पत्रकार मारे जाते हैं तो हंगामा क्यों नहीं होता

Arvind K Singh : हंगामा है क्यों बरपा…अचानक कुछ प्रतिक्रयाएं पुलिस जवानों को लेकर आ रही हैं…नक्सली हिंसा में छत्तीसगढ़ और तमाम जगहों पर केंद्रीय राज्य पुलिस बल के जवान मारे जाते हैं तो हंगामा क्यों नहीं होता…पत्रकार मारे जाते हैं तो हंगामा क्यों नहीं होता.. तमाम जवान बारूदी सुरंगों से हवा की तरह उछल जाते हैं.. उनको देखने तक जाने की संवेदना किसी राजनेता में नहीं होती..न ही बड़े प्रबुद्ध और आज बहस चला रहे लोगों में…जब ऐसी घटनाएं होती हैं तो हम इंकलाब जिंदाबाद करने लगते हैं औऱ लगता है पूरी दुनिया बदल जाएगी.

सवाल है कि आंतरिक सुरक्षा में हम अपने कितने लोगों की बलि लेंगे…कितने निर्दोष लोगों की बलि ले ली जाएगी…हमें भी इस बात पर सोचने की जरूरत है कि नक्सलवादियों से लेकर उग्रवादियों और आतंकवादियों से लड़ने में शहीद होने वाले जवानों से लेकर महेंद्र कर्मा जैसे राजनेताओं के पक्ष में जमीन पर खड़ा होना सीखें…केवल शोभायात्राएं न करें…तभी वास्तव में इस समस्या का निदान हो सकेगा.

वरिष्‍ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के एफबी वॉल से साभार.

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