यूपी में एक पत्रकार नेता है. नाम है हेमंत तिवारी. जब पत्रकारों पर दुख पड़ता है या पत्रकारों का मसला होता है तो ये अक्सर दाएं बाएं नजर आते हैं और मोर्चा संभालने से परहेज करते हैं. पर अगर सत्ता सिस्टम और नेता को इनकी जरूरत पड़े तो फौरन हाजिर हो जाते हैं. मायावती के जमाने में हेमंत तिवारी मायावती को अपने हाथों केक खिलाते हुए माया के जन्मदिन की फोटो अपने सरकारी आवास पर लगाकर रखते थे ताकि इनके घर आने जाने वालों को इनके ताकत, रसूख के बारे में पता चल सके.
सत्ता से माया गईं तो वो तस्वीर भी उतर गई. देखते ही देखते हेमंत तिवारी ने सपा से नजदीकियां बना ली. कुछ ही समय बाद ये सपा के बड़े नेताओं के इर्दगिर्द नजर आने लगे. मुलायम, शिवपाल, अखिलेश आदि के इर्दगिर्द जब हेमंत तिवारी के खड़े होने वाली तस्वीरें छपने छपाने लगीं तो हेमंत का मार्केट रेट फिर हाई हो गया. सपा नेताओं के साथ की फोटो इनके घर की शोभा बढ़ाने लगी. सत्ता के नजदीक रहते रहते अक्सर ये सत्ता मद में चूर हो जाया करते हैं और देर रात किसी को भी सड़क पर गालियां देने लगते हैं. ऐसे कई वाकये हुए जिसमें इन्होंने कभी किसी पुलिस वाले को तो कभी किसी छात्र नेता को तो कभी किसी निर्दोष को गालियां दी और हंगामा खड़ा किया. पर पत्रकारों का कथित नेता होने और मंत्रियों-अफसरों से नाभि नाल का रिश्ता रखने के कारण इनके सौ खून माफ हो जाया करते हैं.
पिछले दिनों कानपुर में पुलिस ने बड़े पैमाने पर डाक्टरों और पत्रकारों को पीटा. दर्जन भर से ज्यादा मीडियाकर्मियों को गंभीर चोटें आईं. लखनऊ के पत्रकारों सिद्धार्थ कलहंस, संजय शर्मा आदि ने बयान जारी कर इस पुलिसिया उत्पीड़न की भर्त्सना की और प्रदेश सरकार पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव बनाया. लेकिन हेमंत तिवारी का कोई बयान नहीं आया. बल्कि उनकी कुछ तस्वीरें ऐसी सामने आईं जिससे पता चलता है कि उन दिनों ये महाशय मुख्यमंत्री अखिलेश के करीबी बनकर एक समारोह की शोभा बढ़ा रहे थे.



सबसे बाएं फ्रेंच कट दाढ़ी में सपा का प्रचार मैटेरियल हाथ में लिए हुए जो शख्स दिख रहा है वही कथित पत्रकार नेता हेमंत तिवारी है
बात किसी एक हेमंत तिवारी की नहीं है. ये एक ट्रेंड है. ये एक प्रवृत्ति है. ऐसे कई लोग हैं जो पत्रकारों का नेता बनकर सत्ता सिस्टम के करीब पहुंच जाते हैं और पत्रकार जगत की तरफ से ठेका लेने लग जाते हैं. वे ऐसा दर्शाते हैं कि अगर उन्हें खुश नहीं रखा गया तो पूरा मीडिया जगत नाराज हो जाएगा. कई बार ये लोग इसी चक्कर में विरोध प्रदर्शन भी सत्ता के किसी एक धड़े के खिलाफ करते हैं क्योंकि उस धड़े ने इन लोगों को ओबलाइज नहीं किया होता है या इगनोर रखा होता है. मार्केट में मैसेज जाता है कि देखो ये कितना बड़ा पत्रकार नेता है जो सत्ता से लड़ने जा रहा है लेकिन सच्चाई जानने वाले ठीक से जानते हैं कि ये विरोध प्रदर्शन सिर्फ मार्केट सत्ता सिस्टम में अपनी पकड़ दबदबा बनाए रखने के लिए है, किसी पत्रकार या पत्रकारिता जगत के हित के लिए नहीं.
तो ऐसे हेमंत तिवारियों से सावधान रहने की जरूरत है. बात किसी एक हेमंत तिवारी की नहीं है इसलिए दूसरा उदाहरण भी यहां दिया जा रहा है. खुद को पत्रकारों का बड़ा नेता बताने वाले के. विक्रम राव की भी बोलती बंद है. समाजवादी पार्टी के एहसानों तले दबे ये महाशय गाहे बगाहे मंच पर मुलायम अखिलेश के साथ तो दिख जाते हैं लेकिन जब मामला पत्रकारों पर पुलिस अत्याचार का हो तो ये इसलिए चुप्पी साध जाते हैं क्योंकि सत्ता सिस्टम के एहसानों लाभों उपकारों के बोझ तले दबे ये बोलेंगे तो इनकी आवाज सरकार के खिलाफ मान ली जाएगी.
हेमंत तिवारी, के. विक्रम राव जैसे दर्जनों अवसरवादी पत्रकार नेता और पत्रकार संगठन हैं. इनका मकसद किसी पत्रकार या पत्रकारिता की हित नहीं बल्कि अपनी दुकान चलाने चमकाने की रहती है. इसलिए कल के दिन ये लोग जब पत्रकारों और पत्रकारिता को लेकर बड़ी बड़ी बातें करते नजर आएं तो आप एक सवाल सामने दाग सकते हैं कि जब कानपुर में दर्जन भर से ज्यादा पत्रकारों को पीटा गया था तब आप लोगों की बोलती क्यों बंद हो गई थी.
भड़ास तक अपनी बात [email protected] पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.






