पत्रकार पुण्य प्रसून ने नरेंद्र मोदी से दुनिया का ‘सबसे कठिन’ सवाल पूछा!

Abhishek Srivastava : पत्रकार पुण्‍य प्रसून बाजपेयी ने इंडिया टुडे कॉन्‍क्‍लेव में बिल्‍कुल बेताल की तरह दांत चियारते हुए दुनिया का सबसे कठिन सवाल नरेंद्रभाई मोदी से पूछा, ''आपको दिल्‍ली आने से बीजेपी में कौन रोक रहा है?'' छह करोड़ गुजरातियों के चंद्रगुप्‍त मौर्य ने यक्ष की तरह जवाब दिया, ''देखिए, मैं तो दिल्‍ली में ही बैठा हूं। कोई रोकता, तो मैं दिल्‍ली में कैसे होता?'' फिर क्‍या हुआ? नरेंद्रभाई का सिर टुकड़े-टुकड़े होने से बच गया और सबसे तेज़ पत्रकारिता दोबारा होटल ताज पैलेस की आरामदेह कुर्सी में जाकर धंस गई। ज़ाहिर है…ज़ाहिर है… ज़ाहिर है… दरअस्‍ल… घंटा!!!

Lovejeet Alexander : Aap Ka frustration dikh raja hai…

Samar Anarya : फागुन है बाबा.. हंसी मजाक का मौसम. काहे इतना बड़ा गोला दाग दे रहे हैं निष्पक्ष पत्रकारों पर.

Vivek Pathak : इंडिया टूडे कान्क्लेव से सफेद धुआँ निकला है आज… पूरे ग्रुप ने और केशव कुंज ने मोदी को पोप चुन लिया है….

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.


Nadim S. Akhter : इंडिया टुडे कॉन्क्लेव की Live तस्वीरें आज तक पर देख रहा हूं…शायद पहली बार है, जब नरेंद्र मोदी को एक मॉडल की तरह अलग-अलग पोज देते हुए तस्वीरें खिंचवाते हुए देख रहा हूं…शायद लकड़ी या प्लास्टिक की एक चौकोर आकृति है, जिससे झांकते हुए-उसे पकड़ते हुए-उससे झूलते हुए अलग-अलग पोज दे रहे हैं मोदी…एक perfect actor cum politician!!!

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India Today Conclave की आंखों देखीः तो फैसला हो गया…इंडिया टुडे के कॉन्क्लेव में नरेंद्र भाई मोदी को ढाई घंटे से ज्यादा सुनने के बाद आप किसी नतीजे पर पहुंचने की राय बना सकते हैं…शुक्रिया 'आज तक' जिसने पूरे कार्यक्रम को LIVE देश तक पहुंचाया… जैसा मुझे पता था, मोदी पूरी तैयारी के साथ आए थे…पूरे लकदक के साथ…power-point presentation लेकर …गुजरात के 'विकास' की कहानी कहने…10-12 मिनट के इस ऑडियो-वीडियो इफेक्ट में गुजरात के 'विकास' की हर वो कहानी बताई गई, जिससे अपने मुंह मियां मिट्ठू बना जा सके…कृषि, सिंचाई, रोजगार, भ्रष्टाचार, महंगाई, औद्योगिक विकास…सब कुछ…पूरा पैकेज था 'विकास" का…लेकिन बड़ी चतुराई से मोदी वो सब छुपा गए, जो उनके राज्य की बदतर तस्वीर पेश करता है…कहते हैं निंदक नियरे राखिए…आत्मालोचना विकास की कुंजी है…लेकिन मोदी इससे कोसों दूर दिखे…अगर ईमानदार होते तो बताते कि मेरे राज्य में इतना काम हो चुका है, लेकिन यहां-यहां काम नहीं हुआ है और इसे मुझे करना है…वे सिर्फ और सिर्फ अपनी उपलब्धियां गिनाने में लगे रहे…बड़ी-बड़ी बातें कीं…ये कर दूंगा…वो कर दिया है…पोर्ट बना दिया है…भारतीय रेल का निजीकरण कर दो…पटरी तुम रखो..बोगियां प्राइवेट कंपनियों की दौड़ाओ…आखिर पूंजीपतियों के साथ 'लूट' का मजा चख जो चुके हैं…सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को कॉरपोरेट की तरह चलाओ…देश को सैनिक सुरक्षा की जरुरत नहीं, knowledge power की जरूरत है…अब मोदी जी को कौन समझाए कि जब चीन, अपना रक्षा बजट लाखों करोड़ में बढ़ा रहा है, तब भारत सिर्फ knowledge power से चीन का मुकाबला कैसे करेगा??? मोदी की इस बात पर पूर्व थलसेना अध्यक्ष ने भी सवाल उठाए…

India Today conclave में मोदी का एक यू-टर्न ये भी रहा कि उसने पाकिस्तान समेत सभी पड़ोसी मुल्कों से मधुर संबंधों की वकालत की…जिस पाकिस्तान और मियां मुशर्रफ को वो पानी पी-पीकर कोसते रहते हैं, उनके बारे में कहा कि people to people contact बढ़ाना होगा…हम गुजरात से कराची के ज्यादा सम्पर्क में रहते हैं और हमें पाकिस्तान से कोई प्राब्लम नहीं है…वो ये भी कह गए कि चीन से हमारे संबंध मधुर हुए हैं क्योंकि यहां people to people contact बढ़ा है…मोदी का ये बयान बहुत बचकाना था क्योंकि चीन हम-आप में से कितने लोग जाते हैं…मिलने-जुलने…हमारे-आपके कितने रिश्तेदार चीन में हैं…अजीब बात बोली उन्होंने…पब्लिक मीटिंग और चुनावी भाषण में जिस पाकिस्तान को वो सबक सिखाने की हुंकार भरते थे, वो राग आज गायब था…हिंदी-चीनी-पाकिस्तानी भाई-भाई का राग अलाप रहे थे…खैर..

सबसे मजेदार ये रहा कि अपने दो घंटे के प्रवचन में मोदी ने कहीं भी 2002 के गुजरात दंगों की चर्चा नहीं की…मैं बहुत बेसब्री से इसका इंतजार कर रहा था लेकिन मोदी इस पर चुप्पी साधे रहे…फिर शुरु हुआ public interaction का दौर…पहले इंडिया टुडे ग्रुप के मालिक अरुण पुरी ने सवाल पूछा कि मोदीजी, क्या आप पीएम बनना चाहते हैं, तो इस पर मोदी philosophical हो गए…एक कहानी सुनाई और कहा कि बनना नहीं देश के लिए करना चाहता हूं..जाहिर है, कुछ कह देते तो बीजेपी में उनके दु्श्मन खुलकर सामने आ जाते…फिर राहुल कंवल ने कुछ सवाल दागे और आंकड़ों की मदद से कहा कि गरीबों की तादाद देशभर में गुजरात में ज्यादा है…उनकी संख्या बढ़ी है…कुपोषण के मामले में गुजरात का रिकॉर्ड बहुत खराब रहा है…Vibrant Gujrat तो सिर्फ पूंजीपतियों के लिए है…इस पर मोदी ने तर्क-कुतर्क किए लेकिन audience convince नहीं हुई…

पूरे घटनाक्रम में सबसे रोचक पहलू ये रहा कि जब पुण्य प्रसून वाजपेयी ने दर्शकदीर्घा से सवाल पूछने के लिए माइक उठाया, तो लगा मोदी 'सहम' गए…शायद सोचा होगा कि आज तो दंगों पर पुण्य लपेट देंगे…और मोदी फौरन से कह उठे कि यार कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का इरादा है क्या…इस पर पूरी पब्लिक हंस पड़ी और पुण्य ने भी ठहाका लगाया…खैर, पुण्य ने आसान सा सवाल किया और मोदी की जान में जान आई…सवाल-जवाब का दौर जलता रहा…

पूरे कार्यक्रम के दौरान एक घटना ऐसी हुई, जिसने मोदी को embarrass कर दिया…कम से कम मुझे तो ऐसा लगा…हुआ यूं कि कार्यक्रम में बड़ी तादाद में विदेशी मेहमान-पत्रकार भी थे…तो जब राहुल कंवल ने इशारा एक विदेशी की तरफ सवाल पूछने के लिए किया, तो विदेशी मेहमान ने हिंदी और गुजराती में बोलकर समां बांध दिया..मोदी से पूछ दिया कि 'केम छो' और जवाब में मोदी ने बताया कि 'मजा मां छो'…लेकिन उसका अंग्रेजी में पूछा सवाल मोदी समझ ही नहीं पाए…हालत इतनी दयनीय हो गई कि मोदी ने मंच पर ही मौजूद राहुल कंवल और अरुण पुरी से पूछ लिया कि भैया, इनका सवाल क्या था…फिर राहुल ने सवाल को हिंदी में ट्रांसलेट करके मोदी को बताया…फिर ऑडियंस की तरफ से भी सवाल के हिंदी अनुवाद पर शायद कुछ कहा गया और आखिर में राहुल ने ठीक से सवाल का हिन्दी वर्जन मोदी को समझाया…इस बीच बेचारा विदेशी मेहमान टुकर-टुकर इधर-उधर देखता रहा कि उसके सवाल पर यहां इतना हंगामा क्यों बरपा है???!!!

मेरी नजर में मोदी से सबसे महत्वपूर्ण पहला सवाल इस विदेशी मेहमान ने ही किया था…बाकी जितने भी पत्रकार और अतिथि वहां थे, वे सब तो टहला-टहली कर रहे थे. विदेशी मेहमान के सवाल का लब्बोलुआब ये था कि मोदी जी, आप जख्मों को कैसे भरेंगे और देश को एक कड़ी में कैसे बांधेंगे…जाहिर है, उसका इशारा गुजरात दंगों के जख्म की ओर था और वह देश को दो समुदायों के बीच आपसी सौहार्द बढ़ाने के उपायों की बात सुनना चाह रहे थे…जब मोदी को सवाल समझ में आया तो उनके चेहरे का रंग उड़ गया…अब तक जो confidence उनकी body language में दिख रहा था, वह छूमंतर हो चुका था…आवाज कांप गई और मोदी अल-बल बोल गए…इसका क्या जवाब उन्होंने दिया, मुझे भी समझ में नहीं आया…काफी vague जवाब था उनका….

एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा खली, वो थी कि वहां कई नामी-गिरामी पत्रकार मौजूद थे…प्रोग्राम शुरू होने से पहले माहौल बनाया जा रहा था कि मोदी चुभते सवालों का जवाब कैसे देंगे लेकिन मोदी से चुभते सवाल किसी ने भी नहीं किया…ना पत्रकारों ने और ना वहां मौजूद भारतीय अतिथियों ने…पहला चुभता सवाल विदेशी अतिथि ने ही किया और मोदी की बोलती बंदु कर दी…

फिर आया वो लम्हा, जिसने मोदी की पोल-पट्टी खोल दी और यही क्षण इस कार्यक्रम का निर्णायक लम्हा साबित हुआ…एक आखिरी सवाल ने मोदी को बुरी तरह एक्सपोज कर दिया…जब राहुल ने सवाल पूछने के लिेए जावेद का नाम पुकारा, तो मोदी पलट कर देखने लगे कि ये जावेद कौन है…और जैसा सबलोग expect कर रहे थे, जावेद ने सवाल 2002 के गुजरात दंगों पर किया…इस पर मोदी झल्ला गए और कहा कि मैं इसका जवाब नहीं दूंगा…पहले भी काफी कुछ बोला है इस पर…तब जावेद ने अपना सवाल rephrase किया और पूछा कि कम से कम इतना तो बता दीजिए कि Do you regret on the riots?? तब मोदी की बौखलाहट और बढ़ गई और कहने लगे कि मैं इसका जवाब नहीं दूंगा…फिर मंच पर बैठे अरुण पुरी जी ने कमान संभाली और पूछा कि कम से कम ये तो बता दीजिए कि head of the state होने के नाते आप जिम्मेदारी लेते हैं या नहीं…तब तक नरेंद्र मोदी को पसीना आ चुका था…बगलें झांकने लगे और कहा सुप्रीम कोर्टर को बता चुका हूं…आप इंटरनेट पर जवाब देख लो…

यह बहुत ही हास्यास्पद था…वो कहावत है ना कि चोर की दाढ़ी में तिनका…अभी तक तो आप उछल-उछल कर अपने राज्य के विकास की गाथा सुना रहे थे, तब तो नहीं कहा कि इंटरनेट पर देख लो…और जब दंगों की जिम्मेदारी लेने की बात आई तो कहने लगे कि इंटरनेट पर मेरा जवाब ढूंढ लो…मोदी की इस हरकत ने ये साबित कर दिया कि ये आदमी बड़ी जिम्मेदारी उठाने के लायक है या नहीं…अपनी हरकतों के लिए जनता को जवाब देना जो जरूरी नहीं समझता हो, वह देश का पीएम बनने के सपने कैसे देख सकता है??? हां, मोदी ने अपने लेक्चर में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ा…दो-तीन घटनाओं का जिक्र किया कि कैसे उन्होंने मनमोहन को एक 'out of the box" आइडिया दिया और मनमोहन ने उस पर अमल नहीं किया…इस पर पब्लिक हंसी भी…लेकिन जब अपनी जिम्मेदारी की बात आई, तो जवाब नहीं दिया, कह दिया कि इंटरनेट पर देख लो…और यहीं मोदी के चेहरे से नकाब उतर गया…रंगा सियार पकड़ा गया…जय हो!!!

मुझे एक बात समझ नहीं आई कि इतने बुद्धिमान लोग वहां मौजूद थे, लेकिन किसी ने मोदी से गुजरात दंगों के बारे में चुभते सवाल क्यों नहीं किए…पुण्य ने भी नहीं…वे सब मिलकर क्या मोदी की मेहमाननवाजी कर रहे थे…मेजबान की भूमिका में थे क्या??? और क्या गुजरात दंगों पर सवाल सिर्फ मुसलमान ही पूछेगा??? और हुआ भी वही…जावेद नामक व्यक्ति ने ही ये सवाल किया…फिर बाकी लोग वहां क्या कर रहे थे??? या फिर ये पहले से ही आयोजकों और मोदी में फिक्स था कि गुजरात पर कोई सवाल-जवाब नहीं होगा…और क्या जावेद ने गलती से ये सवाल कर लिया और आयोजकों में से किसी को ये जानकारी नहीं थी कि वो गुजरात दंगों पर सवाल करने वाले हैं, वरना उनको सवाल ही नहीं करने देते…या फिर ये महज इत्तफाक था कि जावेद से पहले बड़े-बड़े पत्रकारों की टोली ने मोदी से गुजरात दंगों के बारे में वह चुभता सवाल नहीं किया, जो इतने बड़े आ्रयोजन में पूछा जाना चाहिए था…पूरा देश इस सवाल का जवाब मोदी से जानना चाह रहा था…..

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वाल से.


इस रिपोर्ट पर मुंबई से पत्रकार कमल शर्मा की टिप्पणी…

kamal sharma : आपकी रिपोर्ट पढ़ी। काफी सधी हुई और अच्‍छे से लिखी। ज्ञानवर्धन हुआ। नरेन्‍द्र मोदी के देश में पक्षधर भी है और विरोधी भी। उन्‍होंने किन सवालों के जवाब दिए और किन के नहीं। जवाब सभी के दिए जाने चाहिए थे क्‍योंकि जो व्‍यक्ति प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो उन्‍हें जवाब देने चाहिए। यह कहकर इंटरनेट पर देख लीजिए, सही नहीं कहा जा सकता। लेकिन गुजरात दंगों पर बार बार पूछकर सभी क्‍या साबित करना चाहते हैं। गुजरात के अलावा देश के अन्‍य राज्‍यों में क्‍या कभी कोई दंगे नहीं हुए। यदि हुए हैं तो आज तक उन राज्‍यों के मौजूदा, पूर्व मुख्‍यमंत्रियों से कुछ भी क्‍यों नहीं पूछा जाता। ले देकर नरेन्‍द्र मोदी ही सभी को दोषी दिखाई देते हैं। पश्चिम बंगाल में संगरुर और नंदीग्राम में आज भी कई लोग गायब हैं और गायब क्‍या, इन लोगों को मारकर जमीन में गाड़ दिया गया है। किसी ने भी बुद्धदेव भट्टाचार्य से सवाल क्‍यों नहीं पूछा। ममता बनर्जी के राज में भी काफी कुछ हो रहा है यदि सुधी पत्रकार निकलेंगे तो वहां काफी कुछ पाएंगे। ममता जी से भी पूछो कि क्‍या हो रहा है। हाल में कई गांवों में सामूहिक नरसंहार हुआ है…कुछ पूछो तो सही उनसे। देश की आजादी के बाद अनेक राज्‍यों में काफी कुछ घटा, दंगे हुए, उखाड़ो गडे मुर्दे। काफी कुछ सामने आएगा। ले देकर नरेन्‍द्र मोदी को मत घेरो, सभी को घेरो। बिहार में रणबीर सेना और दूसरी ऐसी सेनाओं ने हजारों का खून बहाया था, आपने नीतिश कुमार से पहले वाले मुख्‍यमंत्रियों को कितना घेरा, जरा बताना। राजस्‍थान में जयपुर, ब्‍यावर में दंगे हुए थे, किसको पूछा आपने कितने मरे, क्‍यों मरे। महाराष्‍ट्र के बारे में पूछो। हर राज्‍य का इतिहास पढ़ो और घेरो तो सभी को घेरो।
आज आप जिस राज्‍य में रहते है, वहां आपकी राज्‍य सरकार को पहले ही पता होता है कि वहां अब से कुछ देर में क्‍या होने जा रहा है। हम भारतीय थूंकते हैं सड़क पर और कहते हैं सरकार कुछ नहीं करती। साफ सफाई नहीं करती। अब बताइए थूंका किसने, क्‍या राज्‍य का मुख्‍यमंत्री या कोई मंत्री या देश का प्रधानमंत्री अथवा शहरी नियोजन, ग्रामीण विकास मंत्री साफ सफाई करने निकलेगा। यहां का हर नागरिक चाहता है सरकार सब करें और हम अपने दायित्‍वों को न समझें। अनुशासन की इतनी ज्‍यादा कमी है, सुधर नहीं सकते। दंगों को रोकने के लिए पहली जिम्‍मेदारी आम नागरिक की भी है जिस तरह आप सरकार पर सब थोप रहे हैं, उसी तरह।

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