पत्रकार साई रेड्डी की हत्या को नक्सलियों ने बहुत बड़ी भूल बताया, कई अन्य मुद्दों पर अपना नजरिया स्पष्ट किया

जगदलपुर : देशबन्धु अखबार के पत्रकार साई रेड्डी की हत्या के बाद देश भर में पत्रकारों द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया. नक्सलियों की मांद कहे जाने वाले बासागुड़ा पहुंचकर पत्रकारों ने नक्सली नेताओं से इस घटना पर स्पष्टीकरण मांगा था. बीते दिनों ओरछा से बीजापुर तक पत्रकारों ने पदयात्रा निकाल कर पत्रकारों पर हो रहे नक्सली हमले का विरोध किया था और पदयात्रा के दौरान नक्सली नेताओं से मिलने का प्रयास भी किया था. चार दिनों की इस पदयात्रा में नक्सली लगातार पत्रकारों का सामना करने से बचते रहे जबकि जिन इलाकों से यह पदयात्रा गुजरी वो सारा इलाका नक्सलियों का गढ़ माना जाता हैं.

अब तक पत्रकारों की हत्या के संबंध में उठ रहे सवालों के जवाब नक्सलियों द्वारा नहीं दिए गए. रविवार को दो बड़े नक्सली नेताओं ने बस्तर के घने जंगलों के बीच पत्रकारों से इस विषय पर बात की और इस घटना को बहुत बड़ी भूल मानते हुए पत्रकार जगत से माफी मांगी है. स्पेशल जोनल कमेटी के सदस्य चैतू और दरभा डिवीजनल कमेटी के सचिव सुरेन्द्र ने कहा कि साई रेड्डी की हत्या का फरमान 1997 में जारी किया गया था क्योंकि बीजापुर के कांग्रेस नेता सवरागिरी के साथ मिलकर उन्होंने जनजागरण अभियान के लिए काम किया था. स्व. रेड्डी को दो तीन बार चेतावनी दी गई थी. उसके बाद जब राज्य सरकार की पुलिस ने उन पर जनसुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था उसके बाद से सेंट्रल कमेटी ने अपना फरमान वापस ले लिया था. गलती से उस निर्णय की जानकारी निचले स्तर पर सक्रिय जन मिलिशिया सदस्यों को नहीं दी जा सकी. इसी वजह से यह बड़ी भूल उनसे हुई है.

घटना के दिन बासागुड़ा बाजार में जनमिलिशिया द्वारा किसी दूसरी घटना को अंजाम दिया जाना था लेकिन किन्ही कारणवश उस घटना को अंजाम नहीं दिया जा सका. इसी समय पहले से जारी फरमान के आधार पर साई रेड्डी पर हमला किया गया जो कि हमारी बहुत बड़ी भूल थी. इस घटना पर नक्सलियों के केंद्रीय नेतृत्व ने गहरी नाराजगी जाहिर की और घटना में शामिल सदस्यों पर सेंट्रल कमेटी के निर्देशानुसार कठोर कार्रवाई भी की गई है. इसी तरह तोंगपाल के पत्रकार नेमीचंद की हत्या भी निचले कैडर की बड़ी भूल थी. हमने स्वयं नेमीचंद को बुलाकर पुलिस से दूर रहने की हिदायत दी थी. अगर हत्या करना हमारी मंशा होती तो वह काफी पहले ही हो सकती थी. हम स्वयं एक राजनैतिक संगठन हैं और मीडिया के बिना हमारा आंदोलन भी सफल नहीं हो सकता. ऐसे में मीडिया पर हमले की बात हम सोच भी नहीं सकते.

नक्सली नेताओं ने स्वीकार किया कि पिछले कुछ दिनों में निचले कैडर के साथ संवादहीनता की स्थिति निर्मित हो गई थी जिसकी वजह से इस तरह की घटनाएं हुई हैं. बस्तर के कुछ और पत्रकारों के नाम नक्सलियों की हिटलिस्ट में होने की बात पर कहा कि यह सरासर झूठ है और इस आशय के बांटे गए पर्चे भी फर्जी हैं. देशभर में कोई भी पत्रकार हमारी हिटलिस्ट में नहीं है. केंद्रीय समिति के द्वारा पत्रकार, शिक्षक और महिलाओं के लिए विशेष पॉलिसी बनाई गई है जिसके निचले स्तर पर पालन नहीं हो पाने की वजह से यह गलतियां हुई हैं. दोनों माओवादी नेताओं ने फिर से ऐसी गलती नहीं होने का अश्वासन पत्रकारों को दिया है.

माओवादी नेताओं ने कहा कि सरकारों ने सिर्फ कार्पोरेट के फायदे के लिए ही बस्तर को रणभूमि बना दिया है. नारायणपुर में ट्रेनिंग के नाम पर सेना का आना और बस्तर में केंद्रीय बलों की तैनाती सिर्फ इसलिए की गई है कि आदिवासियों को यहां से हटाया जा सके और बहुमूल्य खनिज संपदा को औद्योगिक घरानों को बांटा जा सके. उन्होंने कहा कि टाटा और एस्सार का विरोध लगातार जारी रहेगा. एनएमडीसी की खदानों और नगरनार स्टील प्लांट के निजीकरण का व्यापक विरोध किया जाएगा.

2011 में दंतेवाड़ा के पालनार बाजार में एस्सार से 15 लाख रुपए प्रोटेक्शन मनी लेने के सवाल पर कहा कि एस्सार माओवादियों को फंडिंग नहीं करता है पर उसने सलवा जुडूम को जरूर आर्थिक मदद पहुंचाई थी. एस्सार की पाइपलाइन के बारे में कहा कि इसका विरोध हम पहले भी करते रहे हैं और यह विरोध आज भी जारी है. सुरक्षा बलों के पहरे में इस बंद पड़ी पाइप लाइन को हाल ही में फिर चालू किया गया है. उन्होंने कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बलों को कार्पोरेट के फायदे के लिए इस्तेमाल किए जाने के उनके दावों की पुष्टि इस बात से होती है.

माओवादी नेताओं ने एक सवाल के जवाब पर कहा कि सोनी सोढ़ी के साथ उनके संगठन का कोई संबंध नहीं है. हम सोनी सोढ़ी का समर्थन नहीं करते. उनके पिता जमीदार थे और उनका विरोध हमने लगातार किया है. आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल की नीतियों को भी उन्होंने हास्यास्पद बताया. उन्होंने कहा कि वे सिर्फ भ्रष्टाचार दूर करने की बात कहते हैं लेकिन भ्रष्टाचार के मूल में छिपे महत्वपूर्ण कारणों का जिक्र वे कभी नहीं करते.
 
माओवादी नेताओं का कहना है कि उनके द्वारा स्कूल भवन निर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं और पेयजल आदि के कामों में कभी भी रुकावट नहीं डाली गई है. 2007 में स्कूलों और आश्रमों में सुरक्षाबलों के ठहरने के सरकारी आदेश का हमने विरोध किया था. उसी समय हमने स्कूल भवनों को तोड़ा था. हम इनका पुननिर्माण चाहते हैं क्योंकि शिक्षा हमारी भी प्राथमिकता है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद भी स्कूल भवनों और आश्रमों में आज भी सुरक्षा बलों का डेरा है. 2008 के बाद से हमने किसी भी शाला भवन को नुकसान नहीं पहुंचाया है. सड़कों के निर्माण का विरोध जारी रहेगा क्योंकि हमारा मानना है कि प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुध दोहन के लिए ही सड़कों का निर्माण किया जा रहा है.
 
आदिवासी नेता चैतू ने कहा कि हमें सुरक्षा बलों के मूवमेंट की पूरी जानकारी रहती है जबकि हमारी कोई भी जानकारी उन तक नहीं पहुंच पाती. पूरी जनता हमारी इंटेलीजेंस है इसलिए ही हमारी जानकारी उन तक नहीं पहुंच पाती. जनता को सुरक्षा बलों से ज्यादा हम पर भरोसा है. वियतनाम का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि 1975 में जनता की मदद से ही अमरीका की सेना को वियतनाम से खदेड़ा गया था. (साभार- देशबंधु)

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