पत्रकारों द्वारा निकाले गये कैंडल मार्च को भी पुलिस ने एक सीमा में बांधे रखा

: पुलिस ने जिस तत्परता से संपादकों को गिरफ्तार किया और उनसे पूछताछ कर रही है, वैसे ही जिंदल साहब औऱ उनके सलाहकारों से कर लेती तो शायद लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो जाती : वर्तमान समय में मीडिया संक्रमण काल के दौर से गुजर रहा है । कुछ हालिया घटनाक्रम लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ पर करारा प्रहार है। देश मेँ व्याप्त भ्रष्टाचार की लड़ाई अगर कोई लड़ रहा है तो वह है मीडिया। लेकिन वर्तमान शासन व्यवस्थाएं उसे भ्रष्ट करार देकर भ्रष्टाचार की लड़ाई की धार को कुंद करने का प्रयास कर रही हैं। कुछ लोग मीडिया को कटघरे में खड़े करके खुद को बचाने की जुगत में लगे हैं। जिस तरह सरकार संसद से लेकर सड़क तक के आंदोलन को विपक्षी दलों की चाल बताकर सारे सवालों को खारिज़ कर देती है वैसे ही अब ये मीडिया द्वारा उठाये गये सवालों को भी खारिज़ कर देगी जो कि लोकतंत्र के लिए काफी घातक सिद्ध होगा।

संवैधानिक उद्देश्यों की पूर्ति कभी भी स्वतंत्र और उत्तरदायित्वपूर्ण मीडिया के बिना कभी संभव नहीं है। लोकतंत्र में मीडिया जनमत निर्माण का शक्तिशाली माध्यम है। यही वजह है कि इसे चौथा स्तंभ कहा जाता है। आजादी से पहले मीडिया एक मिशन था, लेकिन आज उसका बाजारीकरण होता जा रहा है। इस अभिशाप से भी हमें बचना है और जनमानस के अपेक्षओं पर खरा उतरने की कोशिश करनी है। तभी मीडिया समाज के मापदण्डो पर खरा उतर पायेगा।

कुछ लोगों को मीडिया की सक्रियता नहीं भा रही है और उनकी पुरजोर कोशिश ये है कि समाज के नज़र में मीडिया की छवि धूमिल करके खुलेआम भ्रष्टाचार करने का परमिट पाने की है। कहीं न कहीं मीडिया आज खुद के कारण भी कटघरे में खड़ा है टीआरपी की गला काट प्रतियोगिता ने मीडिया घरानों को एक दूसरे के आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया है। यही वजह है कि जिंदल ने जिस तरह से जी न्यूज़ की साख पर सवाल खड़ा किया है कुछ मीडिया घराने उस जिंदल की कलाकारी को अपना मौन समर्थन दे रहे हैं। ये लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ के लिए ख़तरे की घंटी है। आज की स्थति काफी भयावह है जिस तरह से मीडिया पर हमला किया जा रहा है वैसा कभी नहीं था। 1970 के दशक में आपातकाल के दौरान मीडिया पर सरकार की तरफ से तमाम बंदिशें लगा दी गई थी। 

सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के खिलाफ किसी भी प्रकार की ख़बरें छापने पर मनाही थी। वह अलग दौर था। सरकार का प्रतिबंध घोषित था लेकिन आज सरकार मीडिया पर अघोषित प्रतिबंध लगा रही है। कोयला घोटाले में नवीन जिंदल पर जी न्यूज़ ने जिस तरह से खबरें दिखाई उससे जिंदल साहब की हकीक़त का पता आम लोगों को चला। लोगों के दिमाग में नेता नवीन जिंदल की छवि तिरंगे की अधिकार दिलाने वाली थी लेकिन तिरंगे की आड़ में ये महाशय तिरंगे का ही सौदा कर रहे थे। एक लाख चौरासी हजार करोड़ का घोटाला हुआ था। जी न्यूज़ को समाजिक सरकारों को ढ़ोना ही था, जनहित में। ये जानना भी काफी जरुरी था की कोयले की दलाली में किन किन लोगों के हाथ काले हुए हैं? इसी सच को उजागर कर जी न्यूज़ ने अपने दायित्वों का निर्वहन किया जिसका खामियाजा ये हुआ कि ख़बर दिखाने वाले चैनल को नवीन जिंदल साहब ने ख़बर बना दिया जिसमें सरकार और पुलिस ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

जिस तत्परता से पुलिस ने जी न्यूज़ के संपादकों को गिरफ्तार किया और उनसे पूछताछ की जा रही है वैसे ही जिंदल साहब औऱ उनके सलाहकारों से कर लेती तो शायद लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो जाती। लोकतांत्रिक मूल्यों की क्या वो जिसकी रक्षा में लगी है उसे वो न्यायपालिका के चाबुक से नहीं बचा पायेगी। जी न्यूज़ के संदपाकों की रिहाई के लिए तमाम पत्रकारों द्वारा निकाले गये कैंडल मार्च को भी पुलिस ने एक सीमा में बांधे रखा, लेकिन इन्हें क्या पता कि कलम की आवाज को कभी भी खामोश नहीं किया जा सकता है और ना ही किसी सीमाओं में बांधा जा सकता है। 

जी न्यूज़ ही अकेला भ्रष्टाचार की मार का शिकार नहीं हुआ है। आज तक पर केंद्रीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद साहब ने लंदन से लेकर दिल्ली तक में मानहानि का मुकदमा कर रखा है। चैनल का कुसूर इतना है कि उसने माननीय मंत्री जी के जनकल्याण के तौर तरीकों का खुलासा कर दिया था। अभी कुछ दिनों पहले किंगफिशर एयरलाइंस के मालिक विजय माल्या भी मीडिया के खिलाफ आग उगल रहे थे। उनका कहना था कि किंगफिशर एयरलाइंस की दुर्दशा के जिम्मेंदार वे नहीं बल्कि मीडिया है जो उनके कर्मचारियों को भड़का रहा है।

ऐसी तमाम तोहमते मीडिया पर लग रही हैं शायद ये मीडिया का संक्रमण काल है। एसे में लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ की रक्षा तभी हो सकती है जब इससे जुड़े हुए सभी लोग एक साथ मिलकर इस लड़ाई का मुकाबला करें। ये बात भी समझने की है कि पिछले दो सालों से भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया हुआ है। सच्चाई ये भी है कि कैग सीवीसी और अन्य संवैधानिक संस्थाओं के कारण ये मामले सामने आ रहे हैं और मीडिया उन्हे कवर कर रहा है।

अदालतों में भ्रष्टाचार के मामले चलते है। मीडिया उन्हें कवर करता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अन्ना का आंदोलन होता है समुची मीडिया पूरी ताक़त के साथ उसको कवर करती है। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कोई भी मामला मीडिया अपने तरफ से नहीं ला रहा है। आने वाले समय में और भी ना जाने कितने मामले आयेंगे मीडिया उनको भी कवर करेगा। एसे माहौल में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे लोगों का हमला और भी तेज़ हो सकता है। जाहिर है लोगों के हक़ के लिए लड़ने वाले मीडिया को खुद के लिए भी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए।

उपरोक्त विश्लेषण किन्हीं पी सिंह ने sangeetasingh.ritu@gmail.com मेल आईडी के जरिए भड़ास के पास भेजा है.

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