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पत्रकारों का पीएफ हजम करने की जुगत में लगा दैनिक जनवाणी

कभी बड़े तामझाम और धूमधड़ाके के साथ मेरठ से वेस्ट यूपी की पत्रकारिता में उतरा दैनिक जनवाणी अखबार अब डूबने लगा है। इसका कारण मैनेजमेंट की मनमानी है। बड़े-बड़े मीडिया संस्थान छोड़कर जनवाणी से जुड़ने वाले पत्रकार अब खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। इसका कारण जनवाणी प्रबंधन द्वारा इन पत्रकारों की हालत मजदूर से भी बदतर बना देना है। इक्का-दुक्का लोगों को छोड़कर किसी भी पत्रकार के वेतन में एक पैसे की भी बढ़ोतरी नहीं हुई। दरअसल जनवाणी संस्थान में पत्रकारों को तनख्वाह मिलने में भी बहुत कड़वा अनुभव हुआ है।

कभी बड़े तामझाम और धूमधड़ाके के साथ मेरठ से वेस्ट यूपी की पत्रकारिता में उतरा दैनिक जनवाणी अखबार अब डूबने लगा है। इसका कारण मैनेजमेंट की मनमानी है। बड़े-बड़े मीडिया संस्थान छोड़कर जनवाणी से जुड़ने वाले पत्रकार अब खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। इसका कारण जनवाणी प्रबंधन द्वारा इन पत्रकारों की हालत मजदूर से भी बदतर बना देना है। इक्का-दुक्का लोगों को छोड़कर किसी भी पत्रकार के वेतन में एक पैसे की भी बढ़ोतरी नहीं हुई। दरअसल जनवाणी संस्थान में पत्रकारों को तनख्वाह मिलने में भी बहुत कड़वा अनुभव हुआ है।

यहां पर दो तरह से तनख्वाह दी जाती है। एक तो सीधे बैंक अकाउंट में और दूसरे सीधे हाथ में कैश। 2010 में संस्थान की शुरूआत में दूसरे संस्थानों की तरह ही वेतन मिलने की उम्मीद में करीब 50 पत्रकारों ने इलाहाबाद बैंक की माल रोड शाखा में अपने बैंक अकाउंट खुलवा लिए। इन पत्रकारों के खाते में कर्मचारी भविष्य निधि फंड की 1560 रुपए प्रतिमाह की रकम कटकर तनख्वाह तो जाने लगी, लेकिन पीएफ के नाम पर कटा पैसा केंद्रीय भविष्य निधि संगठन के खाते की बजाय जनवाणी प्रबंधन की जेब में जा रहा है। पीएफ ऑफिस में भी जनवाणी प्रबंधन फर्जीवाड़ा कर रहा है। कही तो जनवाणी ने अपने ग्रुप भी नाम गॉडविन मीडिया हाऊस रखा है तो कही खुद को गॉडविन मीडिया वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड के रूप में शॉ कर रहा है।

पीएफ ऑफिस में केवल पत्रकारों के नाम की लिस्ट ही भेज दी। आज तक फूटी कोड़ी पीएफ ऑफिस में जमा नहीं कराया। पौने तीन साल से पत्रकारों का पीएफ दैनिक जनवाणी काट रहा है, लेकिन एक भी पैसा पीएफ ऑफिस में जमा नहीं हुआ। धोखाधड़ी की यह कहानी यही खत्म नहीं हो जाती। इस मीडिया ग्रुप में श्रम कानूनों की भी धज्जियां उड़ाई जा रही है। पत्रकारों को ना तो उनकी ईएल, सीएल और मेडिकल छुट्टियों का पता है और ना ही किसी को यह बताया जाता है। जो पत्रकार संस्थान छोड़कर जाता है तो उसका पीएफ का पैसा तो दैनिक जनवाणी का मैनेजमेंट जब्त कर लेता है और उसकी तनख्वाह का भी कोई हिसाब नहीं किया जाता। संस्थान से अब तक करीब 50 से ज्यादा लोग छोड़कर जा चुके हैं। लेकिन इन पत्रकारों के लाखों रुपए जनवाणी प्रबंधन डकार गया है। जब पीएफ विभाग का डंडा चलने की बात आती है तो पीएफ जमा करने की बात चलने लगी है। इसके बाद फिर सब चादर ओढ़कर सो जाते हैं। पता नहीं जनवाणी में पत्रकारों का यह शोषण कब तक चलता रहेगा। एक-एक पत्रकार का पीएफ का जनवाणी प्रबंधन ने करीब 55-55 हजार रुपए धोखाधड़ी से अपने पास इकट्ठा किया हुआ है। इसी कारण पत्रकारों का जनवाणी से मोह भंग होने लगा है। पत्रकारों को न्याय दिलाने के लिए जनवाणी प्रबंधन की पोल खोलने के लिए यह अभियान अभी कई दिन तक चलेगा।

मेरठ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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