पत्रकारों को पेंशन या झुनझुना : अधिकारियों ने लगाया गहलोत के आदेश में अड़ंगा

प्रदेश में अब तक जितने भी मुख्यमंत्री रहे हैं, उनमें से पत्रकारों का तहे दिल से भला चाहने वालों में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का स्थान सर्वोपरि है। इस तथ्य को उनके कटु आलोचक भी नकार नहीं सकते। मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने पहले मुख्यमंत्रित्व काल में ही इसका आभास करा दिया था कि पत्रकारों की भलाई के मामले में उनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है। इसी भावना के तहत एक दशक पहले उन्होंने पत्रकारों के लिए रियायती दर पर आवासीय भूखण्ड आवंटन योजना शुरू कर रहवास की समस्या का समाधान किया था।

कलमकारों को यह तोहफा तभी मिल सका था जब गहलोत ने व्यक्तिगत रुचि लेकर अधिकारियों के लगाए अड़गों को दरकिनार किया था। वैसे अधिकारी वर्ग की तो आदत ही होती है, अड़ंगा लगाने की। इसी आदत के चलते पत्रकारों के लिए रोडवेज की सभी बसों में दी गई निशुल्क यात्रा की सुविधा में अधिकारियों ने पता नहीं कब अड़ंगा लगा दिया और नए जमाने के साथ शुरू हुई वातानुकूलित और वोल्वो बसों की यात्रा से पत्रकारों को वंचित कर दिया। अधिकारियों ने ऐसे ही अड़ंगे लगाकर गहलोत की पत्रकारों के लिए शुरू की गई पेंशन योजना को हस्यास्पद बना दिया है। योजना का नाम और उसकी शर्तों से यह साफ नजर आता है कि अधिकारी वर्ग की मंशा है कि किसी भी स्थिति में इसका लाभ किसी पत्रकार को नहीं मिलना चाहिए।

विरला ही होगा लाभान्वित : गहलोत ने पत्रकारों से हमदर्दी के नाते बड़े गर्व से पेंशन योजना की घोषणा की थी, लेकिन अधिकरियों ने इसका नाम रखा राजस्थान वृद्ध पत्रकार कल्याण योजना। इसकी शर्तें ऐसी है, जिनके चलते विरला ही पत्रकार होगा जो इसका लाभ ले सकेगा। शर्तें इस प्रकार है, ऐसे पूर्णकालिक अधिस्वीकृत पत्रकार जो किसी दैनिक या साप्ताहिक समाचार पत्र में कम से कम 20 वर्षों तक सवैतनिक कार्य करते रहे हों और उनकी आयु 60 वर्ष या उससे अधिक हो, को प्रतिमाह पांच हजार रुपए की सहायता राशि दी जाएगी। यह सहायता राशि केवल उन पत्रकारों को दी जाएगी जिन्हें किसी समाचार पत्र अथवा संस्था से वेतन/पेंशन/नियमित सहायता राशि या राज्य सरकार से कोई अन्य सहायता राशि प्राप्त नहीं हो रही हो।

शर्तों में फंसी योजना : इन शर्तों का निहितार्थ हैं, यदि कोई पत्रकार 60 साल की आयु के बाद भी कहीं पर काम करता है और वेतन पाता है तो उसे यह सहायता राशि नहीं दी जाएगी। यदि उसे कहीं से पेंशन मिलती है तो भी वह इसका पात्र नहीं होगा। अब किस अक्लदार को समझाए कि जो पत्रकार 20 साल तक सवैतनिक कार्य करेगा तो उसका संस्थान केन्द्र सरकार के कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ’ईपीएफ‘ के नियमों के तहत उसका अंशदान आवश्यक तौर पर संगठन में जमा कराएगा, नहीं तो उसके मालिक को जेल की सजा भुगतनी होगी। जब ईपीएफ जमा होगा तो नियमानुसार उसे पेंशन भी मिलेगी। हालांकि, इस पेंशन के नियम बड़े विचित्र है। यह पेंशन राशि पहले अधिकतम 350 रुपए प्रतिमाह थी। अब नए नियमों के अनुसार वर्ष 1995 से अंशदान करने वाले कर्मचारियों को उनके बीस वर्ष तक अंशदान करने के बाद अधिकतम ढाई हजार रुपए प्रतिमाह की पेंशन मिलेगी। अब तक जो भी पत्रकार सेवानिवृत हुए है उनको अधिकतम 1800 रुपए प्रतिमाह की पेंशन मिल रही है। कहने का तात्पर्य यह है कि 20 साल तक सवैतनिक कार्य करने पर पेंशन जरूर मिलेगी। चाहे वह उंट के मुंह में जीरा ही क्यों ना हो।

ईपीएफ नियमों में केवल ऐसे संस्थान को ही अंशदान जमा कराने से छूट मिलती है जिसके कुल कर्मचारियों की संख्या बीस से कम हो। ऐसा विरला ही दैनिक समाचार पत्र होगा जिसमें सम्पादकीय, विज्ञापन, प्रसार, मार्केटिंग आदि विभागों में बीस से कम कर्मचारी होंगे। कुछ साप्ताहिक समाचार पत्र इसके अपवाद हो सकते है। अब ऐसी स्थिति में यह कल्पना करना कठिन नहीं होगा कि गहलोत की कल्याणकारी योजना से कितने पत्रकारों का कल्याण होगा।

नगण्य ही है अधिस्वीकृत : ऐसी ही एक और शर्त है, जिसमें कहा गया है कि यह सहायता राशि उन अधिस्वीकृत पत्रकारों को ही दी जाएगी जो सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय राजस्थान से कम से कम 10 साल अधिस्वीकृत रहे हो। समाचार संस्थानों में कार्यरत सभी सम्पादकीय कर्मचारी अधिस्वीकृत नहीं हो सकते। इस तथ्य को अधिकारीगण भली भांति जानते है। क्योंकि उन्होंने नियम बना रखे है कि समाचार पत्र की प्रसार संख्या के अनुसार ही उसके सम्पादकीय कर्मचारियों को अधिस्वीकृत किया जा सकता है। इसके लिए भी समाचार पत्र के मालिक की संस्तुति आवश्यक है। इन शर्तों के कारण अधिस्वीकृत पत्रकारों की संख्या नगण्य होती है। पात्रता की एक और शर्त है कि आवेदक आयकरदाता नहीं होना चाहिए। अब सोचिए जरा, ईपीएफ की मुंह चिढ़ती पेंशन और सुरसा की तरह मुंह फाड़ती महंगाई से बचाव के लिए यदि किसी पत्रकार ने अपना पेट काटकर गहलोत द्वारा दी गई भूमि पर मकान बना लिया ताकि उसके किराये की राशि से वह भविष्य की अपनी जरूरतें पूरी कर सके। अधिकारियों की इस टंगड़ी से भी अधिस्वीकृत पत्रकार योजना का लाभ नहीं ले सकेगा।

इतिहास दोहराया जाएगा? : ऐसी स्थिति में गहलोत की इस कल्याणकारी योजना का क्या हश्र होगा, इसका सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है। लगता है, अधिकारियों की मंशा गहलोत को हास्‍य का पात्र बनवाने की है। यदि इस हास्यास्पद स्थिति से बचाना है तो गहलोत और उनके सच्चे सलाहकारों को गम्भीरता से विचार करना होगा। इतिहास गवाह है। आवासीय योजना के समय भी अधिकारियों ने ऐसे ही नियम और शर्तें थोपी थी, लेकिन जब गहलोत ने साफ सन्देश दे दिया कि उनकी मंशा सभी पत्रकारों को लाभ देने की है तो अधिकारियों ने आनन फानन में नियमों में सुधार करने के साथ ही योजना की क्रियान्विति में भी पूरी रुचि ली। इसी का परिणाम है कि राजनैतिक तौर पर मतभेद रखने वाले पत्रकार और उनके परिजन भी गहलोत के व्यक्तिगत प्रशंसक हैं। लगता है, इतिहास फिर अपने को दोहरा रहा है। गहलोत को पहले की तरह पेंशन या कल्याण योजना के साथ ही लैपटॉप देने की योजना पर भी व्यक्तिशः रुचि लेनी होगी, तभी उनकी मंशा के अनुरूप पत्रकारों को लाभ मिल सकेगा।

राजेन्द्र राज

rajendrraj@gmail.com

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