर चले जाना, वह भी किसी मुसलमान युवक के साथ!  कल्पना की जा सकती है कि मन्दसौर में क्या स्थिति बन गई होगी। पूरे शहर में सनसनी फैल गई। बिना किसी के कहे, दुकानों के शटर/दरवाजे आधे-आधे बन्द हो गए। हर कोई दहशतजदा था। स्कूलों में अघोषित छुट्टी हो गई। जिला प्रशासन एकदम ‘हाई अलर्ट’ पर आ गया – पंजों के बल, अंगुलियों पर खड़ा।

दस-पाँच मिनिट बीतते-न-बीतते, मेरा फोन घनघनाना शुरु हो गया – लगातार। एक से बात कर, रिसीवर रखकर हाथ हटाऊँ उससे पहले ही दूसरी घण्टी। और फोन भी केवल मन्दसौर शहर से नहीं, जिले के अन्य कस्बों से भी। मानो इतना ही पर्याप्त न हो, एक के बाद एक, ‘शुभ-चिन्तकों’ का आना शुरु हो गया। मेरी टेबल के सामने चार कुर्सियाँ रखी रहती थीं। वे चारों कभी की भर चुकी थीं। शाम होते-होते मेरा दफ्तर छोटा पड़ गया। मेरे दो सहायकों सहित तमाम कर्मचारियों का काम करना दूभर हो गया। एक के बाद एक, कोई न कोई चला आ रहा था और प्रत्येक के पास, इस मामले से जुड़ी, कोई न कोई अनूठी/अनछुई याने कि ‘एक्सक्लूसिव’ चटपटी-मसालेदार सूचना थी। सबकी एक राय थी – “आज इसे छोड़ना मत। इसने कभी, कोई कसर नहीं छोड़ी। दादा को तो ठीक, इसने भाभी पर भी छींटाकशी की है। भाभी को क्या-क्या नहीं कहा? तुझे याद है कि नहीं, बाजारू औरतों की लाइन में बैठाया था इसने भाभी को? आज इसे बिलकुल मत छोड़ना। बढ़िया मौका मिला है। निपटा दे इस स्सा ऽ ऽ ऽ ले को आज।”

घटना की सूचना मिलने के बाद, बड़ी देर तक मैं भी यही सब सोच रहा था – नफरत और प्रतिशोध की आग में जलते हुए। मैंने सौभाग्य भाई से पूछा – ‘क्या करना है?’ उन्होंने सदैव की तरह कहा – ‘जो तू ठीक समझे।’ किन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया, मेरे विवेक ने मुझे सहलाना शुरु किया। विचार आया – “यही घटना ‘इनके’ साथ न होकर किसी औसत आदमी के साथ होती तब मैं क्या करता?” बस! इस विचार ने मेरी सारी दुविधा दूर कर दी। तमाम शुभ-चिन्तकों को जैसे-जैसे विदा किया। मुखपृष्ठ का काम निपटाया। हमारा मुख्य कम्पोजिटर रमेश मुझ पर बराबर नजरें टिकाए हुए था। वह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट था और मेरी काँग्रेसी पृष्ठभूमि के कारण मुझसे, नफरत करने की सीमा तक चिढ़ता था। मेरी फजीहत करने का कोई मौका, कभी नहीं छोड़ता था। उसने एक शब्द भी नहीं कहा लेकिन उसकी आँखें लगातार बोल रही थीं।

छपाई के लिए मुखपृष्ठ की चेस मशीन पर चढ़ाई जाने लगी तो रमेश मेरे पास आया और रुँधे कण्ठ से, बहुत ही  मुश्किल से (मैं किसी भी तरह नहीं बता पाऊँगा कि कितनी मुश्किल से) कुछ ऐसा बोला – “मुझे बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी कि आप यह शराफत बरतेंगे। मैंने मान लिया था कि आपकी तो शादी भी नहीं हुई इसलिए आप बेटी के बाप का दर्द क्या जानेंगे? मैं बेटी का बाप हूँ। ‘उनसे’ मैं भी सहमत नहीं हूँ। मुझे पक्का भरोसा था कि आज आप राजनीति खेलेंगे और ‘उनको’ और ‘उनकी’ बेटी को, चौराहे पर टाँग देंगे। लेकिन आपने ऐसा नहीं किया। आज आपने ‘उनकी’ नहीं, तमाम बेटियों की और तमाम बेटियों के बापों की इज्जत बचा ली। मैं भगवान को नहीं मानता लेकिन आज मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि आपको लम्बी उम्र दे और आपके जरिए इसी तरह बेटियों की, बेटियों वालों की हिफाजत करता रहे। आज आपने मुझे अपना गुलाम बना लिया।’

मैं हक्का-बक्का रह गया। रमेश ने मेरा मन कब और कैसे पढ़ लिया? मैंने भी बिलकुल यही सोचा था – इस घटना का कोई सामाजिक महत्व तो है नहीं! इसे न छापने से मेरे अखबार को कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन छापने से एक परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा पर खरोंच अवश्य आ जाएगी। यदि यह घटना ‘उनके’ परिवार में न हुई होती तो मेरे लिए इसके कोई मायने नहीं होते। किन्तु, चूँकि मैं ‘उनसे’ मर्माहत हूँ, उन्हें लेकर बदले की आग में जल रहा हूँ, इसीलिए इस घटना का महत्व है। इस मामले में तो मैं खुद एक पक्ष हूँ? भला, न्यायाधीश जैसी भूमिका कैसे निभा सकता हूँ?

अब अकेला रमेश नहीं रो रहा था। मैं भी उसके साथ रो रहा था। लेकिन यह रोना, अपनी आत्मा का कलुष धुल जाने, और (किन्हीं भी कारणों से) पत्रकारिता की छवि को कलुषित करने से बच जाने से उपजी प्रसन्नता का रोना था।

संयत होकर मैंने ‘उनके’ घर का नम्बर डायल किया। मेरा नाम सुनते ही, उधर से मुझे टालने की कोशिश की गई। मैंने कहा – ‘उनसे कहिए कि उनका सबसे बड़ा बेटा बात करना चाहता है।’ वे फोन पर आए। उनकी ‘हेलो’ सुनते ही मैंने कहा – ‘दादा! कुछ मत कहना। मैं जो कह रहा हूँ, चुपचाप सुन लेना। मुझे अपने परिवार का सबसे बड़ा बेटा समझना और मेरी ओर से निश्चिन्त रहना। मैं आपसे मिलना चाहूँगा लेकिन आपकी सेवा में तभी हाजिर होऊँगा जब आप बुलाएँगे।’ जवाब में मुझे जो ‘विलाप क्रन्दन’ सुनाई दिया, वह इस क्षण भी मेरे कानों में गूँज रहा है। वे कुछ नहीं बोल पा रहे थे। लगातार रोए जा रहे थे – धाड़ें मार-मार कर, बेटी का नाम ले-ले कर। मैं तो कुछ बोल ही नहीं रहा था। कुछ पलों के बाद किसी आवाज सुनाई दी। कोई उन्हें कह रहा था – ‘क्या कर रहे हो? वो अपना दुश्मन है। उसके सामने रोना अच्छा नहीं लगता। चुप हो जाओ।’ और ‘उन्हें’ समझाते हुए, दूसरी आवाजवाले व्यक्ति ने रिसीवर रख दिया।

अगले दिन, क्या हुआ, कैसे उन्होंने खुद मुझे फोन किया, तत्काल अपने घर बुलाया, क्या-क्या कहा – यह सब लिखने का कोई अर्थ नहीं। सहज ही कल्पना की जा सकती है कि क्या हुआ होगा। ‘अपने हिय से जानियो, मेरे हिय की बात।’

लेकिन हाँ, यह सब लिखते हुए इस समय मुझे सचमुच में ताज्जुब हो रहा है कि मैं यह विवेक कैसे बरत पाया? उस समय मेरी उम्र 28 वर्ष थी। गरम खून और वह भी बदला लेने को उबलता हुआ! नफरत से लबालब! जब ‘बुद्धि’ उकसा रही हो – ‘ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा। तुझसे पूछने वाला, सवाल-जवाब करनेवाला कोई नहीं। निपटा दे स्साले को।’ तब मैं कैसे संयमित रह पाया? थानवीजी का यह लेख पढ़ते हुए अब अनुभव हो रहा है कि अपने से बेहतर पत्रकारों की छाया में बैठने से, उन्हें काम करते हुए, ऐसे मामलों में उनकी बातें सुनते हुए, उनसे मिले संस्कारों का ही प्रभाव रहा होगा कि मैं कच्ची उम्र में समझदारी बरत पाया।

लेखक विष्‍णु बैरागी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. यह लेख उनके ब्‍लॉग एकोऽहम् से साभार लिया गया है.

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