पत्रकार बनाए नहीं जा सकते, बेहतर किए जा सकते हैं

‘पत्रकारिता ऐतिहासिक दस्तावेज है और पत्रकार अल्पकालिक इतिहास लेखक।’ उक्त उद्गार वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी ने गांधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा पत्रकारिता एवं लेखन पर आयोजित दस दिवसीय कार्यशाला में व्यक्त किए। वे ‘जनांदोलन एवं मीडिया’ विषय पर बोल रहे थे। श्री त्रिपाठी ने अपनी बात 1857 के आंदोलन से शुरू करके स्वाधीनता आंदोलन, जेपी आंदोलन, भ्रष्टाचार विषयक अन्ना आंदोलन और निर्भया कांड एवं उसके आंदोलन पर विस्तारपूर्वक रखी। बीच-बीच में नर्मदा बचाओ आंदोलन, किसान आंदोलन, चीन-रूस की क्रांति, नक्सल आंदोलन, दलित-आदिवासी आंदोलन एवं स्त्री विषयक आंदोलनों की खूबियों एवं कमियों पर भी प्रकाश डालते रहे।

विषय विशद एवं गंभीर होने की वजह से उन्होंने निर्धारित एक घंटे की जगह लगभग पौने दो घंटे तक व्याख्यान जारी रखा। व्याख्यान इतना कसावट एवं संदर्भ लिए हुए था कि एक भी प्रतिभागी व्याख्यान से न तो उकताया न ही बाहर गया। उन्होंने पत्रकारिता के मूल्यों और पत्रकार के दायित्व को रेखांकित किया। बातचीत को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने बताया कि जन आंदोलन स्थापित व्यवस्था के प्रति विद्रोह है, उसका सक्रिय भागीदार युवा है जो आक्रोश की मूल आवाज है। पत्रकारों को सचेत करते हुए उन्होंने कहा कि एक पत्रकार को जनांदोलनों का हिस्सा नहीं बन जाना चाहिए, उसका तटस्थ मूल्यांकन करना चाहिए। आंदोलन की खूबियों और उसकी कमजोरियों पर सतर्क निगाह रखनी चाहिए। उन्होंने अन्ना और उनके आंदोलन मंे दलित-मुस्लिम सवालांे की ओर भी ध्यान आकर्षित किया।

बातचीत को आगे बढ़ाते हुए श्री त्रिपाठी ने 1857 का आंदोलन तथा किसान आंदोलन के सांप्रदायिक सौहार्द्र संबंधी पक्ष पर ध्यान आकर्षित किया और इस संदर्भ में बात रखी। इसी संदर्भ के क्रम में महात्मा गांधी, भगत सिंह, बाबासाहेब डॉ. अंबेदकर, जेपी, लोहिया, गणेश शंकर विद्यार्थी, मेधा पाटेकर, महेन्द्र सिंह टिकैत, सोनी सूरी, अन्ना और मार्क्स, माओत्सोतुंग, एडलर स्नो, तथा पत्रकारिता के लिए शहीद मुहम्मद बाकर साहब जैसे देशी-विदेशी पत्रकारों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि पत्रकार सामाजिक कार्यकर्ता होता है और सामाजिक कार्यकर्ता पत्रकार भी हो सकता है; इसके कई संदर्भाें का भी उल्लेख किया। उन्होंने अपने व्याख्यान का समापन पत्रकारीय दायित्यों, नैतिक व लोकतांत्रिक मूल्यों को समझाने वाली ‘गांधीजी की ताबीज’ से किया।

लेखन सृजनात्मक संसार की अभिव्यक्ति है

इसके पहले जाने माने स्वतंत्र लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार ने पत्रकारिता की कठिन चुनौतियों को बताते हुए प्रतिभागियों को सतर्क किया। उनका कहना था कि पत्रकारिता चुनौतीपूर्ण है और आप सब चुनौतियों से जूझने का संकल्प लें। उन्होंने कार्यशाला के उद्घाटक अतिथि ओम थानवी की टिप्पणी ‘पत्रकारिता सीख सकते हैं, सिखाई नहीं जा सकती’ से मिलती-जुलती और उसको विस्तार देती हुई टिप्पणी की कि पत्रकार बनाए नहीं जा सकते, बेहतर किए जा सकते हैं। पत्रकारों को सदैव सजग रहना चाहिए तथा घटनाओं एवं गतिविधियों पर पैनी नजर रखनी चाहिए। लेखन पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार शरीर पंच तत्वों से निर्मित है उसी प्रकार पत्रकारिता का पंचतत्व लेखन है। लेखन की महत्ता को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि लेखन सृजनात्मक संसार की अभिव्यक्ति है और यह अभिव्यक्ति ही पत्रकारिता है।

आयोजकों की तरफ से अवधेश कुमार के लिए कोई विषय निर्धारित नहीं था इसके बावजूद उन्होंने अपने व्याख्यान को बिखरने नहीं दिया और प्रिंट मीडिया (विशेषतया समाचार पत्र) और उसके विभिन्न अंगों एवं उनमें बरती जाने वाली सावधानियों पर विस्तारपूर्वक बात रखी। उन्होंने समाचार पत्रों में होने वाले लेखन को छः प्रकार का बताया। 1. समाचार लेखन, 2. समाचार विश्लेषण, 3. अग्रलेख (संपादकीय), 4. संपादकीय पृष्ठ के आलेख, 5. फीचर लेखन और 6. कॉमेंट्री या टिप्पणी लेखन। इस विभाजन के बाद इनकी विषय वस्तु क्या होती है, इन्हें लिखने में क्या-क्या सावधानियां बरती जानी चाहिए और इनकी बारीकियां क्या-क्या हैं आदि को विस्तार से उद्घाटित किया।

समाचार विश्लेषण और उसके लेखन पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि समाचार विश्लेषण तथ्यों पर आधारित होता है। समाचार विश्लेषक को ‘हथौड़ा प्रहारक’ होना चाहिए। मतलब मूल वस्तु या कंटेंट को गंभीरता से रखते हुए विस्तार देना/होना चाहिए। इसकी शब्द सीमा को उन्होंने 400-450 शब्दों तक बताया।‘

संपादकीय पृष्ठ, फीचर लेखन या विशेषता लेखन, त्वरित टिप्पणी लेखन आदि पर भी उन्होंने विस्तार से बात रखी। उनका कहना था कि पत्रकारिता स्वान्तः सुखाय नहीं होती, खबरों को बनाते समय आम पाठक को हमेशा नजर में रखना पड़ता है।

व्याख्यान के आरंभ में कार्यशाला संचालक अभय प्रताप ने अवधेश कुमार का परिचय देते हुए बताया था कि इनके संघर्षों से भी काफी कुछ सीखा जा सकता है। लेकिन अवधेश कुमार ने अपने संघर्षों एवं अपनी पृष्ठभूमि को बताने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। शायद इससे आत्ममुग्धता एवं आत्मप्रशंसा के खतरे उत्पन्न होते, जिससे उन्होंने परहेज किया। वे सतर्क थे और तैयारी के साथ आए थे। कुल मिलाकर, दोनों व्याख्यान विचारोत्तेजक तो थे ही, पत्रकारिता के टूल को समझाने एवं सीख देने वाले भी थे।

रवींद्र प्रताप सिंह

कार्यशाला प्रतिभागी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, दि.वि.

मो. 9013820335

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *